स्टार समाचार से खास मुलाकात.. हर सवाल का सीधा जवाब

साक्षात्कार : भाजपा के वरिष्ठ नेता उमाशंकर गुप्ता से खास बातचीत
मध्य प्रदेश की राजनीति के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने "स्टार समाचार' से खास बातचीत में जनसंघ से लेकर भाजपा की वर्तमान कार्यसंस्कृति, कुशाभाऊ ठाकरे व प्यारेलाल खंडेलवाल के सानिध्य और अपने लंबे राजनीतिक सफर के अनछुए पहलुओं पर खुलकर चर्चा की। प्रस्तुत हैं इस विशेष साक्षात्कार के प्रमुख अंश:
सवाल: मध्य प्रदेश की राजनीति में आपका सफर रेहटी से भोपाल तक कैसे पहुंचा और राजनीतिक पृष्ठभूमि की शुरुआत कहां से हुई?
जवाब: मेरे पिताजी संघ के स्वयंसेवक और चाचा संगठन मंत्री थे। राजनीतिक पृष्ठभूमि घर से ही मिली। बाल्यकाल से ही संघ का स्वयंसेवक बन गया था। 1968 में गांव से भोपाल आकर सरस्वती शिशु मंदिर में अध्यापन के साथ संघ के काम संभाले।
सवाल: इमरजेंसी के दौर में आप अंडरग्राउंड रहकर काम कर रहे थे। प्यारेलाल खंडेलवाल जी से जुड़ा दिलचस्प किस्सा क्या है?
जवाब: इमरजेंसी में नानाजी (नारायण प्रसाद गुप्ता) ने मुझे काजीपुरा बुलाया। वहां पैंट-शर्ट और चश्मा पहने प्यारेलाल जी बैठे थे। मैं सीधे नानाजी से बात करने लगा, क्योंकि मैं तब राजनीति में सक्रिय नहीं था। जब प्यारेलाल जी खुद बोले, तब पहचाना। उन्होंने कहा, "अगर तू नहीं पहचान पाया, तो मुझे कोई नहीं पहचान पाएगा।"
सवाल: उस दौर में कुशाभाऊ ठाकरे और प्यारेलाल खंडेलवाल जैसे दो अलग-अलग ध्रुव हुआ करते थे?
जवाब: यह समझने की चूक है। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन बड़े फैसले ठाकरे जी, खंडेलवाल जी और नानाजी बैठकर करते थे। बहस के बाद ठाकरे जी का फैसला सर्वमान्य होता था और बाहर कभी असहमति प्रकट नहीं होती थी। कुछ लोगों ने स्वार्थवश उन मतभेदों को बढ़ाया।
सवाल: जब पुराना प्रदेश कार्यालय बन रहा था, तब एसी लगवाने को लेकर कुशाभाऊजी के साथ आपकी नोकझोंक वाला पूरा वाकया क्या था?
जवाब: ठाकरे जी एसी को विलासिता मानकर उसके खिलाफ थे। लखीराम जी की सहमति से मैंने हॉल एसी करने की हामी भरी तो ठाकरे जी भड़क गए। उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर बाहर निकालते हुए कहा—"निकल बदमाश! तेरी चालाकी समझ गया, तूने मनमानी कर ही डाली।" बाद में भोपाल में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के समय उन्होंने माना कि मेरा निर्णय सही था। आज ऐसा खुलापन और बड़प्पन देखने को नहीं मिलता।
सवाल: जब 1990 में भाजपा की सरकार बनी, तब आपकी आधिकारिक रूप से पार्टी में जॉइनिंग और नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनने का वाकया क्या है?
जवाब: मैं भोपाल जिले का संगठन महामंत्री था—यही मेरी पहली ऑफिशियल जॉइनिंग थी। पटवा सरकार के समय मुझे नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनाया गया। मैंने लखीराम जी से कहा कि मेरे पास पहले से संगठन का पद है, आप लिख कर दीजिए कौन सा छोड़ूं। उन्होंने उसी कागज पर लिख दिया कि "फिलहाल दोनों पदों पर काम करिए।"
सवाल: नागरिक आपूर्ति निगम के घाटे के दौर में सख्त मिजाज एमडी धर्मेंद्र नाथ के साथ आपकी ट्यूनिंग और 'जिद' का यह मेल कैसे काम आया?
जवाब: वे बहुत सीनियर और सख्त थे, और मैं अपनी बात पर अड़ने वाला—माइनस-माइनस मिलकर प्लस हो गया! निगम एफसीआई और मिलों से एडवांस खरीद करता था, जिससे भोपाल के एसबीआई अकाउंट पर भारी ब्याज (2-3 करोड़ सालाना) लग रहा था। जब एसबीआई ने जिलों में ओडी लिमिट मैनेज करने से मना किया, तो मैंने लीडिंग बैंकों को बुलाया। उनके कंसेंट देते ही एसबीआई मान गया। ब्याज घटकर 1-2 करोड़ पर आया और निगम मुनाफे में आ गया।
सवाल: 1992 के दंगों के बाद 1993 के कठिन समय में भोपाल 'उत्तर विधानसभा' जैसी हारी हुई सीट के चुनाव संचालक के रूप में क्या रणनीति अपनाई?
