भोपाल के करोंद में शिया समुदाय ने अयातुल्ला खामेनेई को दी श्रद्धांजलि। इमाम बाकर हुसैन ने बताया उन्हें मजलूमों की आवाज। जानें खामेनेई का 35 साल का राजनीतिक और धार्मिक सफर।

भोपाल के करोंद में शिया समुदाय ने अयातुल्ला खामेनेई को दी श्रद्धांजलि
भोपाल। स्टार समाचार वेब
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अमेरिका-इजरायल के हमले में हुई शहादत की खबर के बाद भारत के शिया समुदाय में गम और गुस्से की लहर है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के करोंद स्थित 'मस्जिद मोहम्मदी' में रविवार को जोहर की नमाज के बाद एक विशाल श्रद्धांजलि सभा (मजलिस) का आयोजन किया गया। इस सभा में बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शामिल होकर अपने दिवंगत रहबर को याद किया।
सभा को संबोधित करते हुए प्रमुख धर्मगुरु इमाम बाकर हुसैन ने भावुक शब्दों में कहा कि अयातुल्ला खामेनेई केवल एक देश के नेता नहीं थे, बल्कि वे पूरी दुनिया के मजलूमों (पीड़ितों) की आवाज थे। उन्होंने कहा, "इतिहास गवाह है कि कर्बला की जंग में इमाम हुसैन की शहादत के बाद भी उनकी विचारधारा आज तक जिंदा है। किसी एक शख्सियत के चले जाने से इंकलाब (क्रांति) का रास्ता बंद नहीं होता। खामेनेई ने जिस जुल्म के खिलाफ आवाज उठाई थी, उसे आगे बढ़ाने वाले लोग हमेशा मौजूद रहेंगे।"
मजलिस के दौरान इमाम बाकर हुसैन ने कहा कि खामेनेई की शहादत से आज पूरी उम्मत-ए-मुसलमान खुद को यतीम महसूस कर रही है। उन्होंने दुश्मन की रणनीति पर तंज कसते हुए कहा कि कायर अक्सर पीछे से वार करते हैं, लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि शहादत किसी आंदोलन को कमजोर नहीं बल्कि और अधिक शक्तिशाली बनाती है। सभा के अंत में इजरायल और अमेरिका के खिलाफ जमकर नारेबाजी की गई और 'खामेनेई जिंदाबाद' व 'या हुसैन' के नारों से पूरा परिसर गूंज उठा।
मस्जिद मोहम्मदी के इमाम जुमा सैयद अजहर हुसैन रिजवी ने भी सभा में अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि खामेनेई ने कभी भी संप्रदाय या फिरके के आधार पर भेदभाव नहीं किया। उनका जीवन पूरी तरह से इंसानियत के लिए समर्पित था। वे जहां भी अत्याचार देखते थे, निडर होकर उसके खिलाफ खड़े हो जाते थे। इस्लाम की शिक्षा यही है कि जालिम का विरोध करो और मजलूम का साथ दो, और खामेनेई ने इसे पूरी शिद्दत से निभाया।
अयातुल्ला अली खामेनेई 1989 से ईरान की सर्वोच्च सत्ता पर काबिज थे। 1979 की इस्लामिक क्रांति में उन्होंने शाह मोहम्मद रजा पहलवी को हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1981 में वे ईरान के राष्ट्रपति बने और 8 साल तक देश की सेवा की। रुहोल्लाह खुमैनी के निधन के बाद वे ईरान के 'सुप्रीम लीडर' नियुक्त किए गए। 'अयातुल्ला' एक उच्च धार्मिक पदवी है। ईरान के कानून के अनुसार, देश का सर्वोच्च नेता केवल वही व्यक्ति बन सकता है जो एक प्रतिष्ठित धर्मगुरु हो
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