मध्य प्रदेश की स्थापना के 70 वर्षों का यह विस्तृत कालखंड अनेक नेतृत्वों की विकासगाथाओं से आलोकित रहा है। इन दशकों में विभिन्न मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रदेश को प्रगति के पथ पर अग्रसर किया।

मध्य प्रदेश की स्थापना के 70 वर्षों का यह विस्तृत कालखंड अनेक नेतृत्वों की विकासगाथाओं से आलोकित रहा है। इन दशकों में विभिन्न मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रदेश को प्रगति के पथ पर अग्रसर किया। कृषि, उद्योग, बिजली, सड़क, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा इन सभी क्षेत्रों में योजनाएँ बनीं, क्रियान्वित हुईं और विकास की रेखाएँ खिंचीं। किंतु आज जब डॉ. मोहन यादव अपने जीवन के 61 वर्ष पूर्ण कर रहे हैं, तब उनके नेतृत्व को केवल सामान्य प्रशासनिक उपलब्धियों के तराजू पर तौलना शायद उनके कार्य के वास्तविक स्वरूप के साथ न्याय नहीं होगा।
करीब ढाई वर्षों के उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में, एक अकिंचन के रूप में जब मैं उनके कार्यों को देखता हूँ, तो पारंपरिक शुभकामनाओं का स्वर कुछ सीमित-सा प्रतीत होता है, क्योंकि यह तो वो कर ही रहे हैं। किंतु जननायक, सुशासन के प्रतीक, औद्योगिक विकास के प्रवर्तक इन विशेषणों से परे जाकर यदि उनके कार्य को समझा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि उनका प्रयास केवल विकास की परिभाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उस विषय को स्पर्श करता है, जो भारत की आत्मा से जुड़ा है। उसके प्राचीन ज्ञान, उसकी कालगणना और उसकी सांस्कृतिक श्रेष्ठता से से जुड़ा है।
डॉ. मोहन यादव का संकल्प उसी पुण्यभूमि से प्रेरित है, जिसे काल की अवधारणा का उद्गम स्थल माना जाता है। उज्जैन, वह नगरी है, जहाँ से समय की गणना ने विश्व को दिशा दी। किंतु इतिहास के एक मोड़ पर, लगभग 200 वर्ष पूर्व, इस कालगणना केंद्र को योजनाबद्ध ढंग से स्थानांतरित कर ग्रीनविच में स्थापित किया गया। पश्चिम जगत द्वारा स्थापित ग्रीनविच टाइम (GMT) आज वैश्विक मानक है, किंतु भारतीय दृष्टि से यह केवल समय की गणना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विस्थापन का प्रतीक भी रहा है।
यह भी सत्य है कि डॉक्टर मोहन यादव के हृदय में संस्कृति के प्रति श्रद्धा का यह भाव किसी एक क्षण में उत्पन्न नहीं हुआ होगा, बल्कि बाल्यकाल से ही धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व में संचित होता गया। मानो संस्कारों की एक धवल धारा, जो समय के साथ प्रवाहमान होकर आज एक व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि का रूप ले चुकी है। यही कारण है कि उनके निर्णयों और संकल्पों में केवल तात्कालिक राजनीति नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के दीर्घकालिक वैभव को पुनः प्रतिष्ठित करने की एक गहन आकांक्षा परिलक्षित होती है।
डॉ. मोहन यादव इसी ऐतिहासिक विस्थापन को चुनौती देने के संकल्प के साथ आगे बढ़ते दिखाई देते हैं। उनका उद्देश्य केवल एक वैकल्पिक समय प्रणाली स्थापित करना नहीं, बल्कि भारत की उस प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा को पुनः प्रतिष्ठित करना है, जो सूर्य-आधारित गणना और खगोलशास्त्र की गहन समझ पर आधारित रही है। इस दिशा में उन्होंने ठोस पहल भी की है।
उन्होंने कालगणना के महान प्रतीक सम्राट विक्रमादित्य को अपनी कार्ययोजना के केंद्र में स्थापित किया। इतिहास में फैलाए भ्रमों को दूर करने के उद्देश्य से विक्रमादित्य शोधपीठ की स्थापना को गति दी गई और उनके द्वारा प्रवर्तित विक्रम संवत को पुनः जनजीवन में स्थापित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा पंचांगों के प्रकाशन का कार्य प्रारंभ किया गया। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है।
इसी क्रम में “विक्रमादित्य वैदिक घड़ी” की स्थापना कर भारतीय समय गणना पद्धति को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया गया। यह घड़ी केवल समय का संकेतक नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान की उस परंपरा का प्रतीक है, जो प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ सामंजस्य स्थापित करती है। इसके माध्यम से भारत की वैज्ञानिक सोच को वैश्विक पटल पर पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है।
