मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है-क्या सूबे की अफसरशाही साहस के संकट से जूझ रही है। नियमों का इकबाल बुलंद करना तो दूर, व्यवस्था में कोई ऐसा दबंग चेहरा नजर नहीं आता जो मनमानी करने वालों पर सीधे नकेल कस सके।

अरविंद मिश्रा। भोपाल
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है-क्या सूबे की अफसरशाही साहस के संकट से जूझ रही है। नियमों का इकबाल बुलंद करना तो दूर, व्यवस्था में कोई ऐसा दबंग चेहरा नजर नहीं आता जो मनमानी करने वालों पर सीधे नकेल कस सके। जनहित के कड़े फैसलों के बजाय, हुक्म के आगे सिर झुकाना ही यहां के आईएएस और आईपीएस अफसरों की पहचान बनती जा रही है। जहां देश के अन्य राज्यों में सख्त अफसरों ने नेताओं और कारोबारियों को हमेशा कानून के दायरे में रखा। वहीं मध्य प्रदेश में सन्नाटा और समर्पण ही दिखाई देता है। ऐसा भी नहीं है कि राज्य में प्रशासनिक अधिकारियों की कोई कमी है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, आईपीएस के स्वीकृत 319 पदों में से 271 अफसर तैनात हैं, जिसमें 222 सीधी भर्ती और 97 राज्य पुलिस सेवा कोटे के हैं। इनके अलावा 271 आईएएस, 209 आईएफएस और राज्य पुलिस सेवा के 1,269 अधिकारी (जिनमें 265 एएसपी और 104 डीएसपी शामिल हैं) मैदान में मुस्तैद हैं। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में नौकरशाही को कानून-व्यवस्था की असली रीढ़ माना गया है, लेकिन मध्यप्रदेश में जब भी निष्पक्ष और बेबाक फैसलों की बात आती है, तो स्थिति बिल्कुल उलट दिखती है। महाराष्ट्र में एफडीए कमिश्नर तुकाराम मुंढे जैसे निर्भीक अफसर हुए, जिन्होंने राजनीतिक दबाव के आगे झुके बिना जीरो टॉलरेंस की मिसाल पेश की। इसके ठीक विपरीत, मध्यप्रदेश में यदि किसी अफसर ने व्यवस्था को चुनौती देने या जनहित में सख्त रुख अपनाने की हिम्मत दिखाई, तो उसका नतीजा अक्सर तबादले, साइड पोस्टिंग या फिर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के रूप में ही सामने आया है।
पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।

