मैदान पर पसीना बहाता हुआ एक युवा खिलाड़ी, जिसकी आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना है, और दूसरी तरफ जिन्हें खेल का ‘क, ख, ग’ भी नहीं मालूम, वे नेता और उनके ‘राजदुलारे’ खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।

24 खेल संघों पर नेता: मध्यप्रदेश में चुनिंदा खेल संघों का नेतृत्व वास्तविक खिलाड़ी कर रहे
क्रिकेट से ओलंपिक तक: राजघरानों और राजनीतिक दिग्गजों के हाथों में खेल संघों की कमान
विडंबना: नौकरशाहों का नियंत्रण, तो दूसरी तरफ करोड़ों के बजट और अकादमियों के बड़े वादे
उपलब्धि: तमाम राजनीतिक बाधाओं को चीरकर एशियन गेम्स में खिलाड़ियों ने जीते 5 स्वर्ण पदक
अरविंद मिश्रा। भोपाल
मैदान पर पसीना बहाता हुआ एक युवा खिलाड़ी, जिसकी आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना है, और दूसरी तरफ जिन्हें खेल का ‘क, ख, ग’ भी नहीं मालूम, वे नेता और उनके ‘राजदुलारे’ खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। वातानुकूलित कमरों में बैठकर खेल संघों की कुर्सियां तोड़ने वाले चेहरों को शायद यह भी नहीं पता कि क्रिकेट के बल्ले का वजन कितना होता है या फुटबॉल-वॉलीबॉल के खेल के नियम क्या हैं। यह आज के भारतीय खेलों की सबसे कड़वी सच्चाई बन चुका है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद गंभीर और आईना दिखाने वाली टिप्पणी करते हुए कहा-जो लोग बल्ला पकड़ना तक नहीं जानते, वे देश की बड़ी-बड़ी खेल संस्थाओं में उच्च पदों पर बैठे हैं। कोर्ट की यह टिप्पणी सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर करारा प्रहार है, जहां खेल प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं और खेल संघ चंद परिवारों की जागीर बनकर रह गए हैं। मध्य प्रदेश, जो आज खेलो इंडिया और आधुनिक खेल अकादमियों के जरिए खुद को देश का स्पोर्ट्स हब के रूप में पेश कर रहा है, इस सियासत और परिवारवाद के चंगुल से बिल्कुल भी अछूता नहीं है। एक तरफ सरकार 2047 तक प्रदेश को खेल का सिरमौर बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, तो दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि राज्य के लगभग तमाम शीर्ष खेल संघों पर राजघरानों और राजनीतिक दिग्गजों का कब्जा है, जिससे खेल के मैदान अब सियासत के अखाड़े बनकर रह गए हैं। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
खेल संस्थाओं की जमीनी हकीकत
सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि देश के अधिकांश स्पोर्ट्स फेडरेशन वंशवाद और राजनीतिक दखलअंदाजी के शिकार हैं। स्थिति यह है कि पिता के बाद बेटा, पत्नी या परिवार का कोई अन्य करीबी उस पद पर काबिज हो जाता है, और यह सिलसिला दशकों तक बिना किसी रुकावट के चलता रहता है। इन संघों में उन खिलाड़ियों के लिए कोई जगह नहीं होती जिन्होंने अपना पूरा जीवन खेल को समर्पित कर दिया हो।
नेताओं और रसूखदारों का कब्जा
अगर खिलाड़ियों को जगह मिलती भी है, तो वह सिर्फ कागजी खानापूर्ति या नियमों को पूरा करने के लिए दिए गए कुछ मामूली पदों तक सीमित रहती है। नीतियां बनाने और फैसले लेने में खिलाड़ियों की भागीदारी शून्य होती है। राज्य-स्तरीय संघों से लेकर जिला स्तर तक के संघ स्थानीय नेताओं और रसूखदार लोगों का कब्जा बना हुआ है। यही वजह है कि प्रतिभाओं को तलाशने और उन्हें सही मंच देने की प्रक्रिया आज दम तोड़ चुकी है।
पहली पसंद बनी मलाईदार कुर्सी