इसके साथ ही, सम्राट विक्रमादित्य के यश को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने हेतु “विक्रमोत्सव” जैसे दीर्घकालिक और व्यापक सांस्कृतिक आयोजन की आधारशिला रखी गई है। यह आयोजन न केवल अतीत की स्मृतियों को जीवित करता है, बल्कि उसे वर्तमान और भविष्य के साथ जोड़ने का सेतु भी बनता जा रहा है।
मुख्यमंत्री डॉ॰ मोहन यादव का यह संकल्प केवल एक व्यक्ति की प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि उस व्यापक वैचारिक परंपरा का विस्तार है, जिसकी प्रेरणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नेतृत्व नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। डॉ. मोहन यादव उसी विचारधारा के समर्पित साधक के रूप में इस संकल्प को पूर्णता तक पहुँचाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं
यह सत्य है कि अभी यह यात्रा प्रारंभिक चरण में है। मुख्यमंत्री ने मानो केवल दो कदम ही आगे बढ़ाए हैं। किंतु इन दो कदमों में जो स्पष्टता, संकल्प और दूरदृष्टि दिखाई देती है, वह इस बात का संकेत है कि यह प्रयास केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि एक गहरे उद्देश्य से प्रेरित है।
आधुनिक युग में यह प्रयास कितना सफल होगा, यह भविष्य के गर्भ में निहित है। किंतु यदि डॉ. मोहन यादव अपने इस संकल्प में सफल होते हैं, तो उनका नाम न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि संपूर्ण भारत के इतिहास में एक ऐसे नेतृत्व के रूप में अंकित होगा, जिसने विकास के साथ-साथ राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा को पुनर्जीवित करने का साहसिक प्रयास किया। उनके 61वें जन्मदिवस पर, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि वे केवल एक प्रशासक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साधक के रूप में उभर रहे हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को जन्मदिवस की कोटि-कोटि शुभकामनाएँ। उनका यह संकल्प न केवल सफल हो, बल्कि भारत की गौरवशाली परंपरा को पुनः विश्व के शिखर पर प्रतिष्ठित करने में मील का पत्थर सिद्ध हो।

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यह कथा भारत के उस हृदय प्रदेश की है, जो आज भारत के नक्शे के ठीक बीचों-बीच एक समृद्ध राज्य के रूप में मुस्कुराता है। लेकिन समय के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाइए। 1947 का वह ऐतिहासिक सवेरा, जब देश की फिजाओं में आजादी की नई सांस घुली थी, उस वक्त मध्य प्रदेश नाम की कोई पहचान अस्तित्व में ही नहीं थी।
बीमा पॉलिसी बेचने के लिए कंपनियां एजेंटों, बैंकों, ब्रोकरों और दूसरे डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों को कमीशन देती हैं। इस व्यवस्था में कमीशन कितना हो, किस उत्पाद पर कितना भुगतान उचित है और क्या ज्यादा कमीशन पाने की होड़ में ग्राहक को उसकी जरूरत से अलग पॉलिसी बेची जा सकती है—इन सवालों पर भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) ने नए सिरे से विचार शुरू किया है।
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इबोला वायरस अफ्रीकी देशों में तेजी से फैल रहा है। इसके दुर्लभ बुंडिबुग्यो स्ट्रेन का मौजूदा प्रकोप गंभीर है। डीआर कांगो में हजारों पुष्ट मामले और मौतें दर्ज हुई हैं, वहीं नाइजीरिया, युगांडा और केन्या में सामने आए मामलों ने सीमा पार प्रसार की चिंता बढ़ाई है। फिलहाल इसकी वैक्सीन नहीं होना भी एक बड़ी चुनौती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातस्थिति घोषित किया है।
मध्य प्रदेश में राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस अधिकारी शिवनारायण सिंह चौहान ने पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी और सदस्य सचिव हर्षल पंचोली पर संस्था के कामकाज में बाधा डालने तथा 237 ‘डीम्ड ईसी’ जारी करने में अनियमितताओं के दोषी तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी एवं सदस्य सचिव उमा महेश्वरी पर कार्रवाई की मांग की है।
मैदान पर पसीना बहाता हुआ एक युवा खिलाड़ी, जिसकी आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना है, और दूसरी तरफ जिन्हें खेल का ‘क, ख, ग’ भी नहीं मालूम, वे नेता और उनके ‘राजदुलारे’ खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है-क्या सूबे की अफसरशाही साहस के संकट से जूझ रही है। नियमों का इकबाल बुलंद करना तो दूर, व्यवस्था में कोई ऐसा दबंग चेहरा नजर नहीं आता जो मनमानी करने वालों पर सीधे नकेल कस सके।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। हर रविवार को सुशील शर्मा की कलम से
किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।