यह कथा भारत के उस हृदय प्रदेश की है, जो आज भारत के नक्शे के ठीक बीचों-बीच एक समृद्ध राज्य के रूप में मुस्कुराता है। लेकिन समय के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाइए। 1947 का वह ऐतिहासिक सवेरा, जब देश की फिजाओं में आजादी की नई सांस घुली थी, उस वक्त मध्य प्रदेश नाम की कोई पहचान अस्तित्व में ही नहीं थी।

-1956 का वह ऐतिहासिक दिन जब भारत के नक्शे पर धड़का मध्य प्रदेश
-मध्य भारत से मध्य प्रदेश का 43 जिलों से शुरू हुआ देश के दिल का सफर
-वर्ष 1956 से 2000 तक बदला मध्य प्रदेश का आकार और पूरा भूगोल
-1 नवंबर 1956: फजल अली आयोग और हृदय प्रदेश का नव-जन्म
- सुनेलटप्पा के बदले में राजस्थान की सिरोंज तहसील मध्य प्रदेश को मिली
-विंध्य प्रदेश का जन्म, रीवा राजधानी और नवाबों के भोपाल की शुरुआती ‘ना’
अरविंद मिश्र। भोपाल
यह कथा भारत के उस हृदय प्रदेश की है, जो आज भारत के नक्शे के ठीक बीचों-बीच एक समृद्ध राज्य के रूप में मुस्कुराता है। लेकिन समय के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाइए। 1947 का वह ऐतिहासिक सवेरा, जब देश की फिजाओं में आजादी की नई सांस घुली थी, उस वक्त मध्य प्रदेश नाम की कोई पहचान अस्तित्व में ही नहीं थी। भारत के नक्शे पर तत्कालीन मध्य प्रांत की जमीन अलग-अलग टुकड़ों, रियासतों और प्रशासनिक श्रेणियों में बंटी हुई थी। उस दौर में राज्यों को पार्ट-ए, पार्ट-बी और पार्ट-सी जैसी श्रेणियों में विभाजित किया गया था। आज का छत्तीसगढ़, विदर्भ और महाकोशल मिलकर सेंट्रल प्रोविंस एण्ड बरार कहलाते थे। जो पार्ट-ए का हिस्सा था। इसकी बुनियाद 2 नवंबर 1861 को एक न्यायिक कमिश्नरी क्षेत्र के रूप में पड़ी थी, जो आगे चलकर 1921 में गवर्नर प्रोविंस बना और 1936 में हैदराबाद रियासत से बरार क्षेत्र को मिलाकर विशाल सेंट्रल प्रोविंस एण्ड बरार बन गया। इसकी राजधानी नागपुर हुआ करती थी। इस प्रांत की बागडोर संभालने वाले पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल और इसके प्रथम राज्यपाल ई राघवेन्द्रराव बने।
मध्य भारत: छह-छह माह की राजधानी
सेंट्रल प्रोविंस के अलावा आसपास के अन्य क्षेत्र भी अपनी अनूठी कहानियां बुन रहे थे। पार्ट-बी के अंतर्गत आता था मध्य भारत का प्रांत। 22 अप्रैल 1948 को छोटी-बड़ी 25 रियासतों के मेल से यह क्षेत्र आकार में आया। इसकी प्रशासनिक व्यवस्था बड़ी दिलचस्प थी। वर्ष के छह महीने इसकी राजधानी ग्वालियर हुआ करती थी, तो बाकी के छह महीने यह दायित्व इंदौर संभालता था।
विंंध्य प्रदेश: 1950 में रीवा राजधानी घोषित
पूर्व की ओर बुंदेलखंड और बघेलखंड की 38 रियासतों का एक अद्भुत संगम हो रहा था, जिससे विंंध्य प्रदेश का जन्म हुआ। शुरुआत में बुंदेलखंड और रीवा नाम की दो अलग इकाइयां बनाई गईं। रीवा के महाराज मार्तंड सिंह देव को इनका राजप्रमुख नियुक्त किया गया। कप्तान अवधेश प्रताप सिंह और कामता प्रसाद सक्सेना के कुशल नेतृत्व में बघेलखंड और बुंदेलखंड में अलग-अलग मंत्रिमंडल गठित हुए। आगे चलकर 1948 में दोनों मंत्रिमंडलों का विलय हुआ और कप्तान अवधेश प्रताप सिंह इसके पहले प्रधानमंत्री बने। आखिरकार 1 जनवरी 1950 को इसे पार्ट-सी श्रेणी में शामिल कर रीवा को इसकी स्थायी राजधानी घोषित कर दिया गया।