जवाब: ठाकरे जी ने चुनौती दी थी कि यहां कोई हिंदू जीत सकता है या नहीं। मैंने 'मैन टू मैन मार्किंग' का सिस्टम बनाया—हर 100 मतदाताओं पर एक कार्यकर्ता तैनात किया। हमारा नारा था—"चूल्हा बाद में जलेगा, वोट पहले डलेगा।" हम 10,000 वोटों के ऐतिहासिक अंतर से जीते।
सवाल: विधायक या मंत्री स्तर की दावेदारी के बाद पार्षद का चुनाव लड़ने को कहा गया, क्या कोई टीस थी?
जवाब: मन में कोई टीस नहीं थी, हमारे संस्कारों में पार्टी निर्देश सर्वोपरि है। कांग्रेस के गढ़ वार्ड 48 से चुनाव लड़े, जीते और फिर पार्षदों की सहमति से महापौर बने।
सवाल: कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में महापौर रहते हुए तालमेल कैसे बैठा?
जवाब: दिग्विजय सिंह जी का पूरा सहयोग मिला। उन्होंने कभी राजनीतिक कारणों से परेशान नहीं किया। म्युनिसिपल एक्ट में मेयर-इन-कौंसिल और 'रिकॉल' जैसी व्यवस्थाएं उन्हीं के कार्यकाल में हमारी सलाह से लागू हुईं।
सवाल: नागरिक आपूर्ति निगम के घाटे को पाटने और 'अन्नदूत योजना' लाने का विचार कैसे आया?
जवाब: वित्तीय विकेंद्रीकरण से निगम को मुनाफे में लाने के बाद, बाद में 'अन्नदूत योजना' के जरिए राशन सीधे मोहल्लों और दुकानों तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई।
सवाल: उच्च शिक्षा मंत्री रहते हुए एमएलबी गर्ल्स कॉलेज को शिफ्ट करने का निर्णय कितना चुनौतीपूर्ण था?
जवाब: छात्राओं की सुरक्षा शिकायतों के चलते यह बड़ा कदम था। तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के सहयोग से मात्र 8 दिन के भीतर एमएलबी कॉलेज को हमीदिया परिसर में शिफ्ट किया और कहीं कोई विरोध नहीं हुआ।
सवाल: गृह मंत्री रहते पुलिस विभाग में क्या बड़े बदलाव किए?
जवाब: पुलिसकर्मियों के तनाव को कम करने के लिए ₹40-50 के मामूली अंशदान पर 8 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा लागू किया। इसके अलावा कांस्टेबल स्तर के लिए 30-35 हजार नए आवास बनवाए और समय पर प्रमोशन सुनिश्चित किया।
सवाल: वर्तमान में भाजपा भवन निर्माण समिति के संयोजक के रूप में क्या काम चल रहा है?
जवाब: मध्य प्रदेश के 62 जिलों में से 30 जिलों में पार्टी कार्यालय बन चुके हैं। 21 जिलों में जमीन अधिग्रहण और निर्माण कार्य प्रगति पर है। हर जिले में सर्वसुविधायुक्त कार्यालय खड़ा करना लक्ष्य है।
सवाल: क्या उमाशंकर गुप्ता की अगली चुनाव लड़ने की कोई इच्छा है?
जवाब: मेरी व्यक्तिगत इच्छा काउंट नहीं करती, पार्टी की इच्छा मायने रखती है। पार्टी जो निर्देश देगी, उसे पूरी निष्ठा से निभाऊंगा।
दिग्गजों पर नजर:
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इबोला वायरस अफ्रीकी देशों में तेजी से फैल रहा है। इसके दुर्लभ बुंडिबुग्यो स्ट्रेन का मौजूदा प्रकोप गंभीर है। डीआर कांगो में हजारों पुष्ट मामले और मौतें दर्ज हुई हैं, वहीं नाइजीरिया, युगांडा और केन्या में सामने आए मामलों ने सीमा पार प्रसार की चिंता बढ़ाई है। फिलहाल इसकी वैक्सीन नहीं होना भी एक बड़ी चुनौती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातस्थिति घोषित किया है।
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मैदान पर पसीना बहाता हुआ एक युवा खिलाड़ी, जिसकी आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना है, और दूसरी तरफ जिन्हें खेल का ‘क, ख, ग’ भी नहीं मालूम, वे नेता और उनके ‘राजदुलारे’ खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है-क्या सूबे की अफसरशाही साहस के संकट से जूझ रही है। नियमों का इकबाल बुलंद करना तो दूर, व्यवस्था में कोई ऐसा दबंग चेहरा नजर नहीं आता जो मनमानी करने वालों पर सीधे नकेल कस सके।
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किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।
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