सतना जिले के परसमनिया पीएचसी में चौंकाने वाला मामला सामने आया। रिकॉर्ड में मेडिकल ऑफिसर की सिर्फ 70 दिन उपस्थिति, लेकिन 3 हजार ओपीडी और 4 हजार ब्लड टेस्ट दर्ज। मिशन डायरेक्टर ने जांच के निर्देश दिए।
By: Yogesh Patel
Mar 11, 20263:51 PM
हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। कागजों में बेहतर दिखने वाली व्यवस्था की हकीकत तब सामने आई जब राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन डायरेक्टर सलोनी सिडाना ने स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा के दौरान चौंकाने वाले आंकड़ों पर सवाल उठाए। मंगलवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए विंध्य क्षेत्र के पांच जिलों की स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा की गई। इस दौरान परसमनिया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की मेडिकल आॅफिसर डॉ. प्रवीण दाहिया के कामकाज में गंभीर विसंगतियां सामने आईं। सार्थक ऐप के रिकॉर्ड के मुताबिक पूरे साल में उनकी सिर्फ 70 दिन की उपस्थिति दर्ज है। लेकिन दूसरी तरफ ओपीडी के आंकड़े बताते हैं कि उन्होंने करीब 3 हजार मरीजों का इलाज किया। इतना ही नहीं, ओपीडी में आए मरीजों से भी ज्यादा यानी 4 हजार मरीजों के ब्लड टेस्ट कराए जाने का रिकॉर्ड दर्ज है। यही वह बिंदु था जिसने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया।
सतना जिला कई क्षेत्र में अव्वल
समीक्षा में कुछ सकारात्मक पहलू भी सामने आए। इंट्रापार्टम केयर यानी रात 8 बजे से सुबह 8 बजे के बीच गर्भवती महिलाओं को दी जाने वाली सेवाओं के मामले में सतना-मैहर प्रदेश के टॉप 5 जिलों में शामिल हैं। वहीं 14-15 वर्ष की किशोरियों के लिए चल रहे एचपीवी टीकाकरण अभियान में सतना प्रदेश के टॉप 11 जिलों में जगह बना चुका है।
सार्थक ऐप पर नहीं लग रही हाजिरी
समीक्षा बैठक में एक और चिंताजनक तथ्य सामने आया। सतना और मैहर जिले में करीब 200 संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी सार्थक ऐप पर अपनी आॅनलाइन उपस्थिति दर्ज ही नहीं कर रहे हैं। यह स्थिति स्वास्थ्य विभाग की मॉनिटरिंग व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है। मिशन डायरेक्टर ने इस मामले में सीएमएचओ डॉ. मनोज शुक्ला को सख्ती बरतने के निर्देश दिए हैं।
इंसेंटिव राशि के जरिए वित्तीय लाभ लेने का खेल
दरअसल, हब एंड स्पोक योजना के तहत यदि ओपीडी में एक निश्चित संख्या से ज्यादा मरीजों का परीक्षण और ब्लड टेस्ट कराया जाता है तो मेडिकल आॅफिसर को इंसेंटिव राशि मिलती है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि कहीं कागजों और ऐप के आंकड़ों के जरिए वित्तीय लाभ लेने का खेल तो नहीं खेला गया। मिशन डायरेक्टर ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सीधे सवाल किया कि जब साल भर में उपस्थिति इतनी कम है तो इतने मरीजों की जांच आखिर किस आधार पर दर्ज की गई।