नवाबों की नगरी भोपाल का विलय से इंकार
इधर, नवाबों की नगरी भोपाल प्रांत (पार्ट-सी) अपनी अलग राह पर चलने की कोशिश कर रहा था। आजादी के शुरुआती दिनों में भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान ने भारत संघ में अपने विलय से स्पष्ट इंकार कर दिया था, लेकिन इतिहास को तो एक वृहद एकीकरण की पटकथा लिखनी थी। दिलचस्प बात यह भी है कि जब समूचे भारत में रियासतों का एकीकरण चल रहा था, तब बुंदेलखंड पहली ऐसी रिआसत बनी जिसने सबसे पहले भारत संघ में स्वेच्छा से शामिल होने का ऐतिहासिक ऐलान किया था।
1 नवंबर 1956: फजल अली आयोग
समय के साथ प्रशासनिक सहूलियत और भाषा-संस्कृति के समन्वय के लिए राज्यों के पुनर्गठन की मांग जोर पकड़ने लगी। इसके समाधान के लिए फजल अली आयोग का गठन किया गया। आयोग की दूरदर्शी सिफारिशों के आधार पर 1 नवंबर 1956 को भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम पन्ना लिखा गया, जब चार बड़े भू-भागों सेंट्रल प्रोविंस एण्ड बरार, मध्य भारत, विंंध्य प्रदेश और भोपाल प्रांत को आपस में जोड़कर मध्य प्रदेश का औपचारिक गठन किया गया।
नव-निर्माण: सीमाओं का नपा-तुला फेरबदल
नव-निर्माण में सीमाओं का बड़ा ही नपा-तुला फेरबदल हुआ। सेंट्रल प्रोविंस एण्ड बरार के आठ मराठी भाषी जिले बुलढ़ाणा, अकोला, अमरावती, यवतमाल, वर्धा, नागपुर, भंडारा और चांदा तत्कालीन मुंबई राज्य को सौंप दिए गए। शेष विशाल हिस्सा मध्य प्रदेश का अंग बना। मध्य भारत प्रांत से मंदसौर की भानपुरा तहसील का सुनेलटप्पा क्षेत्र राजस्थान को दिया गया, जबकि बदले में राजस्थान की सिरोंज तहसील को मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में मिला लिया गया। विंंध्य प्रदेश और भोपाल का पूरा का पूरा भू-भाग बिना किसी बदलाव के नए राज्य में समाहित हो गया।
जोड़-तोड़: भोपाल को चुना गया राजधानी
भौगोलिक जोड़-तोड़ के बाद 1 नवंबर 1956 को 43 जिलों के साथ भारत के इस नए हृदय प्रदेश की राजधानी के रूप में भोपाल को चुना गया। यह वही समय था जब हरदा जिले की मकड़ाई रियासत भी सेंट्रल प्रोविंस की एकमात्र ऐसी रियासत बनकर उभर चुकी थी जो मध्य प्रदेश में शामिल हुई।
2000: 44 साल बाद छत्तीसगढ़ अलग
1956 में गठित मध्य प्रदेश ने अगले चार दशकों तक अपनी साझा संस्कृति और परंपराओं को सहेजकर रखा। लेकिन विस्तार और दूरदराज के अंचलों के विकास की जरूरतों ने एक नए पुनर्गठन की मांग को हवा दी। गठन के ठीक 44 साल बाद 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश के इतिहास में एक और बड़ा मोड़ आया। प्रदेश के समृद्ध पूर्वी हिस्से को अलग करके छत्तीसगढ़ के रूप में एक नए राज्य का निर्माण किया गया। इस विभाजन के ठीक बाद मध्य प्रदेश के पास 45 जिले रह गए। यह एक भावुक बाह्य पुनर्गठन था।
1972: भोपाल को पूर्ण जिले का दर्जा मिला
बाह्य पुनर्गठन के साथ-साथ राज्य के भीतर भी प्रशासनिक सुगमता बढ़ाने का सिलसिला 1972 से ही जारी था। रोचक तथ्य यह है कि 1956 में राजधानी बनने के बावजूद भोपाल कोई स्वतंत्र जिला नहीं था, बल्कि सीहोर जिले की एक तहसील मात्र था। 1972 में भोपाल को पूर्ण जिले का दर्जा मिला। फिर जैसे-जैसे आबादी की जरूरतें बढ़ीं, नए जिलों के निर्माण की प्रक्रिया को गति देने के लिए विशेष समितियों का गठन हुआ।
