सतना में उदय सिंह पिछले 20 वर्षों से बिना किसी शुल्क के बच्चों को हॉकी का प्रशिक्षण दे रहे हैं। खेल को सेवा और जुनून मानकर वे नई पीढ़ी को तकनीक, अनुशासन और खेल भावना सिखा रहे हैं।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
जहां आज के दौर में खेल भी कमाई का जरिया बन चुके हैं, वहीं शहर में एक ऐसा शख्स भी है जो पिछले दो दशकों से हॉकी को सेवा मानकर सिखा रहा है। न फीस, न शर्त बस मैदान, बच्चे और खेल का जुनून। 50 साल की उम्र में भी कंधे पर स्टिक, हाथ में बॉल और आंखों में सपने लेकर उदय सिंह रोज मैदान पहुंचते हैं और आने वाली पीढ़ी को हॉकी का हुनर सिखा रहे हैं। उनके लिए यह काम रोजगार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है खेल को जिंदा रखने की जिम्मेदारी।
खेल को जुनून और सेवा मानने वालों में उदय सिंह का नाम अलग पहचान बनाता है। पिछले 20 वर्षों से वे हॉकी सिखा रहे हैं। खास बात यह है कि इसके बदले वे बच्चों से कोई फीस नहीं लेते। 12 से 25 साल तक के लड़के-लड़कियों को वे रोजाना अभ्यास कराते हैं और जरूरत पड़ने पर स्टिक, बॉल समेत अन्य खेल सामग्री भी खुद ही उपलब्ध कराते हैं।
खुद नहीं पहुंचे लेकिन पहुंचाने का लक्ष्य
उदय सिंह की हॉकी से दोस्ती बहुत छोटी उम्र में हो गई थी। महज सात साल की उम्र में उन्होंने खेलना शुरू किया और अपने समय में राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं तक पहुंचे। हालांकि वे बड़े मंच तक नहीं पहुंच सके, लेकिन अपने अनुभव और सीख को आगे बढ़ाने का संकल्प उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। आज 50 साल की उम्र में भी वे उसी जोश के साथ मैदान में उतरते हैं और खिलाड़ियों को तकनीक, फिटनेस और खेल भावना का पाठ पढ़ाते हैं।
बिना फीस हॉकी का प्रशिक्षण
जीविका चलाने के लिए उदय सिंह ने एसी बनाना और मरम्मत का काम सीखा। वे वर्ष 1992 से इसी पेशे से जुड़े हैं। दिन में काम और खाली समय में मैदान यही उनकी दिनचर्या है। वे कहते हैं कि अगर खिलाड़ी को सही दिशा और मौका मिल जाए, तो वह किसी भी हालात में आगे बढ़ सकता है। इसी सोच के साथ वे बच्चों को बिना किसी आर्थिक बोझ के प्रशिक्षण दे रहे हैं। उदय सिंह बताते हैं कि खेल संस्कार अपने पिता शेर सिंह से मिले। शेर सिंह रेलवे में गार्ड थे और खुद भी अच्छे खिलाड़ी व रेफरी रहे। उनसे मिली सीख ने उदय सिंह को खेल के प्रति ईमानदार और अनुशासित बनाए रखा। यही बातें मैं अपने शिष्यों को भी सिखाते हैं।
सात माह ही देते हैं प्रशिक्षण
उदय सिंह का सपना है कि उनके सिखाए खिलाड़ी जिला और राज्य से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। वे मानते हैं कि संसाधनों की कमी प्रतिभा को नहीं रोक सकती, बस सही मार्गदर्शन जरूरी है। मैदान में पसीना बहाते बच्चों को देखकर उन्हें अपनी मेहनत का असली इनाम मिल जाता है। वह जुलाई से लेकर जनवरी माह तक ही हॉकी का प्रशिक्षण देते हैं। वह कहते हैं कि इसके बाद परीक्षाओं की तैयारी में विद्यार्थी रहते हैं जिस कारण आगे का प्रशिक्षण नहीं हो पाता है।
वर्ष 2025 में इनका हुआ चयन
रेलवे के हॉकी मैदान में अपने शहर का हुनर तराश रहे उदय की नर्सरी से वर्ष 2025 में शालेय स्तर से महाविद्यालयीन स्तर तक में चयन हुए हैं। उन्होने बताया कि शालेय राजू, सनी, रवि शंकर, रवि तिवारी, प्रियांशु जबकि महाविद्यालयीन स्तर पर अंजलि कुशवाहा, अनीश कुशवाहा, बालेन्द्र पांडेय आदि का चयन हुआ था।


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