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भाजपा दफ्तर में अब कांच नहीं, गोपनीयता का राज

भाजपा अक्सर अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता का दावा करती रही है, लेकिन प्रदेश भाजपा कार्यालय में हाल के दिनों में जो बदलाव हुए हैं, उसने गलियारों में नई तरह की फुसफुसाहट शुरू कर दी है।दरअसल, भाजपा के नए पदाधिकारियों के आने के बाद कार्यालय के कई कक्षों में लगे ट्रांसपेरेंट कांच अब पारदर्शी नहीं रहे। पहले इन कांचों के जरिए बाहर से यह साफ दिखाई देता था कि कमरे के भीतर क्या गतिविधि चल रही है। कार्यकर्ता गलियारे से गुजरते हुए अपने नेताओं को काम करते हुए देख भी लेते थे और कई बार नजरें मिल भी जाती थीं।अब हालात बदल गए हैं। इन पारदर्शी कांचों पर ऐसी फिल्म चढ़ा दी गई है कि बाहर से अंदर का नजारा पूरी तरह ओझल हो गया है। यानी अब कमरों के भीतर क्या चल रहा है, यह बाहर खड़े कार्यकर्ताओं को दिखाई नहीं देता। कार्यालय के भीतर इसका तर्क भी दिलचस्प दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि जब कार्यकर्ता गलियारे से गुजरते हुए कमरों की तरफ देखते थे तो भीतर बैठे पदाधिकारियों का ध्यान भटक जाता था। इसलिए “कामकाज में एकाग्रता” बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया है।लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि कार्यकर्ताओं की नजर से ही बचना है तो फिर पार्टी की वह पारदर्शिता कहां गई, जिस पर अक्सर गर्व किया जाता है? आखिर जिन कार्यकर्ताओं के दम पर संगठन खड़ा होता है, उनसे ही अगर कमरे का नजारा छिपाना पड़े तो चर्चा तो होगी ही।
इतने सस्ते कलेक्टर कहां मिलेंगे!
विंध्य क्षेत्र की प्रशासनिक गलियों में इन दिनों एक कलेक्टर साहब खासे चर्चा में हैं। वजह उनके फैसले नहीं, बल्कि उनकी “दरियादिली” बताई जा रही है। चर्चा यह है कि साहब इतने “सुलभ” हैं कि थोड़ी-सी रकम में ही कई कामों की फाइलें तेजी से दौड़ने लगती हैं। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि जनाब ने मानो कलेक्टरी नहीं, कोई छोटी-सी दुकान खोल रखी हो, जहां “रेट लिस्ट” भले सार्वजनिक न हो, पर काम कराने वालों को रास्ता अच्छी तरह मालूम है। दिलचस्प बात यह है कि कलेक्टर साहब की यह “ख्याति” अब सिर्फ जिले तक सीमित नहीं रही। फुसफुसाहटें राजधानी के मंत्रालय के पांचवें माले तक भी पहुंच चुकी हैं। वहां बैठे बड़े अफसरों के कानों में भी यह चर्चा धीरे-धीरे गूंजने लगी है कि विंध्य में एक कलेक्टर साहब “बहुत किफायती” साबित हो रहे हैं। अब देखना यह है कि साहब इन शिकायतों का इलाज कैसे करते हैं सफाई देकर मामला ठंडा करते हैं या फिर ऊपर बैठे लोग ही उनका “ट्रांसफर ऑर्डर” लिखकर इस दुकान पर ताला लगवा देते हैं। बता दें साहब का ज़िला टाइगर को लेकर भी ख्याति प्राप्त है फिलहाल तो प्रशासनिक गलियारों में यही तंज घूम रहा है कि इतने सस्ते कलेक्टर आजकल मिलते कहां हैं!
कांग्रेस का ‘लीगल सेल’ कानून बाद में, लापरवाही पहले