1983: बीआर दुबे समिति
इस समिति की सिफारिश पर 25 मई 1998 को 8 नए जिले गठित हुए। इनमें से चार जिले आज के मध्य प्रदेश में स्थित हैं। जिसमें खरगोन से बड़वानी, मुरैना से श्योपुर, जबलपुर से कटनी और मंडला से अलग होकर डिंडोरी बना।
जून 1998: सिंहदेव समिति
इस समिति की अनुशंसा पर 6 जुलाई 1998 को पुन: 8 नए जिले अस्तित्व में आए, जिनमें से तीन वर्तमान मध्य प्रदेश का हिस्सा हैं। इसमें शहडोल से उमरिया, मंदसौर से नीमच और होशंगाबाद से अलग होकर हरदा जिला बना।
2003 के नए बदलाव
15 अगस्त 2003 को मध्यप्रदेश ने तीन और नए जिलों का स्वागत किया। जिसमें गुना से अलग अशोकनगर, खंडवा से बुरहानपुर और शहडोल से अलग होकर अनूपपुर जिला बना।
2008 और 2013 का विस्तार
मई 2008 में झाबुआ से काटकर अलीराजपुर और सीधी से अलग करके सिंगरौली का गठन किया गया। आगे चलकर 16 अगस्त 2013 को शाजापुर से अलग कर आगर-मालवा राज्य का नया जिला बनाया गया।
मध्य प्रदेश का नक्शा
मध्य प्रदेश का नक्शा पहली बार 1 नवंबर 1956 को अस्तित्व में आया। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के तहत सीपी एंड बरार, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल रियासत के हिंदी भाषी क्षेत्रों को मिलाकर इसका गठन किया गया था। गठन के 44 वर्षों बाद, 1 नवंबर 2000 को प्रदेश का पुनर्गठन हुआ। छत्तीसगढ़ के विभाजन के बाद ही मध्य प्रदेश का वर्तमान नक्शा तय हुआ।
जब नेहरू ने मप्र के नक्शे का कहा था-ऊंट
एक नवंबर 1956 को जब राज्य पुनर्गठन आयोग ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को नवगठित राज्य का नक्शा दिखाया, तो भारत के ठीक मध्य में स्थित होने के कारण उन्होंने इसका नाम मध्य प्रदेश रखा था। नक्शे को देखकर नेहरू ने कहा था- यह क्या ऊंट की तरह दिखने वाला राज्य बना दिया। दिलचस्प बात यह है कि उस दौर में केवल भौगोलिक आकार को लेकर ही चर्चा नहीं हुई, बल्कि हिंदू महासभा ने भी नए मध्य प्रदेश के निर्माण का खुलकर विरोध किया था।
1999 तक सबसे बड़ा राज्य था मध्य प्रदेश
साल 1956 से 2000 तक मध्य प्रदेश क्षेत्रफल के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा राज्य था। 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ के गठन के बाद राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य बना। वर्तमान में क्षेत्रफल में राजस्थान, जनसंख्या में उत्तर प्रदेश और अर्थव्यवस्था में महाराष्ट्र भारत में शीर्ष पर हैं।
कुछ एतिहासिक तथ्य
मध्य प्रदेश राज्य के पुनर्गठन के बाद से अब तक 19 चेहरे मुख्यमंत्री के पद पर रह चुके हैं। इसमें सबसे लंबा 16 साल का कार्यकाल शिवराज सिंह चौहान का रहा, जबकि सबसे छोटा 13 दिन के सीएम का कार्यकाल नरेशचंद्र सिंह के नाम दर्ज है। इसके साथ ही मप्र की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव उमा भारती को प्राप्त है। राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री कांग्रेस के पंडित रविशंकर शुक्ल थे, जो 1 नवंबर 