काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) विश्वभूषण मिश्र ने एक ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो अब मध्यप्रदेश के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर और 2028 के सिंहस्थ महाकुंभ के लिए भी मार्गदर्शक बनने जा रहा है।

काशी विश्वनाथ मंदिर के सीईओ विश्वभूषण मिश्र से विशेष बातचीत
भारत की आस्था परंपरा में काशी का स्थान अद्वितीय है। संकरी गलियों, ऐतिहासिक धरोहर और अटूट श्रद्धा के बीच हर दिन लाखों लोग बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में प्रयागराज महाकुंभ में पहुंचे करोड़ों श्रद्धालुओं को बिना किसी अव्यवस्था और दुर्घटना के दर्शन कराना किसी चमत्कार से कम नहीं। यह संभव हुआ है कुशल प्रशासन, तकनीकी नवाचार और सबसे महत्वपूर्ण सेवा भाव से। इसी सोच के साथ काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) विश्वभूषण मिश्र ने एक ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो अब मध्यप्रदेश के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर और 2028 के सिंहस्थ महाकुंभ के लिए भी मार्गदर्शक बनने जा रहा है। काशी विश्वनाथ और महाकालेश्वर मंदिर प्रबंधन के बीच हुए एमओयू के बाद यह सहयोग और मजबूत हुआ है। विश्वभूषण मिश्र का व्यक्तित्व प्रशासन और आध्यात्म का अद्भुत संगम है। उनके लिए मंदिर प्रबंधन केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि सेवा और श्रद्धा का माध्यम है। उनकी यही सोच “श्रद्धालु नहीं, मेहमान” उन्हें भीड़ प्रबंधन की पारंपरिक अवधारणा से अलग खड़ा करती है। आने वाले 2028 सिंहस्थ महाकुंभ में उनका अनुभव और मॉडल निश्चित रूप से एक नई मिसाल स्थापित करेगा, जहां आस्था और व्यवस्था का संतुलन विश्व स्तर पर दिखाई देगा। पेश हैं उनसे हुई विस्तृत बातचीत—
सवाल: आपका प्रारंभिक जीवन और शासकीय सेवा तक का सफर काफी प्रेरणादायक रहा है।
जवाब: मेरा जन्म एक साधारण ग्रामीण परिवार में हुआ। उस समय गांव में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं, यहां तक कि बिजली भी नहीं थी। मेरे पिता एक इंटर कॉलेज में शिक्षक थे, इसलिए घर में शिक्षा का माहौल था। लेकिन जब मैं आठवीं कक्षा में था, तब उनके निधन ने जीवन को पूरी तरह बदल दिया। उसके बाद आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ना पड़ा। लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान शुरुआत में छात्र राजनीति की ओर रुझान था। उस समय लगता था कि यही सबसे आसान रास्ता है जीवन में आगे बढ़ने का। लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलीं और मैंने एलएलबी की पढ़ाई शुरू की। इसी दौरान दोस्तों के साथ एक सामान्य सी शर्त लगी कि क्या मैं यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा निकाल सकता हूं? मैंने सहज भाव से कहा कि कोई भी परीक्षा इतनी कठिन नहीं होती। उसी शर्त ने मेरी दिशा बदल दी। 2008 में पहली बार परीक्षा दी और प्रारंभिक परीक्षा पास हो गई। उसके बाद मेंस और इंटरव्यू भी हुआ। भगवान की कृपा से कुल 13 चयन हुए, जिनमें यूपीपीसीएस में तीसरी रैंक के साथ डिप्टी कलेक्टर बनना मेरे जीवन का अहम मोड़ था।
सवाल: आपकी सफलता का वह कौन सा पल था जिसने आपको सबसे अधिक भावुक किया?
