सतना और मैहर जिले के गांवों में बंदरों, जंगली सुअर और नीलगायों के आतंक से किसान परेशान हैं। वन विभाग जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा है, पंचायतों के पास संसाधन नहीं। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री को हस्ताक्षर अभियान के जरिए गुहार लगाने की ठानी।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
जंगल में बढ़ती मानवीय हलचलों के कारण जंगल छोड़कर आबादी क्षेत्र में प्रवेश कर रहे जानवरों को लेकर प्रशासन के पास कोई पुख्ता रणनीति न होने का खामियाजा ग्रामीण क्षेत्र के रहवासियों को भोगना पड़ रहा है। सतना जिले के कोठी, मझगवां व बिरसिंहपुर तथा मैहर जिले के अमरपाटन व रामनगर में बंदरों के आतंक के किस्से तो सामने आते रहते हैं, अब इसी कड़ी में एक और नाम मैहर जिलांतर्गत बड़ा इटमा गांव का भी जुड़ गया है जहां इन दिनों बंदरों के उत्पात ने लोगों का जीना हराम कर दिया है। आए दिन बंदरों द्वारा काटे जाने व कच्चे मकानों में की जाने वाली तोड़ फोड़ से व्यथित ग्रामीणों ने वन विभाग के अधिकारियों से मुलाकात कर समस्या के निदानकी मांग भी की लेकिन वन विभाग ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि लाल मुंह के बंदरों को वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 से वर्ष 2022 में बाहर कर दिया गया है जिसके कारण वन विभाग की कोई जवाबदारी नहीं है। अलग-अलग मामलों में वन विभाग जंगली सुअर और नीलगायों को लेकर भी कुछ ऐसे ही वक्तव्य दे चुका है, ऐसे में सवाल यह है कि जंगली जानवरों से होने वाले नुकसान का शिकार बन रहे लोग आखिर इसकी फरियाद कहां करें? बहरहाल इस समस्या से निजात पाने बड़ा इटमा के वाशिंदों ने हस्ताक्षर अभियान चलाकर सरकार का ध्यान आकृष्ट कराया है।
वन विभाग ने उठाये हाथ, पंचायत में व्यवस्था नहीं
बड़ा इटमा के वाशिंदे इन दिनों बंदरों से बेहद परेशान हैं जो न केवल उनकी खपरैल की छत उजाड़ रहे हैं बल्कि घरों में घुसकर खाद्य सामग्री भी पार कर रहे हैं। इस दौरान बंदर घरों में घुसकर हजारों का सामान भी तोड़ फोड़ डालते हैं। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब बंदर ग्रामीणों को काटकर अपना शिकार बना लेते हैं। इस मामले में सुग्रीव साकेत, चंद्रभान साकेत, जितेंद्र कुमार, योगेश, दिनेश, संतलाल साकेत बालकृष्ण साकेत, बालकृष्ण साकेत, रामकिशोर, रामकृपाल, रामकुमार साकेत, रामगोपाल, रामखेलवान, बाबूलाल साकेत आदि ग्रामीणों ने सरपंच से बंदरों की धरपकड़ कराने की मांग की तो सरपंच ने यह कहकर असमर्थता जाहिर की कि वन विभाग कन्नी काट रहा है और ग्राम पंचायत में जंगली जानवरों को पकड़ने के लिए वित्तीय व्यवस्था नहीं है।
पंचायत को संसाधन देने हस्ताक्षर अभियान
ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री का ध्यान इस समस्या की ओर आकृष्ट कराने हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। अभियान की अगुवाई कर रहे बड़ा इटमा के युवा समाजसेवी सुभाष पांडेय ने बताया कि हस्ताक्षर अभियान पूर्ण होने के बाद इसकी कापी मुख्यमंत्री को प्रेषित की जाएगी ताकि इस समस्या का निराकरण हो सके। यदि वन विभाग वन्य प्राणी की सूची से बाहर होने के कारण बंदरों या अन्य कोई जंगली जनवरों को पकड़ने में आनाकानी करता है तो फिर ग्राम पंचायतों को इनकी धरपकड़ के लिए नगरीय प्रशासन विभाग पंचायतों को बजट दे ताकि घर, खेत-खलिहान और मानवीय जीवन की रक्षा हो सके। इटमा निवासी शिवबालक, श्यामलाल, बालकरण पर्वदा प्रसाद आदि ग्रामीणों ने बताया कि अंदर आए दिन हमला कर बच्चों व ग्रामीणों को घायल कर रहे हैं और घरों में खासा नुकसान कर रहे हैं लेकिन हम देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकते?