एक तरफ भारतीय राजनीति में वंशवाद को खत्म करने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के राजनीतिक और खेल इतिहास पर नजर डालें तो साफ झलकता है कि यहां के खेल संघों पर राजघरानों और राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं का गहरा और सीधा दखल रहा है। चाहे वह कांग्रेस के दिग्गज हों या भाजपा के कद्दावर नेता, खेल संगठनों की मलाईदार कुर्सियां हमेशा से राजनेताओं की पहली पसंद रही हैं।
एमपीसीए पर सिंधिया राजपरिवार काबिज
क्रिकेट की इस संस्था पर ऐतिहासिक रूप से ग्वालियर के सिंधिया राजपरिवार का दबदबा रहा है। यह एकाधिकार अब तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुका है। दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया ने लंबे समय तक एमपीसीए का नेतृत्व किया। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी संभाली। वहीं केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए कई वर्षों तक एमपीसीए के अध्यक्ष पद की कमान संभाली और क्रिकेट प्रशासन पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी। इसके बाद ज्योतिरादित्य के बेटे महाआर्यमन सिंधिया को निर्विरोध रूप से एमपीसीए का वर्तमान अध्यक्ष चुना गया, जो इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि खेल संघों में पारिवारिक विरासत कैसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाई जाती है।
ओलंपिक संघ में मेंदोला की रिकॉर्ड ताजपोशी
राज्य की सर्वोच्च खेल संस्था होने के बावजूद, ओलंपिक संघ पर राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों का सीधा और निर्विवाद नियंत्रण रहा है। इंदौर से भाजपा विधायक रमेश मेंदोला यह लगातार पांचवीं बार मध्य प्रदेश ओलंपिक संघ के अध्यक्ष पद पर काबिज हैं। मंत्री विश्वास सारंग भी खेल संघों की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हुए यह ओलंपिक संघ के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। सीएम डॉ. मोहन यादव भी अपने राजनीतिक सफर के दौरान मध्यप्रदेश ओलंपिक संघ की कार्यकारी समिति में उपाध्यक्ष की भूमिका निभा चुके हैं। भाजपा सांसद वीडी शर्मा भी पूर्व में ओलंपिक संघ के उपाध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। वहीं पूर्व विधायक जीतू जिराती यह लंबे समय से मध्य प्रदेश ओलंपिक संघ के कोषाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालते आ रहे हैं।
हॉकी, फुटबॉल में भी सियासी ‘शेर’
क्रिकेट और ओलंपिक के अलावा हॉकी, फुटबॉल, कराटे और बैडमिंटन खेल संघों की स्थिति भी जुदा नहीं है। पूर्व अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी असलम शेर खान, जो बाद में कांग्रेस सांसद और केंद्रीय मंत्री बने। इन्होंने राज्य में हॉकी के प्रशासनिक ढांचे और विकास में अपनी बड़ी राजनीतिक भूमिका निभाई। प्रदेश के कद्दावर नेता मंत्री कैलाश विजयवर्गीय मध्य प्रदेश कराटे एसोसिएशन के मुख्य संरक्षकों में से एक हैं। वहीं देवास राजपरिवार और भाजपा नेता विक्रम सिंह पवार भी मध्यप्रदेश कराटे एसोसिएशन के डायरेक्टर पद पर सक्रिय रहे हैं। राजनेता आलोक चांसोरिया मध्य प्रदेश फुटबॉल एसोसिएशन के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। इधर नितिन ढिमोले हॉकी मध्य प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष हैं। वह अक्टूबर 2026 में हुए चुनावों में लगातार पांचवीं बार निर्विरोध हॉकी मध्य प्रदेश के अध्यक्ष चुने गए हैं। वह भारतीय रेलवे के पूर्व मुख्य सामग्री प्रबंधक भी हैं।
कार्तिकेय के हाथ वॉलीबॉल की कमान
