सतना और मैहर की 823 उचित मूल्य दुकानों में से 653 निष्क्रिय पाई गईं। रिपोर्ट वाले दिन केवल 112 दुकानों में ही राशन वितरण दर्ज हुआ, जिससे पीडीएस व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हुए हैं।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
गरीब परिवारों तक सस्ता राशन पहुंचाने वाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की जमीनी हकीकत चिंताजनक है। रिपोर्ट के मुताबिक सतना और मैहर जिले में संचालित 823 उचित मूल्य दुकानों में से 653 दुकानें निष्क्रिय दर्ज हैं। यानी हर 10 में से लगभग 8 राशन दुकानें सक्रिय नहीं हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि रिपोर्ट वाले दिन दोनों जिलों में सिर्फ 112 दुकानों में ही कोई लेन-देन दर्ज हुआ। यानि इतनी ही दुकानों में वितरण किया गया। आंकड़े बताते हैं कि करोड़ों रुपए खर्च कर बनाए गए पीडीएस नेटवर्क का बड़ा हिस्सा फिलहाल वितरण प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका नहीं निभा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जिन दुकानों के भरोसे हजारों हितग्राहियों को खाद्यान्न मिलना है वे आखिर निष्क्रिय क्यों हैं?
सतना: 86 पर ही हुआ लेन-देन
सतना जिले में कुल 536 उचित मूल्य दुकानें दर्ज हैं। इनमें से 109 सक्रिय और 427 निष्क्रिय हैं। पूरे जिले में केवल 86 दुकानों ने ही ट्रांजेक्शन दर्ज किया। सबसे बेहतर स्थिति मझगवां ब्लॉक की रही, जहां 101 दुकानों में से 23 दुकानों ने वितरण किया। इसके विपरीत ंउंचेहरा में 72 दुकानों में सिर्फ 3 दुकानों पर ट्रांजेक्शन दर्ज हुआ। यहां केवल 4 दुकानें सक्रिय हैं जबकि 66 निष्क्रिय हैं और 2 दुकानें डेटा सिंक्रोनाइजेशन समस्या से प्रभावित हैं। नागौद में 95 में से 79 और रामपुर बघेलान में 99 में से 79 दुकानें निष्क्रिय मिलीं। सोहावल क्षेत्र में 95 में से 80 दुकानें निष्क्रिय दर्ज हुईं।
तकनीकी समस्या है या सुस्ती?
रिपोर्ट में कुछ दुकानों के ‘पार्शियल आॅफलाइन’ होने का उल्लेख है, जिससे डेटा सिंक्रोनाइजेशन की समस्या सामने आती है लेकिन 653 दुकानों का निष्क्रिय होना केवल तकनीकी समस्या का मामला नहीं माना जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि वितरण चक्र पूरा होना, खाद्यान्न आवंटन में देरी, ई-पॉस मशीनों की दिक्कत, नेटवर्क समस्या या संचालन में लापरवाही जैसे कारण भी इसके पीछे हो सकते हैं।
स्टार कमेंट्स
सार्वजनिक वितरण प्रणाली का उद्देश्य पात्र परिवारों तक समय पर अनाज पहुंचाना है। लेकिन जब पूरे नेटवर्क की केवल 13.6 प्रतिशत दुकानों पर ही एक दिन में ट्रांजेक्शन दर्ज हो रहा हो तो यह व्यवस्था की कार्यक्षमता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। खासकर ऐसे समय में जब ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा पूरी तरह इसी व्यवस्था पर निर्भर है। आंकड़े बताते हैं कि प्रशासन को अब केवल दुकानों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक सक्रियता और वितरण क्षमता पर भी फोकस करना होगा।


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