1956 से 31 दिसंबर 1956 तक पद पर रहे। भगवंतराव मंडलोई कांग्रेस, डॉ. कैलाशनाथ काटजू कांग्रेस, भगवंतराव मंडलोई कांग्रेस, द्वारका प्रसाद मिश्र कांग्रेस, गोविंद नारायण सिंह प्रथम गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री, नरेशचंद्र सिंह, श्यामाचरण शुक्ल कांग्रेस, प्रकाश चंद्र सेठी कांग्रेस, कैलाश चंद्र जोशी जनता पार्टी, वीरेंद्र कुमार सखलेचा जनता पार्टी, सुंदरलाल पटवा भाजपा, अर्जुन सिंह कांग्रेस, मोतीलाल वोरा कांग्रेस, दिग्विजय सिंह कांग्रेस से दो कार्यकाल, उमा भारती भाजपा, बाबूलाल गौर भाजपा, शिवराज सिंह चौहान भाजपा, कमलनाथ कांग्रेस 2018 से 2020 तक, शिवराज सिंह चौहान भाजपा 2020 से 2023 तक और डॉ. मोहन यादव भाजपा से 2023 से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
सीएम पद पर शिवराज ने लगाया ‘चौका’
मध्यप्रदेश की राजनीति में बुधनी विधानसभा क्षेत्र (सीहोर जिला) का नाम सबसे प्रमुखता से दर्ज है, क्योंकि राज्य में सबसे अधिक बार मुख्यमंत्री इसी क्षेत्र से चुने गए हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता शिवराज सिंह चौहान ने बुधनी विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते हुए कुल 4 बार (वर्ष 2005, 2008, 2013 और 2020) मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और राज्य में सीएम पद का चौका लगाया। इसके साथ ही वे मध्य प्रदेश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सीएम के पद पर रहने का कीर्तिमान भी अपने नाम कर चुके हैं।
मप्र में तीन बार राष्ट्रपति शासन
मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में अब तक कुल तीन बार राष्ट्रपति शासन लागू किया जा चुका है। पहला राष्ट्रपति शासन 30 अप्रैल 1977 से 25 जून 1977 तक रहा। दूसरा राष्ट्रपति शासन 18 फरवरी 1980 से 08 जून 1980 तक और तीसरा राष्ट्रपति शासन 16 दिसंबर 1992 से 06 दिसंबर 1993 तक रहा।
मप्र की पहली महिला राज्यपाल सरला ग्रेवाल
मध्य प्रदेश राज्य के पुनर्गठन के बाद से अब तक 21 दिग्गजों ने राज्यपाल के पद की शोभा बढ़ाई है। इस दौरान राज्य में तीन बार कार्यवाहक राज्यपाल भी रहे हैं। न्यायमूर्ति पीवी दीक्षित (1966), न्यायमूर्ति गुरुप्रसन्न सिंह (1981) और ले. ज. कृष्ण मोहन सेठ 02 मई 2004 से 29 जून 2004 तक कार्यवाहक राज्यपाल रहे। राज्य के राज्यपालों के इतिहास में महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी महत्वपूर्ण रहा है। 31 मार्च 1989 से 06 फरवरी 1990 तक सरला ग्रेवाल मध्य प्रदेश की प्रथम महिला राज्यपाल रहीं। उनके बाद आनंदीबेन पटेल ने 23 जनवरी 2018 से 29 जुलाई 2019 तक दूसरी महिला राज्यपाल के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
मध्यप्रदेश के अब तक के राज्यपाल
| राज्यपाल का नाम | कार्यकाल |
| डॉ. पट्टाभि सीतारमय्या | 1956-1957 |
| हरिविनायक पाटस्कर | 1957-1965 |
| न्यायमूर्ति पीवी दीक्षित | 1966-1966 |
| सत्यनारायण सिंह | 1971-1977 |
| निरंजन नाथ वांचू | 1977-1978 |
| चेप्पुदिरा मुथाना पुनाचा | 1978-1980 |
| भगवत दयाल शर्मा | 1980-1984 |
| न्यायमूर्ति गुरुप्रसन्न सिंह | 1981-1981 |
