रीवा और सतना में धान उठाव ठप रहने से गोदाम भरे, बारदाने की कमी के बीच गेहूं खरीदी संकट में, मिलर्स भुगतान अटका, खुले में भंडारण का खतरा, नियमों की अनदेखी पर सवाल तेज होते

हाइलाइट्स:
सतना/रीवा, स्टार समाचार वेब
विंध्य की धरती में समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीदी का शंखनाद हो चुका है, लेकिन इस 'उत्सव' से पहले प्रशासन के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो
गई हैं।
संकट यह है कि रीवा के गोदाम पहले से ही 'छक' कर भरे हुए हैं और गेहूं की होने वाली खरीदी के बाद भंडारण के लिए तिल रखने की भी जगह नहीं बची है। वहीं बारदानों की कमी ने नॉन को एक अजीब मुश्किल में डाल दिया है। गौरतलब है कि रबी की फसल दरवाजे पर दस्तक दे रही है और खरीफ की धान अब तक गोदामों का मोह नहीं छोड़ पा रही है। नियम के मुताबिक, खरीदी के तुरंत बाद धान को मिलिंग के लिए मिलर्स के पास जाना था, लेकिन गोदामों में रखी धान अब 'शोपीस' बनकर रह गई है।
कहां फंसा पेच
समर्थन मूल्य पर खरीदी गई धान का उठाव मात्र पांच फीसदी किया गया है। आलम यह है कि मिलिंग के लिए पहले से ही धान लेकर मिलर फंस गए हैं। उनका कहना है कि मिलिंग के करोड़ों रुपए का भुगतान बकाया है। जब तक उनका भुगतान नहीं किया जाएगा तब तक वे गोदामों से धान का उठाव नहीं करेंगे। नतीजतन, मिलिंग का पहिया थमा हुआ है।
बारदाने का अकाल
समर्थन मूल्य पर होने वाली गेहूं की खरीदी में संकट केवल जगह का नहीं है। बारदाने का भी है। खास बात यह है कि जिन गोदामों में हजारों क्विंटल धान बोरियों में भरकर रखी गई है वह खाली ही नहीं हो पाए। ऐसी स्थिति में गेहूं के लिए बारदाने जुटाने में नॉन के हाथ-पांव फूल रहे हैं। खास बात यह है कि गेहूं की तुलाई के लिए नए बारदानों का इंतजाम करना अब बड़ी चुनौती बन गया है।
खुले आसमान के नीचे सड़ेंगे सुनहरे दानें
किसानों की मेहनत और पसीने से उपजा गेहूं गोदामों में जगह न होने एवं बारदानों की कमी से इस बार भी कुप्रबंधन की भेंट चढ़ेगा यह आने वाला समय बताएगा। मिलरों द्वारा अगर धान का उठाव नहीं किया गया तो गोदाम खाली नहीं हो पाएंगे। ऐसी स्थिति में प्रशासन को मजबूरी में खुले आसमान के नीचे खरीदे गए गेहूं को कैप स्टोरेज में रखना पड़ेगा। बेमौसम बारिश और नमी के इस दौर में यह विकल्प किसी 'आत्मघाती' कदम से कम नहीं होगा।
46 एलएमटी धान में सिर्फ 23 फीसदी बोरियां
सतना में धान खरीदी को लेकर गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं। जहां एक ओर मध्यप्रदेश स्टेट सिविल सप्लाइज कार्पोरेशन खुद तय मानकों पर खरा नहीं उतर पाया, वहीं दूसरी ओर मिलर्स पर ऐसे नियम थोपे जा रहे हैं जो व्यावहारिक रूप से संभव ही नहीं हैं। सरकार द्वारा इस सीजन में करीब 46 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) धान की खरीदी की गई, जो लगभग 11000 लॉट के बराबर है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें से सिर्फ 10 एलएमटी धान ही नई बोरियों में खरीदा गया, जिसकी संख्या करीब 26.64 लाख बोरियां है। मानकों के अनुसार एक लॉट चावल जमा करने के लिए 580 बोरियां आवश्यक होती हैं। इस हिसाब से विभाग के पास केवल 4600 लॉट चावल जमा करने लायक ही नई बोरियां उपलब्ध हैं। साफ है कि कुल खरीदी का मात्र 23 फीसदी हिस्सा ही नई बोरियों में हुआ जबकि बाकी 70 से 80 फीसदी धान पुरानी बोरियों में खरीदा गया।
नियमों की खुली अनदेखी
विभागीय दिशा-निर्देशों के मुताबिक कम से कम 54 फीसदी धान नई बोरियों में खरीदा जाना अनिवार्य था लेकिन इस नियम का पालन नहीं किया गया। इधर, विसंगति यहीं खत्म नहीं होती। विभाग मिलर्स को निर्देश दे रहा है कि वे सीएमआर (कस्टम मिल्ड राइस) की डिलीवरी 100 फीसदी नई बोरियों में करें। सवाल उठता है कि जब खुद विभाग केवल 23 फीसदी धान नई बोरियों में खरीद पाया, तो मिलर्स 100 फीसदी नई बोरियों में चावल की आपूर्ति कैसे करें?
मिलर्स-प्रशासन आमने-सामने
सतना के राइस मिलर प्रभा शंकर त्रिपाठी का कहना है कि अतिरिक्त 70-80 फीसदी नई बोरियों की व्यवस्था करना न सिर्फ तकनीकी रूप से मुश्किल है बल्कि इससे उन पर भारी आर्थिक बोझ भी पड़ेगा। बाजार में बोरियों की उपलब्धता और लागत दोनों ही इस निर्देश को अव्यवहारिक बनाते हैं। इस पर पंकज बोरसे जिला प्रबंधक मध्यप्रदेश स्टेट सिविल सप्लाईज कार्पोरेशन का कहना है कि जो काम नहीं करना चाहते वह भ्रम फैला रहे हैं।


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