जानिए मध्य प्रदेश के सियासी और प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। जन्मदिन पर बड़े संभाग की कमान मिलने से लेकर भाजपा मीडिया प्रभारी की दौड़ में पत्रकारों की एंट्री और पीडब्ल्यूडी के नए कारनामों तक के सियासी किस्से।


बर्थडे के दूसरे दिन तबादले का तोहफा!
मध्यप्रदेश सरकार की आज जारी हुई तबादला सूची में एक अधिकारी की तो जैसे लॉटरी ही लग गई। साहब को प्रदेश के एक बड़े और महत्वपूर्ण संभाग की कमान सौंप दी गई है। वैसे अभी तक वे महत्वपूर्ण विभाग और निगम की जिम्मेदारी एक साथ संभाल रहे थे। लेकिन संभाग की कमान, संभाग की कमान होती है! खास बात यह है कि कल ही साहब का जन्मदिन था और जन्मदिन के ठीक अगले दिन सरकार ने बड़ी पदस्थापना का तोहफा दे दिया। अब इसे महज संयोग कहें या सरकार की तरफ से “बर्थडे गिफ्ट”… साहब के लिए तो यह जन्मदिन का जश्न एक दिन और आगे बढ़ गया। हालाँकि, कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि राजधानी में दो महत्वपूर्ण भाव का दायित्व से मुक्त होना कहीं सजा तो नहीं है..
मीडिया प्रभारी पर पत्रकारों की नजर!
मध्यप्रदेश भाजपा के मीडिया प्रभारी के दिल्ली में बड़े पद पर आसीन होने के बाद से प्रदेश में मीडिया प्रभारी का पद खाली है। स्वाभाविक है कि पार्टी के मीडिया से जुड़े नेताओं की नजर इस कुर्सी पर टिकी है… लेकिन इस बार कहानी में एक दिलचस्प ट्विस्ट भी है। कुर्सी पर नजर सिर्फ नेताओं की नहीं, कुछ पत्रकारों की भी है! सूत्रों की मानें तो कुछ पत्रकार इस पद के लिए बाकायदा लॉबिंग में जुटे हैं और अपनी-अपनी गोटियां फिट करने में लगे हैं। खास बात यह कि इस दौड़ में प्रदेश अध्यक्ष के गृह संभाग से लेकर मुख्यमंत्री के गृह जिले तक के पत्रकार पूरी ताकत लगा रहे हैं। अब असली सवाल यही है कि मीडिया प्रभारी की कुर्सी पर आखिर किसकी लॉटरी लगेगी? पार्टी के किसी नेता की या फिर पत्रकार की? पत्रकार की लॉटरी लगी, तो यह तीसरा मौका होगा जब पत्रकार मीडिया का दायित्व संभालेगा..
भर्ती में घोटाले के कारण गिरी गाज!
मध्यप्रदेश सरकार की नजर जब टेढ़ी होती है, तो बड़े-बड़े अफसरों की कुर्सी भी सीधी नहीं रह पाती। इन दिनों पुलिस महकमे के एक आला अधिकारी के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। मामला था भर्ती का। तैयारियां ऐसी कि बाहर से सब कुछ बेहद व्यवस्थित और पारदर्शी दिखे। अंदरखाने भी इतनी “सावधानी” बरती गई कि कहीं कोई उंगली न उठा सके। लेकिन कहते हैं न राजधानी में दीवारों के भी कान होते हैं। खबर ऊपर तक पहुंची तो फिर सारी सावधानियां धरी रह गईं। सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया और बिना ज्यादा देर किए अधिकारी को उस विभाग से बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब साहब की नई जिम्मेदारी खेल-कूद वाले मैदान में है। दिलचस्प बात यह है कि जिनके जिम्मे भर्ती जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया थी, अब उन्हें खेलों की जिम्मेदारी संभालनी होगी। महकमे में चर्चा बस इतनी है कि भर्ती का खेल भारी पड़ गया और सरकार ने भी खेलकूद में ही भेज दिया।
लोक निर्माण या धन निर्माण?
ऐसा मध्यप्रदेश में ही संभव है… और वह भी राजधानी भोपाल में! राजधानी में 90 डिग्री का ओवरब्रिज तो अब जनरल नॉलेज का विषय बन चुका है। लेकिन लोक निर्माण विभाग की “काबिलियत” की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इसी राजधानी में इसी विभाग से जुड़ा एक और मामले ने तो न्यायालय के ही होश उड़ा दिये । सवाल पूछा जा रहा है कि विभाग आखिर लोक निर्माण कर रहा है या धन निर्माण? मामला राजधानी में नए लोकार्पित ओवरब्रिज की टूट-फूट और मरम्मत से जुड़ा था। सामान्य तौर पर यदि निर्माण कार्य में कोई खामी या टूट-फूट ठेकेदार की जिम्मेदारी के दायरे में आती है, तो संबंधित ठेकेदार से ही उसे दुरुस्त कराया जाना चाहिए। लेकिन यहां विभाग ने संबंधित ठेकेदार से काम कराने के बजाय ब्लैक लिस्ट कर उसी काम के लिए बाकायदा टेंडर निकाल दिया। यानी जिस काम को ठेकेदार की जिम्मेदारी में बिना अतिरिक्त सरकारी खर्च के कराया जा सकता था, उसके लिए सरकारी खजाने पर खर्च डालने की तैयारी!
मामला जब अदालत पहुंचा तो वहां भी यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठा कि आखिर ऐसा क्यों किया जा रहा है? जिस काम के लिए सरकार को अतिरिक्त पैसा खर्च करने की जरूरत ही नहीं थी, उसके लिए सरकारी धन खर्च करने की कोशिश क्यों? मजेदार बात यह है कि इस विभाग के मंत्री अपने सख्त तेवरों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन उन्हीं की नाक के नीचे लोक निर्माण विभाग धननिर्माण विभाग बनता जा रहा है। अंदर खाने तलाशा जा रहा है कि इस टेंडर है किस किस की जेब गर्म होनी थी? निगाहें सरकार पर भी टिकी हैं कि कोर्ट में शर्मिंदा करने वाले व सरकार को चूना लगाने वाले अधिकारियों पर गाज कब गिरेगी।
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स्टार समाचार, स्टार स्ट्रेट, सुशील शर्मा, साप्ताहिक कॉलम
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