भोपाल एम्स के डॉ. सुखेस मुखर्जी ने कैंसर के इलाज के लिए नई नैनो तकनीक खोजी है। जानें कैसे लाल रोशनी और नैनोकणों के जरिए बिना साइड इफेक्ट के खत्म होगा ट्यूमर।

भोपाल. स्टार समाचार वेब
भोपाल एम्स (AIIMS) के बायोकैमिस्ट्री विभाग के डॉ. सुखेस मुखर्जी ने कैंसर उपचार की दिशा में एक क्रांतिकारी नैनो तकनीक विकसित की है। यह तकनीक मानवीय बाल से हजारों गुना छोटे नैनोकणों पर आधारित है, जो शरीर के भीतर छिपे हुए ट्यूमर तक पहुँचने में सक्षम हैं। इस पद्धति की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि ये कण शरीर में तब तक निष्क्रिय रहते हैं जब तक उन पर विशेष रूप से लाल रोशनी (Red Light) नहीं डाली जाती। जैसे ही प्रकाश इन कणों पर पड़ता है, ये सक्रिय होकर कैंसर कोशिकाओं पर 'डुअल अटैक' करते हैं, जिससे स्वस्थ कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं पहुँचता।
कैसे काम करती है यह 'स्मार्ट' तकनीक?
इस शोध में FDA द्वारा स्वीकृत 'प्रुशियन ब्लू' के संशोधित संस्करण को मैंगनीज यौगिक के साथ मिलाकर एक नया कंपाउंड तैयार किया गया है। लाल रोशनी मिलते ही ये नैनोकण सिंगलेट ऑक्सीजन और कार्बन मोनोऑक्साइड छोड़ते हैं, जो कैंसर सेल्स को जड़ से नष्ट कर देते हैं। इस तकनीक की प्रभावकारिता का लोहा अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘डॉल्टन ट्रांजैक्शंस’ ने भी माना है। प्रारंभिक शोध में इसे स्तन (Breast) और यकृत (Liver) कैंसर के इलाज में बेहद सटीक और असरदार पाया गया है।
साइड इफेक्ट्स से मिलेगी मुक्ति
पारंपरिक कीमोथेरेपी और रेडिएशन के विपरीत, यह टारगेटेड थेरेपी मरीजों के लिए अधिक सुरक्षित है। चूँकि नैनोकण अंधेरे में निष्क्रिय रहते हैं और केवल डॉक्टर द्वारा निर्देशित स्थान पर ही सक्रिय होते हैं, इसलिए शरीर के स्वस्थ अंगों पर इनका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। यदि इन कणों का उपयोग नहीं होता, तो ये समय के साथ शरीर में अपने आप घुलकर समाप्त हो जाते हैं। यह खोज भविष्य में कैंसर के इलाज को न केवल सस्ता बल्कि दर्दमुक्त और अधिक प्रभावी बनाने की उम्मीद जगाती है।

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