एमपी का सिंघम: आईपीएस गौरव तिवारी, मप्र में हिला दी थी हवाला कांड की जड़ें

भारतीय पुलिस सेवा में कुछ अधिकारी ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान न केवल उनकी वर्दी से होती है, बल्कि उनके अदम्य साहस, ईमानदारी और निडर कार्यशैली से भी होती है। मध्य प्रदेश कैडर के 2010 बैच के आईपीएस गौरव तिवारी एक ऐसा ही नाम हैं। तिवारी को एमपी का सिंघम के नाम से याद किया जाता है। गौरव तिवारी की कार्यशैली उन्हें दूसरे अधिकारियों से अलग बनाती है। वे एक तेजतर्रार और दबंग अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने हमेशा कानून के शासन को सर्वोच्च रखा। चाहे वे छिंदवाड़ा, बालाघाट, रतलाम या कटनी में तैनात रहे हों, उन्होंने अपनी निष्पक्षता से जनता का दिल जीता। बालाघाट में लकड़ी माफियाओं के खिलाफ उनकी कार्रवाई ने उनके इरादे साफ कर दिए थे। छिंदवाड़ा और रतलाम में भी उन्होंने एसपी के रूप में उत्कृष्ट सेवाएं दीं। गौरव तिवारी के करियर का सबसे चर्चित अध्याय कटनी जिले में उनकी तैनाती के दौरान लिखा गया। कटनी के एसपी के रूप में, उन्होंने राज्य के इतिहास के सबसे बड़े हवाला कांड का पदार्फाश किया था। यह कोई साधारण केस नहीं था, इसमें 500 करोड़ रुपए से अधिक के अवैध लेन-देन और रसूखदारों के तार सीधे जुड़े हुए थे। गौरव तिवारी ने इस सिंडिकेट पर शिकंजा कसा और जांच को उस स्तर तक ले गए जहां तक पहुंचने की हिम्मत पहले किसी ने नहीं की थी। जैसे ही जांच की आंच उच्च राजनीतिक और व्यापारिक गलियारों तक पहुंचने लगी तो तिवारी का रातों-रात तबादला कर दिया गया। अंतत: इस प्रशासनिक माहौल से दूर होकर उन्होंने केंद्र में सेवाएं देना बेहतर समझा।
भोपाल: रसूखदारों के आगे बेबस प्रशासन, जनता हताश, अदालत बनी आखिरी उम्मीद
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से प्रशासनिक नाकामी और अनदेखी की एक बेहद गंभीर तस्वीर सामने आ रही है। शहर की जीवनरेखा और ऐतिहासिक धरोहर बड़ा तालाब आज भू-माफियाओं और रसूखदारों के अवैध कब्जों की गिरफ्त में है। तटीय और कैचमेंट इलाकों में नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए बड़े-बड़े रिसॉर्ट, रेस्टोरेंट, मैरिज गार्डन और पक्के निर्माण खड़े कर लिए गए। विडंबना यह है कि सब कुछ आंखों के सामने होने के बावजूद जिला प्रशासन, नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कोई भी जिम्मेदार अधिकारी इन पर कोई सख्त कार्रवाई या बुलडोजर चलाने की हिम्मत नहीं जुटा सका। अनदेखी और ढिलाई से हताश होकर अंतत: पर्यावरणविदों और आम नागरिकों को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि एनजीटी और न्यायपालिका को स्वयं संज्ञान लेकर दखल देना पड़ रहा है। एनजीटी का हस्तक्षेप प्रशासनिक तंत्र की साख पर सीधे सवाल खड़े करता है। जो कार्रवाई कलेक्टर, भोपाल पुलिस कमिश्नर, नगर निगम आयुक्त और नगरीय प्रशासन विभाग के अधिकारियों को अपनी ड्यूटी के तहत करनी चाहिए थी, उसके लिए न्यायपालिका के आदेश का इंतजार क्यों।
राजनीतिक दबाव में नौकरशाही, प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी
मध्य प्रदेश में अधिकारियों की इस निष्क्रियता के पीछे सबसे बड़ी वजह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और तबादले (ट्रांसफर-पोस्टिंग) का डर है। जब अफसरों को यह साफ समझ आ जाता है कि किसी ताकतवर या रसूखदार व्यक्ति पर हाथ डालने का मतलब सिर्फ लूप-लाइन में भेजा जाना या मानसिक परेशानी झेलना है, तो वे चुपचाप जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने देने में अपनी भलाई समझते हैं। महाराष्ट्र के तुकाराम मुंढे जैसे सख्त और नियम-कायदों से चलने वाले अधिकारियों को इस व्यवस्था में सिस्टम-फ्रेंडली नहीं माना जाता। राजनीतिक आकाओं को ऐसे अफसर ज्यादा पसंद आते हैं जो उनकी जी-हजूरी करें और रसूखदारों के हितों पर आंच न आने दें। इसका नतीजा यह होता है कि जनहित के जरूरी मुद्दों पर अधिकारी फाइलों को लटकाने और जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टालने में माहिर हो जाते हैं। मध्य प्रदेश में अक्सर नेता, सांसद, विधायक और मंत्री यह शिकायत करते दिखते हैं कि प्रदेश में अफसरशाही हावी है और अधिकारी किसी की सुनते ही नहीं हैं, जिससे जनता के काम अटक रहे हैं। जबकि कड़वी सच्चाई इसके ठीक उलट है। प्रदेश में अफसरशाही नहीं, बल्कि अफसरों पर नेतागिरी हावी है। मंचों से भाषणों में तो अधिकारियों को निष्पक्ष काम करने का फ्री हैंड दे दिया जाता है, लेकिन धरातल पर उसकी कोई झलक देखने को नहीं मिलती।
मुंबई का ‘बॉम्बे बुलडोजर’ थे जीआर खैरनार, दाऊद और अंडरवर्ल्ड की संपत्तियों पर बुलडोजर