मध्य प्रदेश के खेल संगठनों पर सियासत और परिवारवाद का शिकंजा किस कदर कस चुका है, इसकी बानगी अन्य फेडरेशनों में भी साफ दिखाई देती है। वॉलीबॉल संघ की कमान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान के पास है, जिन्हें निर्विरोध अध्यक्ष चुना गया है। बैडमिंटन एसोसिएशन में अनिल चौगुले 26 साल से और भोपाल संघ में जय सिंह मथारू 40 साल से सचिव पद पर जमे हंै। बॉक्सिंग, तैराकी, सॉफ्टबॉल और राइफल एसोसिएशन जैसे महत्वपूर्ण संघों की बागडोर भी भाजपा नेताओं और विधायकों जैसे रमेश मेंदोला, संजय सेठ व दिग्विजय सिंह के हाथों में है। हैरानी की बात यह है कि खिलाड़ियों को महज नाममात्र के लिए सलाहकार या संयुक्त सचिव जैसे पद थमाए गए हैं। हद तो तब हो जाती है जब टेबल टेनिस एसोसिएशन में परिवारवाद देखने को मिलता है। जहां पद छोड़ने वाले पदाधिकारियों की जगह उनके अपने भाई प्रमोद सोनी (ओम सोनी के भाई) और पूर्व सचिव की पत्नी रिंकू आचार्य को नया अध्यक्ष व सचिव बना दिया गया। जयेश और रिंकू आचार्य अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी रहे हैं। दोनों टेबल टेनिस की ट्रेनिंग भी देते हैं।
विस अध्यक्ष के दोनों बेटे भी खेल संघों में
मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के दोनों बेटे खेल संघों में अहम पदों पर काबिज हैं। उनके बड़े बेटे देवेंद्र प्रताप सिंह तोमर हॉकी इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इससे पहले वे मध्य भारत हॉकी संघ के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। वहीं, उनके छोटे बेटे प्रबल प्रताप सिंह तोमर पेनचक सिलाट फेडरेशन आफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और दिल्ली-यूपी की एसोसिएशन आफ मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय हैं।
इंदौर की संभागीय पिच पर टिके आकाश
राजनीतिक घरानों के इस प्रभाव का एक और बड़ा उदाहरण पूर्व विधायक आकाश विजयवर्गीय भी हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय को 2023 के विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिला था, जिसके बाद उन्होंने खेल संगठन की ओर रुख किया और जनवरी 2024 में इंदौर संभागीय क्रिकेट संगठन के निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए। दिलचस्प यह है कि इस पद पर पहले उनके पिता भी अपनी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
ध्रुव भी बने भोपाल संभाग के ‘नारायण’
मध्यप्रदेश में राजनीतिक घरानों के युवा चेहरों के अलावा पुराने और जाने-माने राजनेता भी खेल संघों की कुर्सियों पर मजबूती से पैर जमाए हुए हैं। इसी कड़ी में पूर्व विधायक ध्रुव नारायण सिंह भोपाल संभाग क्रिकेट संघ के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, जो यह साबित करता है कि मध्य प्रदेश के खेल संघों की कमान आज भी राजनीतिक दिग्गजों और उनके परिवारों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है।
चमकदार आधुनिक खेल अकादमियां
एक तरफ जहां खेल संगठनों में भाई-भतीजावाद और राजनीतिक दखल हावी है। वहीं दूसरी ओर सरकारी स्तर पर खेल बुनियादी ढांचे को सुधारने और अकादमियां खोलने के मोर्चे पर बड़े कदम भी उठाए गए हैं। मध्य प्रदेश इस मामले में देश के अग्रणी राज्यों में शुमार है। प्रदेश में 18 खेलों की कुल 11 खेल अकादमियां संचालित हो रही हैं, जहां हजार से ऊपर खिलाड़ियों को दक्ष किया जा रहा है। खेल इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में मध्य प्रदेश ने लंबी छलांग लगाई है। प्रदेश में 20 अंतर्राष्ट्रीय स्तर के हॉकी सिंथेटिक टर्फ, 10 सिंथेटिक एथलेटिक ट्रैक और 120 से अधिक आधुनिक स्टेडियम एवं खेल परिसर विकसित किए जा चुके हैं। सरकार का महत्वाकांक्षी लक्ष्य वर्ष 2047 तक मध्यप्रदेश को भारत का प्रमुख स्पोर्ट्स हब बनाने का है। राज्य सरकार ने घोषणा की है कि युवा खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रदेश के सभी 55 जिलों में अत्याधुनिक खेल स्टेडियमों का निर्माण किया जाएगा, ताकि जिला स्तर पर प्रतिभाओं को निखारा जा सके।
