सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम को अंतरिम जमानत देने से किया इनकार, लेकिन स्वास्थ्य को देखते हुए अपनी पसंद का केयरटेकर रखने की दी अनुमति। जानिए 2013 के इस मामले से जुड़ी पूरी अपडेट।

यौन उत्पीड़न के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा आसाराम
नई दिल्ली: स्टार समाचार वेब
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसले में आसाराम को अंतरिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है। आसाराम वर्ष 2013 के एक नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है। हालांकि, अदालत ने उनकी स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें 24 घंटे मदद के लिए अपनी पसंद का एक अनुभवी केयरटेकर रखने की अनुमति दे दी है।
जस्टिस एम एम सुंदरेश और पी बी वराले की बेंच ने स्वास्थ्य के आधार पर दायर की गई आसाराम की अंतरिम जमानत की याचिका को फिलहाल लंबित रखा है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि भविष्य में उनकी तबीयत अधिक बिगड़ती है, तो वे दोबारा अपने मामले का जिक्र अदालत में कर सकते हैं। सुनवाई के दौरान, राजस्थान सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आपत्ति जताते हुए कहा कि आसाराम ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाया था कि उनके वकील द्वारा पहले ही पैरोल के लिए आवेदन दिया जा चुका है। इसके जवाब में आसाराम के वकील ने दलील दी कि वह पैरोल आवेदन काफी पहले दायर किया गया था और वह चिकित्सीय कारणों पर आधारित नहीं था।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया गया था कि अखिल भारतीय आयुर्वेद विज्ञान संस्थान (AIIMS) द्वारा गठित एक विशेष चिकित्सा बोर्ड ने जांच के बाद पाया कि आसाराम को अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता नहीं है, हालांकि उन्हें निरंतर मेडिकल सपोर्ट की जरूरत है। सर्वोच्च न्यायालय ने 21 जुलाई को AIIMS को उनकी स्वास्थ्य स्थिति का सही आकलन करने के लिए एक बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था। वहीं, इस महीने की शुरुआत में राजस्थान उच्च न्यायालय ने 85 वर्षीय आसाराम को 20 दिनों की पैरोल मंजूर की थी, क्योंकि राज्य सरकार उनके पैरोल आवेदन को खारिज करने के अपने निर्णय को पुख्ता तौर पर सही साबित नहीं कर पाई थी। उच्च न्यायालय ने यह राहत देते हुए आसाराम द्वारा जेल में बिताए गए अब तक के समय और अंतरिम रिहाई के दौरान उनके आचरण को आधार बनाया था।
सुप्रीम कोर्ट वर्तमान में राजस्थान हाई कोर्ट के 27 मई के उस फैसले के खिलाफ आसाराम की अपील पर भी सुनवाई कर रहा है, जिसमें 2013 के मामले में उनकी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा गया था।
आरोप और बरी होना:
उच्च न्यायालय ने उन्हें पूर्व भारतीय दंड संहिता (IPC) और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत सामूहिक बलात्कार और गंभीर यौन उत्पीड़न से संबंधित कुछ आरोपों से बरी कर दिया था।
बहाल रखी गई सजा:
अदालत ने आईपीसी की धारा 376(2)(F) के तहत नाबालिग के बलात्कार के लिए उनकी सजा और निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
अन्य धाराएं:
इसके अलावा आईपीसी की धारा 342 (गलत तरीके से कैद), 370(4) (तस्करी), 506 (आपराधिक धमकी), 509 (महिला की गरिमा का अपमान) और 354ए (यौन उत्पीड़न), साथ ही पॉक्सो अधिनियम की धारा 7 व 8 और किशोर न्याय अधिनियम की धारा 23 के तहत उनकी सजा को भी वैध ठहराया गया।
गौरतलब है कि एक निचली अदालत ने 25 अप्रैल, 2018 को अपने आश्रम में एक नाबालिग छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न के गंभीर मामलों में आसाराम को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
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