जीआर खैरनार मुंबई नगर निगम के पूर्व उपायुक्त थे, जिन्हें 1990 के दशक में उनकी निडरता, कड़क रवैये और बिना किसी राजनीतिक दबाव के की गई बुलडोजर कार्रवाई के कारण मुंबई का बॉम्बे बुलडोजर कहा जाता था। 90 के दशक में जब मुंबई में दाऊद इब्राहिम और अंडरवर्ल्ड का खौफ चरम पर था, तब खैरनार ने बिना किसी डर के दाऊद इब्राहिम और उसके करीबियों की अवैध इमारतों व कब्जों पर बुलडोजर चलवा दिया। खैरनार ने सिर्फ अपराधियों ही नहीं, बल्कि सत्ताधारी नेताओं, विधायकों और बड़े बिल्डरों के अवैध निमार्णों को भी नहीं बख्शा। नियमों को ताक पर रखकर बनाए गए अवैध रेस्टोरेंट, दुकानें और मैरिज हॉल उन्होंने मिनटों में जमींदोज करवा दिए। अपने कार्यकाल के दौरान खैरनार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार और सरकार पर भ्रष्टाचार और भू-माफियाओं को संरक्षण देने के सीधे आरोप लगाए। इसके बाद उन्हें सेवा से निलंबित कर दिया गया था। हालांकि बाद में अदालत के आदेश से उन्हें ससम्मान बहाल किया गया। जीआर खैरनार का नाम आज भी भारतीय नौकरशाही में प्रतीक माना जाता है।
जब चुनाव आयोग को मिली असली ताकत, टीएन शेषन का ऐतिहासिक रहा कार्यकाल

भारत के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का कार्यकाल (1990-1996) भारतीय चुनावी व्यवस्था में एक मील का पत्थर है। उन्होंने संवैधानिक शक्तियों का कड़ा इस्तेमाल कर चुनाव आयोग को एक शक्तिशाली और स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित किया। उस दौर में कहावत मशहूर हुई नेता केवल दो चीजों से डरते हैं-भगवान से और टीएन शेषन से। बोगस वोटिंग रोकने के लिए उन्होंने वोटर आईडी अनिवार्य किया। सरकारी तंत्र, गाड़ियों और हेलीकॉप्टरों के चुनावी दुरुपयोग पर पूर्ण रोक लगाई। संवेदनशील राज्यों में बहु-स्तरीय मतदान और केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती कर निष्पक्ष चुनाव कराए। शराब-रिश्वत बांटने, रात 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर बजाने और धर्म-जाति के नाम पर वोट मांगने पर कड़ा प्रतिबंध लगाया। चुनावी प्रणाली में इस अभूतपूर्व सुधार के लिए उन्हें 1996 में प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
आधुनिक भोपाल के निर्माता एमएन बुच, सुनियोजित शहरी विकास की मिसाल

मध्य प्रदेश के प्रशासनिक और शहरी विकास के इतिहास में 1957 बैच के आईएएस अधिकारी स्व. महेश नीलकंठ बुच का कार्यकाल ऐतिहासिक और दूरदर्शी रहा। देश में सुनियोजित शहरी नियोजन के अग्रदूत माने जाने वाले बुच को आधुनिक भोपाल का निर्माता कहा जाता है। उन्होंने राज्य को आधुनिक आधारभूत ढांचा प्रदान करने में केंद्रीय भूमिका निभाई। 1970 के दशक में भोपाल कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त रहते हुए उन्होंने शहर के व्यवस्थित विकास का मास्टर प्लान तैयार किया। भोपाल की जीवनरेखा बड़े तालाब को प्रदूषण और अतिक्रमण से बचाने के साथ-साथ वन विहार राष्ट्रीय उद्यान और ग्रीन बेल्ट की नींव रखकर उन्होंने विकास और पर्यावरण में अभूतपूर्व संतुलन कायम किया। शहर को तकनीकी और कानूनी ढांचा देने के लिए उन्होंने भोपाल विकास प्राधिकरण और नगर तथा ग्राम निवेश विभाग का गठन किया। प्रसिद्ध वास्तुकार चार्ल्स कोरिया के साथ मिलकर देश-विदेश में कला व संस्कृति के प्रमुख केंद्र भारत भवन का निर्माण कराया। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने पर्यावरण व शोध को बढ़ावा दिया। प्रशासनिक सेवा, पर्यावरण संरक्षण और शहरी विकास में उत्कृष्ट योगदान के लिए केंद्र सरकार ने 2011 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।
2जी स्पेक्ट्रम और कोल घोटाले का पर्दाफाश, आईएएस विनोद राय का चर्चित कार्यकाल