140 विधानसभा सीटों पर खेल मैदान नहीं
भले ही बड़े-बड़े शहरों और अकादमियों में शानदार सुविधाएं देने का दावा कर रही हो, लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। मध्य प्रदेश की कुल 230 विधानसभा सीटों में से आज भी 140 सीटें ऐसी हैं जहां व्यवस्थित खेल मैदान या पूर्ण खेल सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं, जबकि शेष 90 स्थानों पर पहले से खेल सुविधाएं मौजूद हैं। इस खाई को पाटने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने सभी 230 विधानसभा क्षेत्रों में खेल सुविधाओं के विस्तार का बड़ा निर्णय लिया है।
नए मुख्यमंत्री स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स
मध्यप्रदेश की जिन 140 विधानसभा सीटों पर खेल मैदान नहीं हैं, वहां अत्याधुनिक मुख्यमंत्री स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स बनाए जाएंगे। जिन 90 विधानसभा क्षेत्रों में पहले से खेल मैदान या सुविधाएं मौजूद हैं, उन्हें अपग्रेड कर आधुनिक मानकों के अनुरूप पूरा किया जाएगा। इस योजना के तहत प्रत्येक कॉम्प्लेक्स में 10 से 12 तरह के इंडोर और आउटडोर खेल खेलने की सुविधा होगी। इसके साथ ही आवश्यकतानुसार वीवीआईपी मूवमेंट और आपातकालीन स्थितियों के लिए हेलीपैड की सुविधा भी विकसित की जाएगी।
खेल संघ में केवल 10 फीसदी खिलाड़ी
मध्य प्रदेश के खेल संघों में पसीना बहाने वाले खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों की कोई पूछ नहीं है, बल्कि इन पर पूरी तरह राजनेताओं और नौकरशाहों का वर्चस्व कायम है। प्रदेश की कुल 50 खेल एसोसिएशनों में से 24 की कमान सीधे तौर पर राजनेताओं के हाथों में है। हालात यहीं नहीं रुकते, 15 संघों के अध्यक्ष सरकारी कर्मचारी या नौकरशाह हैं। सबसे अधिक हैरानी और चिंता की बात यह है कि पूरे सूबे में मात्र 5 से 7 एसोसिएशन ऐसी हैं जिनका नेतृत्व वास्तविक खिलाड़ी कर रहे हैं।
एशियन गेम्स: एमपी के खिलाड़ियों जीते 5 स्वर्ण
-एशियन गेम्स में प्रदेश की तीन बेटियों का कमाल
एशियन गेम्स-2026 में मध्य प्रदेश के खिलाड़ियों ने अपनी बेहतरीन खेल प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए कुल 5 स्वर्ण मेडल जीतकर प्रदेश का नाम पूरे देश और दुनिया में रोशन किया है। राज्य के इन होनहार खिलाड़ियों ने अलग-अलग खेल स्पर्धाओं में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश के लिए यह गौरवशाली उपलब्धि हासिल की है। इन प्रमुख स्वर्ण पदक विजेताओं में क्रांति गौड़ शामिल हैं, जिन्होंने भारतीय महिला क्रिकेट टीम की ओर से खेलते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। शूटिंग की दुनिया में नीरू ढांडा ने अद्भुत प्रदर्शन करते हुए शॉर्ट गन ट्रैप महिला व्यक्तिगत श्रेणी और शॉर्ट गन ट्रैप मिक्स्ड टीम इवेंट दोनों में दो स्वर्ण पदक प्राप्त किए हैं। पुरुष हॉकी वर्ग में विवेक सागर प्रसाद और नीलकांत शर्मा ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाते हुए स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय पुरुष हॉकी टीम में अहम भूमिका निभाई। वहीं, महिला हॉकी टीम में शामिल मध्य प्रदेश की ईशिका चौधरी, बिच्छू देवी और सुशीला चानू ने भी भारतीय महिला हॉकी टीम की ऐतिहासिक खिताबी जीत में अपनी अहम भागीदारी से प्रदेश का मान बढ़ाया है।