जवाब: जब मेरा चयन डिप्टी कलेक्टर के रूप में हुआ, तो मैंने सबसे पहले अपनी मां को बताया। लेकिन उन्हें उस पद की गंभीरता का अंदाजा नहीं था। उन्होंने कहा “कुछ बड़ा बन जाना तो बताना।”अगले दिन जब अखबार में फोटो छपी और लोगों ने उन्हें बताया कि उनका बेटा बड़ा अधिकारी बन गया है, तब उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा “आज तुम्हारे पिता होते तो कितना गर्व महसूस करते।” वह पल मेरे जीवन का सबसे भावुक क्षण था।
सवाल: आप एक प्रशासक के साथ-साथ एक लेखक भी हैं। ये रूचि कैसे हुई।
जवाब: लेखन मेरे लिए आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम है। मैंने जो कुछ जीवन में अनुभव किया, उसे शब्दों में ढालने का प्रयास किया। मेरी प्रमुख कृतियां हैं ”मैंने अनुभव से सीखा है” यह एक लंबी काव्य रचना है, जिसमें जीवन के संघर्ष, असफलताएं, सफलताएं और उनसे मिली सीख को प्रस्तुत किया गया है। यह करीब 104 पृष्ठों की एक ही कविता है, जिसमें अलग-अलग छंदों के माध्यम से जीवन का सार व्यक्त किया गया है। “सनातन कुंभ” इस पुस्तक में भारतीय आस्था, परंपरा और कुंभ मेले के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से बताया गया है। इसके अलावा मेरी कई कविताएं भी प्रकाशित हो चुकी हैं, जो जीवन के विभिन्न चरणों की अनुभूतियों को दर्शाती हैं। मेरे लेखन में वही सच्चाई है जो मैंने खुद जी है एक सामान्य व्यक्ति की संघर्ष यात्रा।
सवाल: काशी विश्वनाथ और महाकाल मंदिर प्रशासन के बीच हुए एमओयू के पीछे क्या सोच और योजना है?
जवाब: (बाबा विश्वनाथ का स्मरण करते हुए) काशी में प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु आते हैं। इसके अलावा प्रयागराज महाकुंभ के दौरान हमने लगभग 3 करोड़ लोगों को व्यवस्थित तरीके से दर्शन कराए।
इसके लिए एक विस्तृत SOP (Standard Operating Procedure) तैयार की गई थी, जिसमें भीड़ का वैज्ञानिक प्रबंधन, मार्ग निर्धारण, सुरक्षा व्यवस्था, मेडिकल सहायता, डिजिटल मॉनिटरिंग इन सभी पहलुओं को शामिल किया गया था। अब यही SOP उज्जैन के महाकाल मंदिर में भी लागू की जाएगी, ताकि 2028 के सिंहस्थ महाकुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर और सुरक्षित अनुभव मिल सके। हमारी टीम महाकाल मंदिर जाएगी और वहां के अधिकारी काशी आएंगे। प्रशिक्षण, निरीक्षण और अनुभवों का आदान-प्रदान लगातार चलता रहेगा।
सवाल: मंदिर प्रबंधन में तकनीक और नवाचार की क्या भूमिका है?
जवाब: आज के समय में तकनीक का उपयोग बहुत आवश्यक है। काशी और महाकाल मंदिर के बीच हुए इस समझौते के तहत डिजिटल टिकटिंग, रियल टाइम क्राउड मॉनिटरिंग, बेहतर कम्युनिकेशन सिस्टम जैसी व्यवस्थाएं साझा की जाएंगी।
सवाल: क्या अन्य मंदिरों के साथ भी इस तरह का सहयोग किया जाएगा?
जवाब: भारत में आस्था का स्तर बहुत बड़ा है। यहां दुनिया में सबसे ज्यादा लोग धार्मिक स्थलों पर आते हैं। कई स्थानों पर संकरी गलियां हैं, जहां अचानक भीड़ बढ़ जाती है। हमने टिकट आधारित दर्शन व्यवस्था शुरू की है, लेकिन पारंपरिक तपस्या और सामान्य दर्शन व्यवस्था को भी बनाए रखा है। जहां से भी सहयोग की आवश्यकता होगी, हम निश्चित रूप से करेंगे। कुछ मंदिरों से बातचीत भी चल रही है।
सवाल: भीड़ प्रबंधन के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए क्या विशेष कदम उठाए गए?
जवाब: हम श्रद्धालुओं को भीड़ नहीं मानते, वे हमारे लिए मेहमान हैं। और मेहमान को बिना कष्ट के दर्शन कराना हमारा धर्म है। हमने कई व्यवस्थाएं कीं जैसे गर्मी में ORS और शर्बत वितरण, तपते फर्श से राहत के लिए पटसन (जूट) का विशेष फर्श, मेडिकल टीम और एयर एंबुलेंस, साफ-सुथरी और व्यवस्थित कतारें।इन सबके पीछे केवल एक ही भावना है—सेवा।
सवाल: इतने बड़े स्तर पर सफल प्रबंधन के बाद आपको कैसा अनुभव होता है?
जवाब: सच कहूं तो मुझे नहीं लगता कि यह सब मैंने किया है। यह सब बाबा विश्वनाथ की कृपा है। हम केवल माध्यम हैं। जब करोड़ों लोग बिना किसी परेशानी के दर्शन करके लौटते हैं और कोई अप्रिय घटना नहीं होती, तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगता।

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