पूर्व आईएएस विनोद राय भारत के प्रशासनिक इतिहास के सबसे निडर और प्रभावशाली अधिकारियों में गिने जाते हैं। 1972 बैच के केरल कैडर के आईएएस विनोद राय ने 2008 से 2013 तक भारत के 11वें सीएजी के रूप में कार्य किया। उनके इस कार्यकाल ने भारतीय राजनीति और नौकरशाही को नई दिशा दी। पारंपरिक आडिटिंग से इतर, उन्होंने परफॉर्मन्स आडिट पर जोर देकर सीएजी को जनता के पैसे के सच्चे संरक्षक के रूप में स्थापित किया। उनके कार्यकाल में कैग ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन (1.76 लाख करोड़ का नुकसान), कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाला (1.86 लाख करोड़) और 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में हुई अनियमितताओं का भंडाफोड़ किया। इन रिपोर्टों से देश में तहलका मच गया था। बाद में, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बीसीसीआई के प्रशासन को सुधारने के लिए गठित प्रशासकों की समिति का प्रमुख नियुक्त किया। सिविल सेवा में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2016 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।
अफसर का साहस, सीएम का ‘बड़प्पन’, अब उज्जैन में चली सीमांकन की जंजीर

सिंहस्थ महाकुंभ-2028 की भव्य और सुगम तैयारियों के बीच उज्जैन के प्रशासनिक गलियारों से साहस और निष्पक्षता की एक मिसाल सामने आई है। शहर में जारी चौड़ीकरण अभियान के तहत नगर निगम कमिश्नर अभिलाष मिश्रा ने बिना किसी राजनीतिक दबाव के सीधे मुख्यमंत्री के पैतृक घर का भी सीमांकन (नाप-जोख) करवा दिया। जब कमिश्नर के निर्देश पर निगम अमला सीएम के पैतृक घर पहुंचा, तो आम जनता से लेकर प्रशासनिक हलके में हलचल मच गई। इस कदम ने यह संदेश साफ कर दिया कि जब बात शहर के विकास और सार्वजनिक हित की हो, तो नियम सबके लिए समान हैं। निगम कमिश्नर के इस साहसिक और निष्पक्ष कार्य की सराहना खुद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी की। साथ ही सीएम स्वयं सामने आए और उन्होंने अपने घर के चिन्हित हिस्से को हटाने के लिए पहली कुदाल खुद चलाई। मुख्यमंत्री के इस कदम ने न केवल महाकुंभ की तैयारियों को गति दी, बल्कि कानून का पालन करने का एक मिसाल भी कायम किया।
मध्यप्रदेश के तीन आईपीएस टॉप-100 पुलिस कप्तानों में शामिल

प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान फेम इंडिया और एशिया पोस्ट द्वारा 12 अगस्त-2026 को जारी देश के 100 सर्वश्रेष्ठ पुलिस कप्तानों (एसपी, एसएसपी, डीसीपी) की सूची में मध्य प्रदेश का नाम रोशन हुआ है। राज्य के तीन तेजतर्रार आईपीएस समीर सौरभ, पूर्व मुरैना एसपी, संपत उपाध्याय एसपी, जबलपुर और श्रद्धा तिवारी डीसीपी, पीएचक्यू ने इस राष्ट्रीय सर्वेक्षण में अपनी जगह बनाई है। यह चयन अपराध नियंत्रण, जनमित्र पुलिसिंग, त्वरित निर्णय क्षमता, पारदर्शी कार्यशैली और संकट प्रबंधन जैसे कड़े मानकों पर किया गया है। मध्य प्रदेश पुलिस महकमे के लिए यह गर्व का क्षण है। अगले चरण में इन चयनित 100 अधिकारियों के प्रदर्शन का पुन: मूल्यांकन कर देश के टॉप 25 कप्तानों की विशेष सूची तैयार की जाएगी।
जांबाज महिला अफसर ने आसाराम को सिखाया था सबक