| प्रो. के एम चांडी | 1984-1989 |
| सरला ग्रेवाल | 1989-1990 |
| कुंवर महमूद अली खां | 1990-1993 |
| मोहम्मद शफी कुरैशी | 1993-1998 |
| डॉ. भाई महावीर | 1998-2003 |
| रामप्रकाश गुप्त | 2003-2004 |
| ले. कृष्ण मोहन सेठ | 2004-2004 |
| डॉ. बलराम जाखड़ | 2004-2009 |
| रामेश्वर ठाकुर | 2009-2011 |
| रामनरेश यादव | 2011-2016 |
| ओम प्रकाश कोहली | 2016-2018 |
| ओम प्रकाश कोहली | 2018-2018 |
| आनंदीबेन पटेल | 2018-2019 |
| लालजी टंडन | 2019-2020 |
| आनंदीबेन पटेल | 2020-2021 |
| मंगूभाई भाई पटेल | 2021 से अब तक |


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यह कथा भारत के उस हृदय प्रदेश की है, जो आज भारत के नक्शे के ठीक बीचों-बीच एक समृद्ध राज्य के रूप में मुस्कुराता है। लेकिन समय के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाइए। 1947 का वह ऐतिहासिक सवेरा, जब देश की फिजाओं में आजादी की नई सांस घुली थी, उस वक्त मध्य प्रदेश नाम की कोई पहचान अस्तित्व में ही नहीं थी।
बीमा पॉलिसी बेचने के लिए कंपनियां एजेंटों, बैंकों, ब्रोकरों और दूसरे डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों को कमीशन देती हैं। इस व्यवस्था में कमीशन कितना हो, किस उत्पाद पर कितना भुगतान उचित है और क्या ज्यादा कमीशन पाने की होड़ में ग्राहक को उसकी जरूरत से अलग पॉलिसी बेची जा सकती है—इन सवालों पर भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) ने नए सिरे से विचार शुरू किया है।
स्टार समाचार से खास मुलाकात.. हर सवाल का सीधा जवाब
इबोला वायरस अफ्रीकी देशों में तेजी से फैल रहा है। इसके दुर्लभ बुंडिबुग्यो स्ट्रेन का मौजूदा प्रकोप गंभीर है। डीआर कांगो में हजारों पुष्ट मामले और मौतें दर्ज हुई हैं, वहीं नाइजीरिया, युगांडा और केन्या में सामने आए मामलों ने सीमा पार प्रसार की चिंता बढ़ाई है। फिलहाल इसकी वैक्सीन नहीं होना भी एक बड़ी चुनौती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातस्थिति घोषित किया है।
मध्य प्रदेश में राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस अधिकारी शिवनारायण सिंह चौहान ने पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी और सदस्य सचिव हर्षल पंचोली पर संस्था के कामकाज में बाधा डालने तथा 237 ‘डीम्ड ईसी’ जारी करने में अनियमितताओं के दोषी तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी एवं सदस्य सचिव उमा महेश्वरी पर कार्रवाई की मांग की है।
मैदान पर पसीना बहाता हुआ एक युवा खिलाड़ी, जिसकी आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना है, और दूसरी तरफ जिन्हें खेल का ‘क, ख, ग’ भी नहीं मालूम, वे नेता और उनके ‘राजदुलारे’ खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है-क्या सूबे की अफसरशाही साहस के संकट से जूझ रही है। नियमों का इकबाल बुलंद करना तो दूर, व्यवस्था में कोई ऐसा दबंग चेहरा नजर नहीं आता जो मनमानी करने वालों पर सीधे नकेल कस सके।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। हर रविवार को सुशील शर्मा की कलम से
किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।