एफसीआई में चावल जमा कराने के दौरान स्टैकिंग शुल्क के नाम पर मिलरों से वसूली, दोहरे भुगतान और ढाई करोड़ रुपये से अधिक की कथित वित्तीय अनियमितता के आरोपों ने पारदर्शिता तथा जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) में समर्थन मूल्य पर खरीदे गए धान से तैयार चावल जमा कराने की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि प्रत्येक लगभग 290 क्विंटल चावल के एक लॉट को एफसीआई गोदाम में जमा कराने के दौरान स्टैकिंग (बोरियों को व्यवस्थित ढंग से रखने) के नाम पर मिलरों से करीब 2500 प्रति लॉट श्रम शुल्क वसूला जाता है। गंभीर आरोप यह भी है कि यह राशि एफसीआई अधिकारियों के निर्देश पर मिलरों द्वारा मजदूरों को दी जाती है जबकि अभिलेखों में भुगतान किसी ठेकेदार के माध्यम से दर्शाया जाता है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल मिलरों के आर्थिक शोषण का नहीं, बल्कि सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग और भ्रष्टाचार का भी हो सकता है।
जिले के एफसीआई गोदामों में चावल जमा कराने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। शिकायत के अनुसार प्रत्येक लगभग 290 क्विंटल चावल के एक लॉट को गोदाम में उतारकर स्टैकिंग कराने के लिए मिलरों से करीब 2500 प्रति लॉट श्रम शुल्क लिया जाता है। यह भुगतान एफसीआई अधिकारियों के निर्देश पर सीधे मजदूरों को कराया जाता है जबकि सरकारी रिकॉर्ड में संबंधित राशि का भुगतान किसी अधिकृत ठेकेदार के माध्यम से दिखाए जाने का आरोप है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि स्टैकिंग कार्य के लिए एफसीआई ने पहले से ठेकेदार नियुक्त कर रखा है और उसे सरकारी भुगतान भी किया जा रहा है तो फिर वही कार्य कराने के लिए मिलरों से अलग से राशि क्यों ली जा रही है। इस व्यवस्था से भुगतान की पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई है।
मिलरों को नहीं मिलती प्रतिपूर्ति
आरोप है कि मिलरों से वसूली गई राशि की कोई प्रतिपूर्ति नहीं की जाती। यानी मिलर अपने खर्च पर स्टैकिंग कराते हैं जबकि दूसरी ओर उसी कार्य के लिए सरकारी भुगतान भी होने की आशंका जताई जा रही है। यदि ऐसा है तो यह दोहरी भुगतान व्यवस्था का मामला हो सकता है जिसकी जांच आवश्यक बताई जा रही है।
ढाई करोड़ रुपये से अधिक का मामला
शिकायत में दावा किया गया है कि इस वर्ष एफसीआई में लगभग 110011 लॉट चावल जमा होना है। यदि प्रत्येक लॉट पर 2500 के हिसाब से श्रम शुल्क लिया जाता है तो कुल राशि लगभग 2,50,29,327 (करीब ढाई करोड़ रुपये) बैठती है। आरोप है कि इतनी बड़ी राशि के भुगतान और व्यय की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह व्यवस्था पिछले करीब दो वर्षों से लगातार चल रही है। यदि बीते वर्षों के भुगतान का भी रिकॉर्ड खंगाला जाए तो कथित वित्तीय अनियमितता का दायरा और बड़ा हो सकता है। श्रमिकों के खाते में हुए वास्तविक भुगतान। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि यदि इन दस्तावेजों का मिलान कराया जाए तो यह स्पष्ट हो सकता है कि भुगतान वास्तव में किसे हुआ और स्टैकिंग कार्य किसके माध्यम से कराया गया।
भ्रष्टाचार और सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि इस पूरी व्यवस्था में कुछ ठेकेदारों और एफसीआई के अधिकारियों की मिलीभगत से वित्तीय अनियमितता की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला सार्वजनिक धन के दुरुपयोग, वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार की श्रेणी में आ सकता है।
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