नाबालिग से रेप के दोषी आसाराम की पैरोल के बीच एक बार फिर राजस्थान पुलिस की जांबाज महिला अधिकारी चंचल मिश्रा की निडरता चर्चा में है। राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा आसाराम को 20 दिन की पैरोल देने के आदेश के बाद उस ऐतिहासिक गिरफ्तारी की यादें ताजा हो गई हैं, जब एक महिला अफसर ने रसूख और दबाव के सारे पैंतरे नाकाम कर दिए थे। 2013 में केस की मुख्य जांच अधिकारी आरपीएस चंचल मिश्रा महज चार जवानों की टीम लेकर इंदौर आश्रम पहुंची थीं। आसाराम ने गिरफ्तारी से बचने के लिए अपने प्रभाव और समर्थकों का पूरा इस्तेमाल किया, लेकिन चंचल मिश्रा टस से मस नहीं हुईं। उन्होंने आसाराम को इंदौर से हिरासत में लिया और तुरंत फ्लाइट से 650 किमी दूर जोधपुर ले जाकर अदालत में पेश किया। पीड़िता को न्याय दिलाने में चंचल मिश्रा की भूमिका सबसे अहम रही। तमाम धमकियों और भारी दबावों को दरकिनार कर उन्होंने अपने कानूनी अधिकारों का मजबूती से पालन किया और एक बड़े अपराधी को सलाखों के पीछे पहुंचाया।
जबलपुर में 100 करोड़ के शिक्षा घोटाले का खुलासा, आईएएस दीपक सक्सेना का ऐतिहासिक एक्शन