लोकतंत्र में चुनाव केवल वोटों का खेल नहीं होता, यह राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा का सवाल भी होता है। खासकर जब मामला उपचुनाव का हो तो सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के विजयपुर उपचुनाव में कांग्रेस ने एक अलग ही “रिकॉर्ड” बना दिया जीतकर भी हारने का। कहानी बड़ी दिलचस्प है। कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव जीत गए, लेकिन बाद में पता चला कि हलफनामे में ही गड़बड़ी हो गई। बस, यहीं से पूरी जीत की कहानी उल्टी पड़ गई और मामला अदालत तक पहुंच गया। नतीजा जिस सीट पर कांग्रेस ने जीत का परचम लहराया था, वही विधायकी हाथ से फिसल गई। अब बड़ा सवाल यह है कि जब फार्म भरा जा रहा था तब कांग्रेस का तथाकथित “लीगल सेल” कहां था? कांग्रेस अध्यक्ष की टीम कहां थी? नेता प्रतिपक्ष की पूरी फौज किस काम में व्यस्त थी? चुनाव में जहां बूथ से लेकर बैलेट तक रणनीति बनाई जाती है, वहां एक साधारण कानूनी दस्तावेज की जांच तक नहीं हो पाई। लगता है कि कांग्रेस का लीगल सेल शायद नाम का ही रह गया है।दिलचस्प यह भी है कि अब जब मामला हाथ से निकल चुका है तो कुछ जिम्मेदार लोग अदालत पर ही तंज कसने में जुट गए हैं। लेकिन सवाल वही है कि क्या कभी अपनी ही गिरेबान में झांकने की फुर्सत मिलेगी?आखिर लोकतंत्र में चुनाव लड़ना केवल भाषण देने का काम नहीं होता, कागजों की दुनिया भी उतनी ही गंभीर होती है। और विजयपुर ने यह सबक कांग्रेस को कुछ ज्यादा ही महंगा देकर याद दिलाया है।

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मध्य प्रदेश में राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस अधिकारी शिवनारायण सिंह चौहान ने पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी और सदस्य सचिव हर्षल पंचोली पर संस्था के कामकाज में बाधा डालने तथा 237 ‘डीम्ड ईसी’ जारी करने में अनियमितताओं के दोषी तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी एवं सदस्य सचिव उमा महेश्वरी पर कार्रवाई की मांग की है।
मैदान पर पसीना बहाता हुआ एक युवा खिलाड़ी, जिसकी आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना है, और दूसरी तरफ जिन्हें खेल का ‘क, ख, ग’ भी नहीं मालूम, वे नेता और उनके ‘राजदुलारे’ खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है-क्या सूबे की अफसरशाही साहस के संकट से जूझ रही है। नियमों का इकबाल बुलंद करना तो दूर, व्यवस्था में कोई ऐसा दबंग चेहरा नजर नहीं आता जो मनमानी करने वालों पर सीधे नकेल कस सके।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। हर रविवार को सुशील शर्मा की कलम से
किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। निर्माण विभाग की वेबसाइट से संपत्ति का ब्योरा गायब, दो संभागों में अफसरों की तनातनी और अन्य चर्चित मामले विस्तार से पढ़ें।
ग्वालियर की चंबल माटी से छात्र राजनीति के शिखर तक पहुंचे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के पूर्णकालिक कार्यकर्ता से मध्य प्रदेश युवा आयोग के अध्यक्ष बने प्रवीण शर्मा के साथ स्टार समाचार की खास बातचीत।
मध्य प्रदेश भाजपा में संगठन महामंत्री का पद केवल एक राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक संतुलन, सख्त अनुशासन और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने वाली मुख्य धुरी माना जाता है। नौ महीनों से इस शीर्ष पद का खाली होना पार्टी के भीतर एक बड़ी ‘कमी’ को बयां कर रहा है।
पॉलिसी बेचते समय मुस्कुराते चेहरों के साथ कैशलेस इलाज और झटपट दावों का प्रलोभन देने वाली बीमा कंपनियों की असलियत क्लेम के वक्त सामने आ रही हैं। नियम-शर्तों की बारीक लाइनों का जाल बुनकर आम जनता की गाढ़ी कमाई हड़पने और उनके दावों को खारिज करने की मनमानी का यह खेल अब बड़ी समस्या बन चुका है।