सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के साथ डील के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि छात्रों की सुरक्षा और हिंसा टालने के लिए उन्होंने 26 दिन का अनशन लिखित आश्वासन के बाद खत्म किया।

सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के साथ किसी भी तरह की गुप्त डील या समझौते के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने अपना 26 दिन का अनिश्चितकालीन अनशन केवल इसलिए समाप्त किया ताकि दिल्ली में छात्रों पर किसी प्रकार की पुलिस कार्रवाई या हिंसा को टाला जा सके। सरकार से ठोस और लिखित आश्वासन मिलने के बाद ही उन्होंने अपना यह कड़ा कदम वापस लिया।
शुक्रवार देर रात जारी एक यूट्यूब वीडियो में वांगचुक ने साझा किया कि दिल्ली के मौजूदा हालात को देखते हुए उन्हें अंदेशा था कि प्रदर्शनकारियों पर कोई बड़ी कार्रवाई की जा सकती है। उन्हें सितंबर 2025 में लद्दाख के युवाओं पर हुई पुलिस और सीआरपीएफ की फायरिंग की पुरानी घटना याद आ गई थी, जिससे उनके मन में डर था कि दिल्ली में भी वैसी ही अप्रिय स्थिति न पैदा हो जाए। शांति और सुरक्षा बनाए रखने की प्राथमिकता के चलते उन्होंने अनशन खत्म करने का कठिन निर्णय लिया।
अपने ऊपर लग रहे राजनीतिक समझौतों के आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए वांगचुक ने सवाल किया कि यदि उन्हें सरकार से कोई सौदा ही करना होता, तो वे 26 दिनों तक भूखा रहने का कष्ट क्यों उठाते? उन्होंने कहा कि वे दिल्ली की कठिन परिस्थितियों और गर्मी में अनशन करने के बजाय किसी आरामदायक एयर कंडीशन कमरे में बैठकर भी समझौता कर सकते थे। उनका एकमात्र और मुख्य उद्देश्य इस आंदोलन में शामिल मासूम छात्रों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना था।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर वांगचुक ने स्पष्ट किया कि बातचीत के दौरान उन्होंने इस मांग पर तात्कालिक जोर नहीं दिया, क्योंकि उनकी पहली प्राथमिकता छात्रों के खिलाफ एफआईआर दर्ज न होने देना और कानूनी कार्रवाई से बचाना था। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की यह मांग उनके आंदोलन का एक अहम हिस्सा बनी रहेगी और उन्हें पूरा विश्वास है कि भविष्य में यह मांग भी अवश्य पूरी होगी।
वांगचुक ने गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि 18 जुलाई को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद उनके साथ कैदी जैसा सुलूक किया गया। उनके अनुसार, उन्हें अस्पताल के कमरे से बाहर जाने, किसी से मिलने, और यहां तक कि अपना मोबाइल फोन व लैपटॉप तक अपने पास रखने की अनुमति नहीं थी। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे उत्तर कोरिया में रह रहे हों। दिल्ली हाईकोर्ट से मेदांता अस्पताल जाने की आधिकारिक अनुमति मिलने के बावजूद उन्हें घंटों सफदरजंग अस्पताल में रोके रखा गया।
सोनम वांगचुक के अनुसार, केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह उनसे मिलने मेदांता अस्पताल पहुंचे थे। सरकार की ओर से शुरुआत में केवल मौखिक आश्वासन देने की बात कही जा रही थी, लेकिन वांगचुक ने साफ कर दिया कि जब तक उन्हें लिखित आश्वासन नहीं मिलेगा, वे अपना अनशन समाप्त नहीं करेंगे। लिखित आश्वासन मिलने के बाद ही उन्होंने जूस पीकर अपना उपवास तोड़ा।
अनशन समाप्त करते वक्त अपने शुभचिंतकों और समर्थकों के पास न होने का मलाल जताते हुए वांगचुक ने कहा कि उनकी इच्छा थी कि लद्दाख के प्रतिनिधि, आंदोलन से जुड़े नेता और सांसद उनकी इस महत्वपूर्ण घड़ी में उनके साथ मौजूद रहें। परंतु, केंद्रीय मंत्रियों के आने से ठीक पहले उनके कई साथियों और सांसदों को मिलने से रोक दिया गया था। उन्होंने इसे अपने जीवन का सबसे बड़ा दुख बताया कि जब उन्होंने अनशन खत्म किया, तब उनके साथी और छात्र वहां मौजूद नहीं थे।
सोनम वांगचुक गत 28 जून से प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों, लद्दाख के अधिकारों, शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे जैसी विभिन्न मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे थे। आखिरकार, केंद्र सरकार की ओर से लिखित आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने 26 दिनों का यह लंबा और संघर्षपूर्ण अनशन समाप्त कर दिया।
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