शारदीय नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा विधि, घटस्थापना शुभ मुहूर्त, प्रिय भोग और मंत्र की संपूर्ण जानकारी यहाँ पढ़ें।

धर्म डेस्क। स्टार समाचार वेब
आज से शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व मां दुर्गा की आराधना के साथ आरंभ हो गया है। नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। शैल का अर्थ हिमालय है; पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण माता पार्वती को शैलपुत्री के नाम से भी जाना जाता है। इस अवसर पर घटस्थापना के उपरांत मां शैलपुत्री की विधि-विधान से अर्चना की जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से मां शैलपुत्री की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति, साहस और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
नवरात्रि के पहले दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई करके मां दुर्गा और मां शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना करने की भी परंपरा है। मां को रोली, अक्षत, सफेद फूल, धूप और दीप अर्पित करें। मां शैलपुत्री का ध्यान करते हुए उनके मंत्रों का जाप करें और श्रद्धापूर्वक आरती करें। भक्त अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार व्रत भी रख सकते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री को सफेद रंग अति प्रिय है। इसलिए पूजा में सफेद फूल, दूध, दूध से बनी मिठाई और गाय के घी का भोग अर्पित किया जाता है। कई भक्त मां को सफेद मिठाई या खीर का भोग भी लगाते हैं। भोग अर्पित करने के बाद इसे प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में वितरित किया जा सकता है।
घटस्थापना करते समय पूजा स्थल की पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
पूजा स्थल तैयार करें: सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थान को साफ करें। मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
जौ बोएं: एक मिट्टी के पात्र में साफ मिट्टी डालकर उसमें जौ बो दें और थोड़ा जल छिड़कें।
कलश तैयार करें: कलश में जल या गंगाजल भरें। परंपरा के अनुसार उसमें सुपारी, अक्षत और सिक्का डालें। कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखें।
नारियल स्थापित करें: नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर कलश के ऊपर स्थापित करें। कलश को जौ वाले पात्र के पास रखें।
मां दुर्गा की पूजा करें: रोली, अक्षत, फूल, धूप और दीप अर्पित करें। मां दुर्गा का स्मरण करके पूजा, मंत्र जाप और आरती करें।
कलश स्थापना का मुख्य मुहूर्त: सुबह 06:19 बजे से 10:12 बजे तक
दोपहर में कलश स्थापना मुहूर्त (अभिजीत मुहूर्त): सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक
ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:40 बजे से 05:30 बजे तक
द्विपुष्कर योग: रात्रि 09:30 बजे से 10:32 बजे तक
वैधृति योग: प्रातःकाल से रात्रि 09:05 बजे तक
चित्रा नक्षत्र: प्रातःकाल से रात्रि 10:32 बजे तक
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः।
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।। पूर्णेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥ पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥ प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुंग कुचाम्। कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥
या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।
शैलपुत्री मां बैल पर सवार। करें देवता जय जयकार।
शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।
पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।
उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।
घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।
जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।
मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।
जोर से बोलो जय माता दी, सारे बोले जय माता दी!
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