जबलपुर के तत्कालीन कलेक्टर दीपक सक्सेना ने अपने 20 महीने के कार्यकाल के दौरान शिक्षा माफिया और निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ ऐतिहासिक कार्रवाई की थी। वर्ष 2024 में की गई कार्रवाई में 100 करोड़ का फीस घोटाला उजागर किया था। शहर के कई नामी निजी स्कूलों ने नियमों को ताक पर रखकर अभिभावकों से 81.30 करोड़ की अतिरिक्त रकम वसूली थी। सख्त रुख अपनाते हुए कलेक्टर ने निजी स्कूलों को आदेश जारी कर यह पूरी राशि 30 दिनों के भीतर अभिभावकों को वापस करवाई। यही नहीं, 11 प्रमुख निजी स्कूलों पर एफआईआर दर्ज की गई। जांच में बुक और यूनिफॉर्म माफिया का पर्दाफाश करते हुए यह खुलासा भी हुआ कि स्कूल जानबूझकर सी और डी कैटेगरी के प्रकाशकों की महंगी और घटिया किताबें सिलेबस में शामिल करते थे। दीपक सक्सेना के इस कदम की खुद मुख्यमंत्री ने सराहना की थी। सितंबर 2025 में जनसंपर्क आयुक्त के रूप में भोपाल तबादले के बाद, वर्तमान में वे आबकारी आयुक्त का पद संभाल रहे हैं।
चुनिंदा साहसी आईएएस-आईपीएस
भारत में अपने असाधारण, साहसी और ऐतिहासिक कार्यों के लिए जाने जाने वाले चर्चित आईएएस और आईपीएस अफसर।
आर्मस्ट्रांग पामे: मणिपुर कैडर के आईएएस हैं। इन्हें मिरिकल मैन भी कहा जाता है। इन्होंने चंदा और श्रमदान से 100 किमी लंबा एक पिपेंगल रोड बनवाया, जो मणिपुर को नागालैंड-असम से जोड़ता है।
अशोक खेमका: हरियाणा कैडर के आईएएस हैं। ये अपनी बेदाग ईमानदारी, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई और कई हाई-प्रोफाइल भूमि घोटालों का खुलासा करने के लिए जाने जाते हैं।
दुर्गा शक्ति नागपाल: यूपी कैडर की आईएएस हैं। गौतम बुद्ध नगर में तैनाती के दौरान उन्होंने यमुना और हिंडन नदी के किनारे चल रहे अवैध रेत खनन के खिलाफ ऐतिहासिक कार्रवाई की थी।
यू सगायम: तमिलनाडु कैडर के आईएएस हैं। इन्हें भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों के लिए जाना जाता है। इन्होंने तमिलनाडु में अवैध ग्रेनाइट खनन घोटाले की जांच कर बड़े खुलासे किए थे।
किरण बेदी: भारत की पहली महिला आईपीएस हैं। इन्होंने तिहाड़ जेल के महानिदेशक रहते हुए जेल में ऐतिहासिक सुधार किए, जहां कैदियों को योग, विपश्यना और शिक्षा से जोड़ा गया।
अजीत डोवाल: पूर्व आईपीएस और वर्तमान में देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। इन्हें कूटनीतिक और खुफिया आॅपरेशनों के लिए विश्वभर में जाना जाता है।
संजुक्ता पराशर: असम कैडर की आईपीएस हैं। इन्हें असम की आयरन लेडी कहा जाता है। उन्होंने खुद मैदान में उतर कर असम में बोडो उग्रवादियों के खिलाफ कई अभियानों का नेतृत्व किया।
के विजय कुमार: पूर्व आईपीएस हैं। इन्होंने आॅपरेशन कोकून का नेतृत्व किया, जिसके तहत खूंखार चंदन तस्कर वीरप्पन को मार गिराया गया था। वे कश्मीर में सीआरपीएफ के प्रमुख भी रहे।
शिवदीप लांडे: महाराष्ट्र-बिहार कैडर के आईपीएस हैं। पटना में सिटी एसपी के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने मनचलों और अवैध धंधों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया।
इनका कहना है
देखिए! फ्री हैंड मिलने के बाद भी यह अफसरों के ऊपर निर्भर करता है कि उन्हें किस तरह से कार्य करना है। जो अफसर किसी की परवाह नहीं करते वो महाराष्ट्र के एफडीए कमिश्नर तुकाराम मुंढे की तर्ज पर बेखौफ काम करते हैं। वहीं जो अफसर परवाह करते हैं, वो इस तरह का साहस नहीं दिखा पाते हैं।
ओपी रावत, पूर्व चुनाव आयुक्त, भारत
मैं 30 साल पहले रिटायर हुआ हूं। उस समय जिस तरह की छूट हमें होती थी, वो धीरे-धीरे कम हुई है। रही अफसरों को काम की छूट देने की बात तो आज की परिस्थितियों से मैं बाकिफ नहीं हूं। इसलिए इस बारे मैं कुछ नहीं कह सकता।
शरद चंद्र बेहार, पूर्व मुख्य सचिव, मध्यप्रदेश
प्रशासन पर राजनीति हावी
मध्यपदेश में प्रशासन पर राजनीति हावी है और अफसरों की तैनाती निर्वाचित नेताओं के आर्थिक स्वार्थों को ध्यान में रखकर होती है। इसलिए जब नेताओं के आर्थिक हित पूरे नहीं होते, तो वे अफसर की शिकायत शुरू कर देते हैं। इससे अफसर निष्पक्ष और स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाते।
जयराम शुक्ला, वरिष्ठ विश्लेषक, विंध्य
भ्रष्टाचार से लड़ने की रुचि नहीं
मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने या ईमानदारी से ड्यूटी करने में अफसरों की रुचि कम है। इसका कारण अधिकांश अधिकारियों का बाहरी राज्यों से होना है, जिनकी जनता के प्रति जवाबदेही नहीं होती। राज्य में अब तुकाराम मुंढे जैसे निर्भीक अफसर नहीं हैं। जिससे लूट-खसोट बढ़ गई है।
दिनेश गुप्ता, वरिष्ठ विलेश्षक, भोपाल

