सीधी के अभय गुप्ता ने आर्थिक तंगी और जर्जर खपरैल मकान में रहकर कक्षा 10वीं में प्रदेश में दूसरा स्थान हासिल किया। दिहाड़ी मजदूर पिता के बेटे की सफलता प्रेरणा बनी।

हाइलाइट्स:
सीधी, स्टार समाचार वेब
संकट कितने भी बड़े क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो सफलता का रास्ता खुद बन जाता है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है सीधी जिले के छात्र अभय गुप्ता ने, जिन्होंने सीमित संसाधनों और आर्थिक तंगी के बावजूद कक्षा 10वीं में मध्यप्रदेश में दूसरा स्थान हासिल कर एक मिसाल पेश की है।
आर्थिक विपन्नता का शिकार है परिवार
अभय गुप्ता का परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है। उनके पिता कैलाश गुप्ता दिहाड़ी मजदूरी कर किसी तरह परिवार का भरण-पोषण करते हैं। परिवार के पास न तो पक्का मकान है और न ही स्थायी आय का कोई जरिया। वे एक जर्जर खपरैल घर में रहकर जीवन यापन कर रहे हैं। बावजूद इसके, अभय ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर यह साबित कर दिया कि हालात सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकते।
सरकारी स्कूल और उसके हॉस्टल में रहकर की पढ़ाई
अभय ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा शासकीय विद्यालय से प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए सीधी शहर के उत्कृष्ट विद्यालय क्रमांक-1 के छात्रावास में रहकर तैयारी की। सीमित संसाधनों के बीच रहकर उन्होंने पढ़ाई को ही अपना लक्ष्य बनाया और पूरी एकाग्रता के साथ मेहनत करते रहे। परिवार और परिचित बताते हैं कि अभय का स्वभाव बेहद शांत और गंभीर है। वह अनावश्यक बातचीत से बचते हैं और अधिकतर समय पढ़ाई में ही व्यतीत करते हैं। उनके चचेरे भाई नीरज गुप्ता के अनुसार, अभय को बचपन से ही कंप्यूटर में विशेष रुचि रही है। खाली समय में वह कंप्यूटर सीखने के लिए भी प्रयास करते थे।
सफलता पर क्या कहा टॉपर ने
दिलचस्प बात यह है कि इतनी बड़ी सफलता मिलने के बाद भी अभय का व्यवहार विनम्र बना हुआ है। उन्होंने परिणाम आने के बाद सिर्फ मुस्कुराकर इतना कहा—ह्लअभी और बेहतर करना है। विद्यालय के प्राचार्य एस.एन. त्रिपाठी ने भी अभय की सफलता पर गर्व जताया। उन्होंने बताया कि अभय शुरू से ही पढ़ाई में उत्कृष्ट रहा है और विद्यालय को उससे बड़ी उम्मीदें थीं। ह्लवो न सिर्फ हमारी उम्मीदों पर खरा उतरा, बल्कि जिले और प्रदेश का नाम भी रोशन किया।"
बस में बैठकर कलेक्टर से मिलने पहुंचा था टॉपर
सफलता के इस मुकाम तक पहुंचने के बाद भी अभय की चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। उनकी आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक है। हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कलेक्टर से मिलने के लिए भी उन्हें बस का सहारा लेना पड़ा, क्योंकि परिवार के पास खुद का कोई वाहन नहीं है। इतना ही नहीं, अभय के पास निजी मोबाइल फोन भी नहीं है।
पिता ने कहा मिठाई खिलाने तक के लिए पैसे नहीं

पिता कैलाश गुप्ता ने भावुक होते हुए बताया कि जब उन्हें बेटे के टॉप करने की जानकारी मिली, तो गर्व के साथ-साथ एक कसक भी थी। उन्होंने कहा, मुझे बहुत खुशी हुई, लेकिन इतने पैसे भी नहीं थे कि लोगों को मिठाई बांट सकूं। उस समय घर में सामान्य दिन की तरह ही आलू की सब्जी बन रही थी, और इसी सादगी के बीच यह बड़ी उपलब्धि हासिल हुई।


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