कहते हैं किसान प्रतिनिधि
निश्चित तौर पर किसानों की यह समस्या गंभीर है। इस समस्या से उच्चाधिकारियों के साथ साथ सरकार के शीर्ष नेताओं को अवगत करा रणनीति बनाई जाएगी। प्रयास होगा कि जानवरों से हो रहे नुकसान पर अंकुश लगे और समस्या का स्थाई समाधान हो।
कृष्णा पांडे, जिलाध्यक्ष, किसान मोर्चा भाजपा
किसानों का भला बिना जंगली जानवरों पर अंकुश लगाए नहीं होगा। बेहतर खाद व बीज पाकर वे उपज पैदा भी करते हैं तो जानवर चट कर जाते हैं। सरकार को इस दिशा में ठोस रणनीति बनानी चाहिए। हमारा प्रतिनिधिमंडल जल्द ही उच्चाधिकारियों को ज्ञापन देकर समस्या निदान का प्रयास करेगा।
संतोष पांडेय, जिलाध्यक्ष, किसान कांग्रेस सतना
मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। सरकार को चोहिए इसके लिए जल्द से जल्द कारगर नियम और किसी न किसी विभाग को जवाबदेह बनाए। किसान इस समस्या से बेहद परेशान है।
जिलाध्यक्ष किसान कांग्रेस, मैहर
सरकार ही बताए कि हम किस विभाग के पास जाएं। बंदरों ने पूरे गांव का जीना हराम कर दिया है। वन विभाग मुंह मोड़ लेता है और पंचायत में वित्तीय संसाधन नहीं हैं? ऐसे में किसान क्या अपनी फसलें व घरों को उजड़ते देखता रहे?
सुभाष पांडे, युवा किसान
यह सरकार की किसानों के प्रति बरती जाने वाली संवेदनहीनता है जिसके कारण जंगली सुअर, नीलगाय समेत अन्य वन्य प्राणियों द्वारा फसलों को पहुंचाए जा रहे नुकसान की परवाह नहीं की जा रही है। सरिसताल, सितपुरा, बाबूपुर, भरजुना, नैना समेत कई गांव में वन्य प्राणी फसलें तबाह कर रहे हैं, पर कोई सुनवाई नहीं है।
कृष्णेंद्र सिंह, प्रगति शील किसान
सरकार की किसानों से जुड़ी समस्याओं को टालने की प्रवृत्ति रही है। इस मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। सरकार को चोहिए इसके लिए जल्द से जल्द कारगर नियम और किसी न किसी विभाग को जवाबदेह बनाए। किसान इस समस्या से बेहद परेशान है।
पुष्पराज सिंह जिलाध्यक्ष किसान कांग्रेस, मैहर
उधर घर उजड़ रहे तो इधर खेत
जंगली जानवरों से मैहर जिले में जहां घर उजड़ रहे हैं तो वहीं सतना जिले में खेतों में जंगली जानवर कहर बनकर टूट रहे हैं, लेकिन प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है। किसान लगातार हो रहे नुकसान से अवाक है। सतना जिला मुख्यालय से सटे सरिसताल, बाबूपुर, करही, सितपुरा, सोहावल, लोहरौरा, भरजुना, नीमी, नेमुहा, झाली बैरहना, भैंसवार समेत आधा सैकड़ा गांवों में जंगली सुअर और नीलगायों ने खेतों में कहर बरपा रहे हैं। मेहनत और कर्ज से तैयार होने वाली उपज को बरबाद कर रहे हैं और प्रशासनिक अधिकारी एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर किसानों की समस्या के मूकदर्शक बने हुए हैं। जनप्रतिनिधि भी इस गंभीर समस्या को लेकर चुप हैं। खाद व बीज के प्रबंधन के लिए संघर्ष करने वाले जनप्रतिनिधियों व किसान संगठनों को यह समझना होगा कि यदि किसान ने खाद-बीज का इंतजाम कर उपज पैदा कर भी ली तो फसलों को जंगली जानवरों से बचाएगा कौन? इस सवाल का जवाब तलाशे बिना और कोई कारगर नीति बनाए बिना किसानों के लिए खेती को लाभ का धंधा नहीं बनाया जा सकता है।

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