जिस तरह से सीएम डॉ. मोहन यादव और प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में फैसले लिए जा रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि भाजपा पुराने स्थापित राजनीतिक घरानों से हटकर नए और युवा चेहरों को मौका दे रही है। स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।

अरविंद मिश्र। भोपाल
मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने जिस तरह रजनीश अग्रवाल और महेश केवट जैसे नए चेहरों को आगे बढ़ाया है, वह मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बड़े बदलाव और नई पीढ़ी का सूर्योदय माना जा रहा है। दिल्ली और भोपाल के चक्कर काटने वाले बड़े-बड़े सूरमाओं को पछाड़ते हुए भाजपा का चयन यह साबित करता है कि पार्टी में आज भी जमीन पर काम करने वाले मौन कार्यकर्ताओं का मूल्यांकन शीर्ष स्तर पर होता है। एक साधारण कार्यकर्ता को सीधे संसद के उच्च सदन का सांसद बनाकर भाजपा ने सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ा संदेश दिया है। रजनीश अग्रवाल जैसे लंबे समय से संगठन में सक्रिय और साफ छवि वाले प्रवक्ता-नेता को राज्यसभा का टिकट मिलना यह दिखाता है कि पार्टी जमीनी स्तर पर काम करने वाले मीडिया और संगठन के कार्यकर्ताओं की मेहनत को पहचान दे रही है। दरअसल, जिस तरह से सीएम डॉ. मोहन यादव और प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में फैसले लिए जा रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि भाजपा पुराने स्थापित राजनीतिक घरानों से हटकर नए और युवा चेहरों को मौका दे रही है। स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
नए नेतृत्व को बढ़ावा देने की मजबूत नींव
मध्यप्रदेश भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन की शुरुआत 1990 के दशक में पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश चंद्र जोशी और सुंदरलाल पटवा की जोड़ी द्वारा की गई थी, जिन्होंने उस दौर में पार्टी के युवा नेताओं की एक नई पौध को मुख्यधारा की राजनीति में आगे बढ़ाया। 1990 में जब भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला, तो विधायक दल के नेता के रूप में जोशी का नाम सबसे आगे था, लेकिन उन्होंने और पटवा ने आपसी सहमति से युवा कार्यकर्ताओं और नए नेतृत्व को बढ़ावा देने की मजबूत नींव रखी।
पुरानी पीढ़ी का लंबा दौर
साल 1985-90 के दौर में भाजपा के तत्कालीन नेतृत्व ने जिस पीढ़ी को आगे बढ़ाया था, वही लंबे समय तक मध्य प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रही। उस समय शिवराज सिंह चौहान, कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रह्लाद सिंह पटेल, नरोत्तम मिश्रा और जयंत मलैया जैसे नेताओं को चुनावी मैदान में उतारा गया था।
समय के साथ भाजपा आगे बढ़ी
जनसंघ के समय से सक्रिय दिग्गज नेताओं ने अपनी पारंपरिक भूमिकाओं से हटकर पार्टी संगठन को प्राथमिकता दी, जिससे उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान और अन्य युवा नेताओं का उभार हुआ। समय के साथ यह प्रक्रिया मध्य प्रदेश भाजपा में आगे बढ़ी। हाल के वर्षों में डॉ. मोहन यादव को सीएम बनाए जाने जैसे संगठनात्मक निर्णयों को भी एक बड़े पीढ़ीगत बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
नई पीढ़ी का नेतृत्व