संविद सरकार के समय मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री आदरणीय गोविंद नारायण सिंह हुए,उस दौर के शासन में प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यकाल और व्यवस्था का जिक्र अगर इसमें समाहित होता तो लेखन में चार चांद लगते । इसके साथ ही इसमें समीक्षक स्वरूप भी आता।

जबलपुर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, सरकारी कर्मचारियों को मिलेगा 100% वेतन और एरियर्स

जैतवारा से लेकर बारामाफी तक आक्रोश

खरमास 2025-2026: कब से कब तक रहेगा, जानें शुभ कार्यों की मनाही का कारण

ऑपरेशन सिंदूर...मुझे एक तस्वीर दिखा दो...जिसमें भारत का एक गिलास भी नहीं टूटा हो

लागू होंगे नए अवकाश नियम: CCL में वेतन कटौती, EL को 'अधिकार' नहीं मानेगा MP वित्त विभाग

MP College Admission 2026: ई-प्रवेश दूसरे चरण की अलॉटमेंट लिस्ट जारी, 13 जून तक जमा करें फीस

सुरक्षित और नेचुरल तरीके से बाल करना है काले तो अपनाएं ये उपाय

बची हुई चाय को दोबारा गर्म करके पीने क्या होगा, जानें इसके बारे में?

अगर 40 की उम्र कर ली है पार और रहना चाहते हैं तंदरुस्त तो अपनाएं ये आदतें

ठंडा पानी पीने और मीठा खाने पर दांतों में होती है झनझनाहट तो हो जाएं सावधान, नहीं तो हो सकती है बड़ी समस्या

ठंड में बढ़ जाती है डिहाइड्रेशन की समस्या, जानें क्या है कारण ?

तनाव से चाहिए है छुटकारा तो इन चीजों से करें तौबा, अपनाएं ये सलाह
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है-क्या सूबे की अफसरशाही साहस के संकट से जूझ रही है। नियमों का इकबाल बुलंद करना तो दूर, व्यवस्था में कोई ऐसा दबंग चेहरा नजर नहीं आता जो मनमानी करने वालों पर सीधे नकेल कस सके।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। हर रविवार को सुशील शर्मा की कलम से
किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। निर्माण विभाग की वेबसाइट से संपत्ति का ब्योरा गायब, दो संभागों में अफसरों की तनातनी और अन्य चर्चित मामले विस्तार से पढ़ें।
ग्वालियर की चंबल माटी से छात्र राजनीति के शिखर तक पहुंचे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के पूर्णकालिक कार्यकर्ता से मध्य प्रदेश युवा आयोग के अध्यक्ष बने प्रवीण शर्मा के साथ स्टार समाचार की खास बातचीत।
मध्य प्रदेश भाजपा में संगठन महामंत्री का पद केवल एक राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक संतुलन, सख्त अनुशासन और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने वाली मुख्य धुरी माना जाता है। नौ महीनों से इस शीर्ष पद का खाली होना पार्टी के भीतर एक बड़ी ‘कमी’ को बयां कर रहा है।
पॉलिसी बेचते समय मुस्कुराते चेहरों के साथ कैशलेस इलाज और झटपट दावों का प्रलोभन देने वाली बीमा कंपनियों की असलियत क्लेम के वक्त सामने आ रही हैं। नियम-शर्तों की बारीक लाइनों का जाल बुनकर आम जनता की गाढ़ी कमाई हड़पने और उनके दावों को खारिज करने की मनमानी का यह खेल अब बड़ी समस्या बन चुका है।
जानिए मध्य प्रदेश के सियासी और प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। जन्मदिन पर बड़े संभाग की कमान मिलने से लेकर भाजपा मीडिया प्रभारी की दौड़ में पत्रकारों की एंट्री और पीडब्ल्यूडी के नए कारनामों तक के सियासी किस्से।
2021 से 2025 तक जब 20% तक एथेनॉल मिलाया जा रहा था, तब कोई विरोध नहीं हुआ। अब संसद सत्र से ठीक पहले विरोध का माहौल बनाया जा रहा है, जिसके पीछे विदेशी ताकतें और ऑयल लॉबी का हाथ है।