खेलों के लिए खोला खजाना
मध्यप्रदेश सरकार के वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में खेलों के विकास के लिए खजाना खोलते हुए कुल 815 करोड़ का बड़ा प्रावधान किया गया है। बजट में खेल और युवा कल्याण को बढ़ावा देने के लिए विशेष वित्तीय योजनाएं बनाई गई हैं, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा खेलो इंडिया एमपी के लिए 230 करोड़ (यानी कुल खेल बजट का 28 प्रतिशत हिस्सा) तय किया गया है, जो इस योजना की गतिविधियों पर खर्च होगा। प्रदेश में खेल अकादमियों की स्थापना और संचालन के लिए 164 करोड़ आवंटित किए गए हैं। वहीं, राज्यभर में नए स्टेडियमों और मजबूत खेल अधोसंरचना के लिए 161 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
अकादमी और जिलों में प्रशिक्षक का टोटा
-कागजी दावों और खाली पदों की हकीकत
-प्रशिक्षकों के लगभग 70 फीसदी पद खाली
मध्यप्रदेश के खेल को बेहतर बनाने और खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षित करने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर खेल अकादमियों और जिलों में प्रशिक्षकों (कोच) के भारी टोटे से व्यवस्था जूझ रही है। स्थिति यह है कि मध्य प्रदेश के जिलों में सरकारी व नियमित खेल प्रशिक्षकों के लगभग 70 फीसदी से अधिक पद पिछले 10 से 15 वर्षों से लगातार खाली पड़े हैं। रिक्तियों को भरने के लिए खेल एवं युवा कल्याण विभाग समय-समय पर संविदा, पे एंड प्ले योजना या मानदेय आधारित अस्थाई नियुक्तियों का सहारा ले रहा है। संचालित 8 से अधिक प्रमुख खेल अकादमियों में रिक्तियों को भरने के लिए उच्च तकनीकी प्रशिक्षक सह सलाहकार के पदों पर विज्ञापन जारी कर प्रक्रिया चलाई जा रही है। इसके अलावा, जिलों में खेलो इंडिया केंद्र के छोटे सेंटरों पर कांट्रैक्ट बेसिस पर कोच रखे जा रहे हैं। स्टेडियमों में व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थानीय समितियों के माध्यम से मानदेय पर प्रशिक्षकों की व्यवस्था की जा रही है।
खेल संघों में नेता पुरानी परंपरा

मध्यप्रदेश के खेल संघों में नेताओं के काबिज रहने की पुरानी परंपरा है, जो आज भी जारी है। एमपीसीए ही देख लें, जहां ऐतिहासिक रूप से ग्वालियर के सिंधिया राजपरिवार का दबदबा रहा है, जो आज भी कायम है। दरअसल, खिलाड़ियों का अच्छा प्रशासक न होना मानकर नेता और नौकरशाहों को प्राथमिकता दी जाती है। हालांकि, खेल सुधार और स्कूल-कॉलेजों में खेलों को बढ़ावा मिलने की स्थिति अच्छी है, पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अधिकांश जगह प्रशिक्षकों का अभाव है। मैदानों पर सुविधाएं नहीं हैं, और जहां सुविधाएं हैं वहां खिलाड़ी नहीं पहुंचते। जिला और तहसील स्तर प्रतिभाओं की कमी नहीं है।
-जयराम शुक्ला, वरिष्ठ विश्लेषक, विंध्य
हजारों खिलाड़ी उपेक्षा का शिकार

मध्य प्रदेश में आज हजारों बेहतरीन खिलाड़ी उपेक्षा का शिकार हैं। गांवों में खेल सुविधाओं और अच्छे मैदानों का अभाव है, और जहां मैदान हैं वहां संसाधन नहीं हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि खेल संघों में उन लोगों को बिठा दिया जाता है जिनका खेल से कोई वास्ता नहीं होता, जबकि इन पदों पर खिलाड़ियों को होना चाहिए। सभी खेल संघों में प्रशासनिक क्षमता और खेल अनुभव का संतुलन जरूरी है। मैं खुद टेनिस में मध्य प्रदेश का द्वितीय रैंक का खिलाड़ी रहा हूं, लेकिन आज पूछने वाला कोई नहीं है। हमारे समय में शहडोल, इंदौर और बिलासपुर में खेल प्रतियोगिताएं होती थीं और कैमोर में देशभर के टेनिस खिलाड़ी आते थे।