भाजपा ने मध्यप्रदेश का मोहन यादव को मुखिया बनाकर चौंकाने वाले फैसले लेने की रणनीति में महारत हासिल की है। मध्यप्रदेश में 34 वर्ष बाद ऐसा मौका आया जब भाजपा ने नया नेतृत्व सामने लाते हुए डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया। वर्तमान में मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष के रूप में हेमंत खंडेलवाल दोनों ही अपेक्षाकृत नई पीढ़ी के नेताओं में गिने जाते हैं।
नए खून को आगे बढ़ाया
भाजपा नए खून को आगे बढ़ाने का कार्य किया। इसी का परिणाम है कि आज पंच-सरपंच से लेकर जिला राज्य और केंद्र तक में भाजपा की सरकार है। पार्टी युवाओं को आगे लाकर उनकी कार्यक्षमता का उपयोग संगठन को और मजबूत करने में करने की तैयारी में जुट गई है। इसे लेकर रोडमैप लगभग तैयार हो चुका है और आने वाले चुनावों में युवा नेतृत्व उभरता हुआ नजर आएगा।
विधानसभा-लोकसभा में दिखेगा बदलाव
मध्यप्रदेश में अगले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पीढ़ी परिवर्तन साफ दिखाई देगा। पार्टी अब चुनावी राजनीति और संगठन में उन युवा और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को पुरस्कृत कर रही है, जो जमीनी स्तर पर जुड़े है। लंबे समय तक सक्रिय रहे दिग्गज नेताओं को अब मुख्य कार्यकारी भूमिकाओं से अलग कर नई और युवा पीढ़ी को तैयार करने की कवायद तेज हो गई है। खास बात यह है कि जातीय समीकरण साधते हुए नए चेहरों को मौका दिया जा रहा है। इसमें महिला और युवाओं की संख्या बढ़ाई जा रही है। पार्टी, पिछड़े, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग में अपनी नई लीडरशिप भी तैयार कर रही है।
जमीनी स्तर से नया नेतृत्व तैयार
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष खंडेलवाल पार्टी में नए जोश और समीकरणों को साधने के लिए काम कर रहे हैं। इसकी बानगी हाल ही में घोषित उनकी नई प्रदेश कार्यकारिणी में कई युवा और सक्रिय नेताओं को उपाध्यक्ष, महामंत्री और मंत्री बनाया गया है। युवा नेताओं जैसे प्रदेश महामंत्री राहुल कोठारी, गौरव रणदिवे, और पूर्व भाजयुमो नेताओं को संगठन की मुख्यधारा में अहम पद दिए गए हैं। नंदिता पाठक और डॉ. निशांत खरे जैसे युवा चेहरों को प्रदेश उपाध्यक्ष जैसी जिम्मेदारियां दी गई हैं। यही नहीं, स्थानीय स्तर पर भी नए पार्षदों, जिला अध्यक्षों और युवा मोर्चा के नेताओं को प्रमोट किया गया है।
बुंदेलखंड अंचल की खुली लॉटरी
मध्यप्रदेश की राजनीति में बुंदेलखंड अंचल के नाम एक ऐसा ऐतिहासिक रिकॉर्ड दर्ज हो गया, जो पहले कभी नहीं हुआ। सूबे के इतिहास में पहली बार बुंदेलखंड से एक साथ दो चेहरे देश के उच्च सदन यानी राज्यसभा में प्रतिनिधित्व करते नजर आएंगे। भाजपा ने राज्यसभा चुनाव के लिए बड़ा दांव खेलते हुए सागर जिले के मंडी बामोरा निवासी भाजपा के प्रदेश मंत्री रजनीश अग्रवाल और निवाड़ी जिले में श्री रामराजा सरकार की नगरी ओरछा के रहने वाले मप्र मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को चुना है।
भाजपा ने तोड़ा 24 साल पुराना मिथक
बुंदेलखंड से राज्यसभा जाने का रिकॉर्ड कांग्रेस के नाम दर्ज था। कांग्रेस ने छतरपुर के रसूखदार चतुर्वेदी परिवार से विद्यावती चतुर्वेदी को 1966 और 1972 में दो बार उच्च सदन भेजा था। इसके बाद उनके बेटे सत्यव्रत चतुर्वेदी भी 2006 से 2018 तक पूरे 12 साल राज्यसभा सांसद रहे। मां-बेटे की इस जोड़ी ने 24 वर्षों तक क्षेत्र की राजनीति पर प्रभाव रखा, लेकिन भाजपा ने पहली बार अपने स्थानीय और जमीनी संगठनकर्ताओं को मौका देकर इस पुराने मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया।
पीढ़ी परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया

भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है। नए चेहरों का टिकट देना नई नहीं, बल्कि भाजपा की पुरानी परंपरा है। ये हर दल में होता है। रजनीश अग्रवाल-महेश केवट को राज्यसभा भेजने से बदलाव का काई लेना देना नहीं है। पद वाले को ही टिकट दिया गया। जब दूसरे दलों से आए नेताओं को दे रहे हैं, तो अपनों का देना ही पडेगा। उमा भारती और शिवराज सिंह चौहान भी इसी तरह आए थे। यहां विचार मायने रखता है।
दिनेश गुप्ता, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, भोपाल
नए चेहरों को आगे लाना बना ट्रेंड

भाजपा की रणनीति में पीढ़ी परिवर्तन और नए चेहरों को आगे लाना एक प्रमुख संगठनात्मक ट्रेंड बन चुका है। पार्टी ने मध्य प्रदेश में डॉ. मोहन यादव जैसे नए चेहरों को मुख्यमंत्री पद सौंपकर सबको चौंकाया है। युवाओं को बढ़ाने का उद्देश्य पार्टी को भविष्य के लिए तैयार करना है। जमीनी कार्यकताओं को आगे लाने से पार्टी के प्रति कार्यकर्ताओं का भरोसा बढ़ता है। उम्मीद रहती है कि रजनीश अग्रवाल जैसा मौका उन्हें भी मिलेगा।
जयराम शुक्ला, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, रीवा
पार्टी में जमीनी कार्यकर्ता का चयन

भाजपा में किसी को आगे बढ़ाने का चलन नया नहीं है। पार्टी में जमीनी कार्यकर्ताओं को पहचानकर ही चेहरे का चयन किया जाता है। जातीय समीकरण भी देखा जाता है। जैसे नरसिंहपुर के कैलाश सोनी और बड़वानी में प्रोफेसर रहे सुमेर सिंह सोलंकी को भाजपा ने राज्यसभा भेजा। रजनीश अग्रवाल को लगभग सब जानते हैं। वो पार्टी के पुराने चेहरों में गिने जाते हैं। यहां महेश केवट को आगे लाकर भाजपा ने एमपी-यूपी दोनों को साधा है।
प्रकाश भटनागर, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, भोपाल

बीमा पॉलिसी बेचने के लिए कंपनियां एजेंटों, बैंकों, ब्रोकरों और दूसरे डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों को कमीशन देती हैं। इस व्यवस्था में कमीशन कितना हो, किस उत्पाद पर कितना भुगतान उचित है और क्या ज्यादा कमीशन पाने की होड़ में ग्राहक को उसकी जरूरत से अलग पॉलिसी बेची जा सकती है—इन सवालों पर भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) ने नए सिरे से विचार शुरू किया है।
स्टार समाचार से खास मुलाकात.. हर सवाल का सीधा जवाब
इबोला वायरस अफ्रीकी देशों में तेजी से फैल रहा है। इसके दुर्लभ बुंडिबुग्यो स्ट्रेन का मौजूदा प्रकोप गंभीर है। डीआर कांगो में हजारों पुष्ट मामले और मौतें दर्ज हुई हैं, वहीं नाइजीरिया, युगांडा और केन्या में सामने आए मामलों ने सीमा पार प्रसार की चिंता बढ़ाई है। फिलहाल इसकी वैक्सीन नहीं होना भी एक बड़ी चुनौती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातस्थिति घोषित किया है।
मध्य प्रदेश में राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस अधिकारी शिवनारायण सिंह चौहान ने पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी और सदस्य सचिव हर्षल पंचोली पर संस्था के कामकाज में बाधा डालने तथा 237 ‘डीम्ड ईसी’ जारी करने में अनियमितताओं के दोषी तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी एवं सदस्य सचिव उमा महेश्वरी पर कार्रवाई की मांग की है।
मैदान पर पसीना बहाता हुआ एक युवा खिलाड़ी, जिसकी आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना है, और दूसरी तरफ जिन्हें खेल का ‘क, ख, ग’ भी नहीं मालूम, वे नेता और उनके ‘राजदुलारे’ खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है-क्या सूबे की अफसरशाही साहस के संकट से जूझ रही है। नियमों का इकबाल बुलंद करना तो दूर, व्यवस्था में कोई ऐसा दबंग चेहरा नजर नहीं आता जो मनमानी करने वालों पर सीधे नकेल कस सके।
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किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।
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