
अरविंद मिश्र
भोपाल। स्टार समाचाार वेब
मध्य प्रदेश की सियासत एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां सत्ता के गलियारों में ‘शांति’ केवल एक दिखावा नजर आती है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार को दो साल से अधिक का समय हो चुका है, लेकिन उनके मंत्रिमंडल के भीतर सुलग रही असंतोष की ज्वाला अब सार्वजनिक मंचों पर धुंआ बनकर दिखने लगी है। प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव की सुगबुगाहटों के बीच दिग्गज मंत्रियों की दिल्ली दौड़ और मुख्यमंत्री के प्रति वरिष्ठों का ‘शीत युद्ध’ भाजपा के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है। असल संघर्ष वर्चस्व और महत्वाकांक्षा का है, जिसमें एक ओर डॉ. यादव की असीम ऊर्जा है, तो दूसरी ओर कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद पटेल और राकेश सिंह जैसे दिग्गजों का अनुभव और राजनीतिक कद... इसी पर पेश है ‘स्टार समाचार’ की विशेष रिपोर्ट...।
वरिष्ठों की टीस और मंत्रिमंडल में बढ़ती खाई
मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद सिंह पटेल और राकेश सिंह जैसे उन वरिष्ठ नेताओं का परोक्ष विरोध झेलना पड़ रहा है, जो कभी खुद को मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे देख रहे थे। संघ और केंद्रीय नेतृत्व द्वारा एक तीसरी बार के विधायक को कमान सौंपना इन दिग्गजों के लिए गले उतरना आसान नहीं रहा है। इसकी ताजी बानगी इंदौर के एक पेड़ मां के नाम कार्यक्रम में दिखी, जहां कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने मुख्यमंत्री की मौजूदगी में ही वन विभाग (जो स्वयं सीएम के पास है) की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए। यह केवल प्रशासनिक शिकायत नहीं, बल्कि एक गहरा राजनीतिक संदेश था कि सरकार में सब कुछ ऑल इज वेल नहीं है।
अफसरशाही का राग और विभागों का विवाद
मंत्रिमंडल के भीतर एक बड़ा मुद्दा ‘अफसरशाही’ के हावी होने का है। लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह और प्रह्लाद सिंह पटेल जैसे नेता कई मौकों पर यह संकेत दे चुके हैं कि फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) के चक्कर काटने पड़ते हैं। यह असंतोष उस वक्त और गहरा गया जब सिंहस्थ-2028 की तैयारियों को लेकर सड़कों की लागत पर कैबिनेट में तीखी बहस हुई। खबर है कि विजयवर्गीय और पटेल ने खुले तौर पर टेंडरों की शर्तों और लागत का विरोध किया, जिसके बाद मुख्य सचिव को हस्तक्षेप करना पड़ा। इसके अलावा, मुख्यमंत्री द्वारा गृह, सामान्य प्रशासन, वन और खनिज जैसे एक दर्जन से अधिक मलाईदार विभाग और इंदौर जैसे राजनीतिक रूप से सक्रिय जिले का प्रभार अपने पास रखना भी वरिष्ठ मंत्रियों की नाराजगी की एक बड़ी वजह बना हुआ है।
शिवराज की ‘समानांतर’ सक्रियता - शिवराज
एक तरफ जहां डॉ. मोहन यादव को पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व, विशेषकर अमित शाह का पूर्ण समर्थन प्राप्त है। जिन्होंने उन्हें शिवराज सिंह चौहान से भी अधिक ऊर्जावान बताया था। वहीं दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रदेश में बढ़ती सक्रियता ने नए कयासों को जन्म दे दिया है। शिवराज ने ‘मामा कोचिंग’ और ‘मामा चलित अस्पताल’ जैसी घोषणाएं कर यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अभी भी मध्य प्रदेश की जनता के दिल में ‘मामा’ के रूप में अपनी जगह सुरक्षित रखना चाहते हैं। दिल्ली में अमित शाह से मुख्यमंत्री, कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद सिंह पटेल की अलग-अलग ‘शाही मुलाकातों’ ने मध्य प्रदेश की राजनीति में किसी बड़े संगठनात्मक या कैबिनेट बदलाव की सुगबुगाहट को तेज कर दिया है।
कैबिनेट से दूरी, भगोरिया में डांस
विजयवर्गीय का भगोरिया उत्सव में आदिवासी नृत्य का वीडियो वायरल होकर विवादों में आ गया है। जिस दिन कृषि कैबिनेट की महत्वपूर्ण बैठक थी, उस दिन विजयवर्गीय इंदौर में त्रिपुरा के सीएम से मिल रहे थे जबकि प्रह्लाद सिंह पटेल भोपाल में ही रुके रहे। यह दोनों मंत्री बैठक से अनुपस्थित थे जिसने सवाल खड़े कर दिए हैं। भगोरिया पर्व मालवा-निमाड़ का प्रमुख आदिवासी उत्सव है जहां विजयवर्गीय ने पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य किया।
जातीय संतुलन और फेरबदल की तलवार
मध्य प्रदेश भाजपा में केवल वरिष्ठ मंत्री ही नहीं, बल्कि कई उपेक्षित जिले और नेता भी मोर्चा खोले हुए हैं। सागर से गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह, जबलपुर से अजय विश्नोई और मालवा से नागर सिंह चौहान की नाराजगी सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई है। 55 में से केवल 25 जिलों को मंत्रिमंडल में स्थान मिलना और जातीय असंतुलन ने इस खींचतान को हवा दी है। कहा जा रहा है कि जल्द ही होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार में फिसड्डी प्रदर्शन करने वाले कई मंत्रियों की छुट्टी हो सकती है और नए चेहरों को जगह दी जाएगी। फिलहाल, भगोरिया में विजयवर्गीय का डांस और कृषि कैबिनेट से वरिष्ठ मंत्रियों की दूरी यह दर्शाती है कि मध्य प्रदेश की सत्ता में ‘शह और मात’ का यह खेल अभी थमा नहीं है, बल्कि एक नई और निर्णायक करवट लेने वाला है।
नाराजगी यूं ही नहीं है...
एक्सपर्ट व्यू
डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बने दो साल से ज्यादा का समय हो चुका है। इन दो वर्षों में उन्होंने न केवल अपने नेतृत्व को स्थापित किया है, बल्कि प्रशासन और संगठन दोनों में अपनी पकड़ भी मजबूत की है। यही वजह है कि कभी इस पद के दावेदार रहे कुछ चेहरों की बेचैनी भी बढ़ती दिखाई देती है, क्योंकि अगर मोहन यादव के पैर इसी तरह मजबूती से जमते चले गए, तो कई लोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं पर स्थायी विराम लग सकता है। समस्या यह है कि फैसला अब व्यक्ति का नहीं, बल्कि पार्टी नेतृत्व का होता है। ऐसे में समय-समय पर खिसियाहट भले ही बाहर आ जाए, लेकिन उसका राजनीतिक नुकसान भी आखिरकार उन्हीं को उठाना पड़ता है।
विनोद तिवारी
राजनीतिक विश्लेषक

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