सिंगरौली के कपुरदेई में हजारों आदिवासी दूषित नाले का पानी पीने को मजबूर हैं, हैंडपंप खराब और योजनाएं फेल। शिकायतों के बावजूद समाधान नहीं, ग्रामीणों ने स्थायी पेयजल व्यवस्था की मांग उठाई है।

हाइलाइट्स:
सिंगरौली, स्टार समाचार वेब
जिले के विकासखंड चितरंगी अंतर्गत ग्राम पंचायत कपुरदेई से जो तस्वीर सामने आई है वह न सिर्फ चौंकाने वाली है बल्कि शासन-प्रशासन के दावों की पोल खोलने वाली भी है। एक ओर सरकार हर घर नल जल और आदिवासी कल्याण की बड़ी-बड़ी योजनाओं का ढिंढोरा पीट रही है वहीं दूसरी ओर कपुरदेई के आदिवासी आज भी अपनी प्यास बुझाने के लिए नाले का दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। भीषण गर्मी के इस दौर में जब जलस्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं, तब ग्रामीण नाले में गड्ढा खोदकर पानी निकालते हैं और उसी से अपनी प्यास बुझाते हैं। यह पानी न सिर्फ गंदा है बल्कि गंभीर बीमारियों को न्योता देने वाला भी है। बावजूद इसके, जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस भयावह स्थिति पर आंखें मूंदे बैठे हैं।
गौरतलब है कि ग्राम पंचायत कपुरदेई की आबादी करीब 9 से 10 हजार के बीच बताई जा रही है। पंचायत में जमतिहवा, भैसहार और बगड़ा जैसी बड़ी बस्तियां शामिल हैं, जहां कागजों में कुल 16 हैंडपम्प दर्ज हैं। लेकिन जब जमीनी हकीकत देखी गई, तो इनमें से कई हैंडपम्प खराब पाए गए जबकि कुछ ऐसे स्थानों पर लगे हैं, जहां जरूरतमंद आबादी तक उनकी पहुंच ही नहीं है। सबसे ज्यादा भयावह स्थिति मुंगहवा टोला की है, जहां लगभग 150 आदिवासी परिवार पीढ़ियों से निवास कर रहे हैं। इस टोले में पेयजल की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। यहां एकमात्र हैंडपम्प 500 मीटर से अधिक दूरी पर स्थित है, जो बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए किसी सजा से कम नहीं है। मजबूरी में ये लोग नाले का गंदा पानी पीने को विवश हैं। ग्रामीण बताते हैं कि जब नाले का पानी भी सूख जाता है, तब वे गोतान नदी का सहारा लेते हैं, जो कई बार दूषित और असुरक्षित होती है। बारिश के समय हालात और भी बदतर हो जाते हैं, जब गंदे पानी में मिट्टी और कचरा मिल जाता है, जिससे संक्रामक बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
राज्यमंत्री तक पहुंची शिकायत, बावजूद समाधान नही
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस गंभीर समस्या को लेकर ग्रामीणों ने कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की, यहां तक कि राज्यमंत्री स्तर तक मामला पहुंचाया गया लेकिन आज तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला। यह साफ दर्शाता है कि प्रशासनिक तंत्र सिर्फ कागजी खानापूर्ति में व्यस्त है और जमीनी समस्याओं से उसका कोई लेना-देना नहीं रह गया है। पंचायत स्तर पर टैंकर से पानी उपलब्ध कराने का दावा जरूर किया जाता है, लेकिन यह व्यवस्था न तो नियमित है और न ही पर्याप्त। कई बार टैंकर समय पर नहीं पहुंचते, जिससे लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में आखिरकार ग्रामीणों के पास दूषित पानी पीने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
आदिवासी क्षेत्रों में दिखावटी की योजनाएं
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार और प्रशासन आदिवासी क्षेत्रों को लेकर सिर्फ दिखावटी योजनाएं बनाता है, जिनका वास्तविक लाभ कभी जमीनी स्तर तक नहीं पहुंचता। हर घर नल जल जैसी योजनाएं सिर्फ पोस्टर और भाषणों तक सीमित हैं जबकि हकीकत यह है कि यहां लोग आज भी नाले का पानी पीने को मजबूर हैं। इस पूरे मामले ने प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता की पोल खोल दी है। सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक आदिवासी समुदाय इस तरह मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसता रहेगा? क्या विकास सिर्फ शहरों और कागजों तक सीमित रहेगा या फिर गांवों तक भी इसकी रोशनी पहुंचेगी।
स्थायी पेयजल व्यवस्था कराने की मांग
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि मुंगहवा टोला सहित पूरे पंचायत क्षेत्र में तत्काल स्वच्छ पेयजल की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। खराब पड़े हैंडपम्पों की मरम्मत कराई जाए और जहां जरूरत है, वहां नए हैंडपम्प या नलजल योजना के तहत कनेक्शन दिए जाएं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या कपुरदेई के आदिवासियों को साफ पानी नसीब होगा या फिर वे यूं ही नाले का जहर पीकर अपनी जिंदगी गुजारने को मजबूर रहेंगे। यह सवाल आज भी जवाब मांग रहा है।


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