-अरविंद सिंह परिहार, राज्य स्तरीय टेनिस खिलाड़ी, मऊगंज
अनुभवी खिलाड़ियों की हो भागीदारी

मध्यप्रदेश के खेल संघों की भूमिका पर संतोषजनक कहना कठिन है। खेल संघों में राजनीतिक हस्तक्षेप और गैर-खिलाड़ियों के नियंत्रण से पारदर्शिता प्रभावित होती है। जिला और जमीनी स्तर पर टैलेंट हंट-चयन प्रक्रियाओं में पक्षपात, गुटबाजी और ढिलाई के कारण योग्य खिलाड़ी पीछे छूट जाते हैं। इसके समाधान के लिए संघों में प्रशासनिक क्षमता व खेल अनुभव का संतुलन जरूरी है। स्पोर्ट्स डेवलपमेंट कोड के तहत आयु सीमा और कार्यकाल के नियमों का सख्ती से पालन अनिवार्य हो। साथ ही निर्णय लेने वाली कमेटियों में 60-70 फीसदी अनुभवी खिलाड़ियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। ताकि वास्तविक खेल हित सुरक्षित रहें।
-सृष्टि मिश्रा त्रिपाठी, अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी, राइफल शूटिंग, भोपाल
खेल संघों में भाई-भतीजावाद हावी

मैं खुद थाईलैंड, नेपाल और कोरिया में देश का प्रतिनिधित्व कर चुका हूं। ताइक्वांडो में दो स्वर्ण पदक जीत चुका हूं, लेकिन भाई-भतीजावाद और जातिवाद के आगे मेरी मेहनत दम तोड़ गई। यहां तक कि मुझे प्रतियोगिताओं में जाने के लिए चंदा जुटाना पड़ा था। आज एक निजी स्कूल में पीटीआई के रूप में सेवा देने को मजबूर हूं। खेल संघों में बिना किसी खेल ज्ञान वाले नेताओं का दखल बढ़ रहा है। अपनी जय-जयकार के भूखे लोगों की वजह से खेल नियमावली और खिलाड़ियों की बुनियादी सुविधाएं दरकिनार हो रही हैं। खेल संघों को राजनीतिक चेहरों से मुक्त कर असली खिलाड़ी को प्राथमिकता देनी होगी।
-प्रकाश प्रजापति, अंतरराष्ट्रीय ताइक्वांडो स्वर्ण पदक विजेता, सीधी

मैदान पर पसीना बहाता हुआ एक युवा खिलाड़ी, जिसकी आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना है, और दूसरी तरफ जिन्हें खेल का ‘क, ख, ग’ भी नहीं मालूम, वे नेता और उनके ‘राजदुलारे’ खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है-क्या सूबे की अफसरशाही साहस के संकट से जूझ रही है। नियमों का इकबाल बुलंद करना तो दूर, व्यवस्था में कोई ऐसा दबंग चेहरा नजर नहीं आता जो मनमानी करने वालों पर सीधे नकेल कस सके।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। हर रविवार को सुशील शर्मा की कलम से
किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। निर्माण विभाग की वेबसाइट से संपत्ति का ब्योरा गायब, दो संभागों में अफसरों की तनातनी और अन्य चर्चित मामले विस्तार से पढ़ें।
ग्वालियर की चंबल माटी से छात्र राजनीति के शिखर तक पहुंचे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के पूर्णकालिक कार्यकर्ता से मध्य प्रदेश युवा आयोग के अध्यक्ष बने प्रवीण शर्मा के साथ स्टार समाचार की खास बातचीत।
मध्य प्रदेश भाजपा में संगठन महामंत्री का पद केवल एक राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक संतुलन, सख्त अनुशासन और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने वाली मुख्य धुरी माना जाता है। नौ महीनों से इस शीर्ष पद का खाली होना पार्टी के भीतर एक बड़ी ‘कमी’ को बयां कर रहा है।
पॉलिसी बेचते समय मुस्कुराते चेहरों के साथ कैशलेस इलाज और झटपट दावों का प्रलोभन देने वाली बीमा कंपनियों की असलियत क्लेम के वक्त सामने आ रही हैं। नियम-शर्तों की बारीक लाइनों का जाल बुनकर आम जनता की गाढ़ी कमाई हड़पने और उनके दावों को खारिज करने की मनमानी का यह खेल अब बड़ी समस्या बन चुका है।
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