सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर साइबर अपराधों और निजी जानकारी के खुलासे के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने तीनों मंत्रालयों से अभ्यावेदन पर विचार करने को कहा है।

नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से गंभीर साइबर अपराधों के खिलाफ सुधार के उपायों की मांग करने वाले एक अभ्यावेदन पर विचार करने के लिए कहा है। इन गंभीर अपराधों में मारपीट की धमकी, बच्चों के स्कूल के ठिकानों जैसी निजी जानकारी उजागर करना और सहमति के बिना निजी सामग्री साझा करना शामिल है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ नरेंद्र कुमार गोस्वामी की जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी, जो खुद पेश हुए थे और गंभीर अवैध डिजिटल नुकसान से निपटने के लिए एक प्रभावी निगरानी तंत्र बनाने की मांग कर रहे थे।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता ने अदालत का ध्यान मामले की गंभीरता और तात्कालिकता की ओर आकर्षित करने के लिए एक काल्पनिक स्थिति सामने रखी। उन्होंने पूछा कि क्या रात 9 बजे ऑनलाइन पोस्ट किया गया किसी महिला के घर का पता, जिसके साथ रेप की धमकी भी हो, उसे वैसे ही इंटरनेट पर उपलब्ध रहने दिया जा सकता है। सीजेआई ने कहा कि याचिकाकर्ता ने साइबर अपराध के विभिन्न तरीकों, प्रकारों और पहलुओं को बहुत अच्छे से उजागर किया है, साथ ही यह भी जोड़ा कि इनका पता कैसे लगाया जाए और बचाव के क्या उपाय किए जाने चाहिए, यह विषय विशेषज्ञों का मामला है।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि संबंधित अधिकारियों के सामने पहले ही एक रिप्रेजेंटेशन के जरिये ये मुद्दे उठाए जा चुके हैं। पीठ के पूछने पर कि यह अभ्यावेदन किसे संबोधित किया गया था, याचिकाकर्ता ने जवाब दिया कि इसे इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, गृह मंत्रालय तथा विधि और न्याय मंत्रालय के सचिवों के माध्यम से केंद्र को प्रस्तुत किया गया था। यह अभ्यावेदन संबंधित मंत्रालयों को 22 जून को दिया गया था, जिसमें गंभीर अवैध डिजिटल नुकसान, शारीरिक हिंसा के कृत्यों या धमकियों, खतरनाक विषैले पदार्थों, निजी विवरणों के खुलासे और बिना सहमति के निजी कंटेंट व नुकसानदायक डिजिटल पहचान बनाने से निपटने के लिए पर्यवेक्षी तंत्र की मांग की गई थी।
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया कि इस तरह के साइबर अपराध समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गोपनीयता, सम्मान और जीवन के अधिकारों सहित मौलिक अधिकारों का गंभीर रूप से उल्लंघन करते हैं। इस पर पीठ ने कहा कि इस चरण में जरूरी सुधार यह है कि संबंधित अधिकारियों को रिप्रेजेंटेशन में उठाए गए मुद्दों पर विचार करना चाहिए। अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने तीनों मंत्रालयों और अन्य सभी हितधारकों से अभ्यावेदन में उठाए गए मुद्दों की जांच करने और जरूरत पड़ने पर उचित सुधार के उपाय करने को कहा है।
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