पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में दरार की खबरें तेज हैं। भाजपा सरकार के खिलाफ विधानसभा परिसर में हुए पहले बड़े धरने से 80 में से 46 टीएमसी विधायक नदारद रहे।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करने और सत्ता से बेदखल होने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) की अंदरूनी मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। चुनावी शिकस्त के बाद राज्य की नवगठित भाजपा सरकार के खिलाफ तृणमूल द्वारा बुधवार को विधानसभा परिसर में आयोजित पहला बड़ा धरना-प्रदर्शन ही गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। इस प्रदर्शन में विधायकों की बेहद कम उपस्थिति ने पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक न होने के साफ संकेत दिए हैं।
तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में चुनाव बाद हुई कथित राजनीतिक हिंसा, नई सरकार की बुलडोजर कार्रवाई और रेलवे भूमि व स्टेशनों के आसपास से फेरीवालों (हॉकर्स) को जबरन हटाए जाने के विरोध में एक बड़े आंदोलन की रूपरेखा तैयार की थी। इसके तहत कोलकाता स्थित विधानसभा परिसर में डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के सामने एक धरने का आयोजन किया गया था। लेकिन, इस महत्वपूर्ण प्रदर्शन से तृणमूल के नवनिर्वाचित 80 विधायकों में से 46 विधायक गायब रहे।
शुरुआत में इस धरने में केवल 31 विधायक ही पहुंचे थे, हालांकि बाद में तीन और विधायक इसमें शामिल हुए, जिससे कुल संख्या 34 तक पहुंच सकी। आधे से अधिक विधायकों की इस अनुपस्थिति के कारण पार्टी की अंदरूनी एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नतीजतन, विपक्ष में आने के बाद पार्टी का यह पहला बड़ा विरोध-प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहा और महज आधे घंटे के भीतर ही इसे समाप्त करना पड़ा।
राजनीतिक गलियारों में हलचल इस बात को लेकर भी तेज है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे ठीक एक दिन पहले तृणमूल सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर पार्टी विधायकों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई थी। हैरानी की बात यह है कि उस बैठक से भी पार्टी के 15 विधायक नदारद रहे थे। लगातार दो दिनों में विधायकों की इस अनुपस्थिति ने नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
इस प्रदर्शन में तृणमूल विधायक दल के नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय, पूर्व मंत्री व कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम और मुख्य प्रवक्ता कुणाल घोष सहित कई वरिष्ठ नेता और पदाधिकारी मौजूद थे। हालांकि, धरने के दौरान एक और दिलचस्प वाकया देखने को मिला। पूरे प्रदर्शन में 'ममता बनर्जी जिंदाबाद' और 'तृणमूल कांग्रेस जिंदाबाद' के नारे तो गूंजते रहे, लेकिन एक बार भी पार्टी के कद्दावर नेता 'अभिषेक बनर्जी जिंदाबाद' का नारा सुनाई नहीं दिया। राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी के भीतर बदलते समीकरणों और आंतरिक खींचतान से जोड़कर देख रहे हैं।
विधायकों की इस भारी अनुपस्थिति पर डैमेज कंट्रोल करते हुए पार्टी प्रवक्ता कुणाल घोष ने सफाई दी। उन्होंने कहा कि चुनाव के बाद कई क्षेत्रों में तृणमूल कार्यकर्ताओं पर हमले हुए हैं, इसलिए कई विधायक अपने-अपने इलाकों में स्थिति को संभालने में व्यस्त हैं। इसके अतिरिक्त, पार्टी की फैक्ट फाइंडिंग टीमें अलग-अलग जिलों के दौरे पर हैं, जिसके कारण कई विधायक समय पर कोलकाता नहीं पहुंच सके।
दूसरी ओर, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे की कहानी कुछ और है। राज्य में सत्ता परिवर्तन होते ही तृणमूल नेताओं के खिलाफ कथित वसूली, सिंडिकेट राज, धमकी और वित्तीय अनियमितताओं के मामलों में पुलिस ने कार्रवाई तेज कर दी है। हाल के दिनों में हुई कुछ गिरफ्तारियों और पूछताछ के दौर ने तृणमूल खेमे में भारी बेचैनी पैदा कर दी है, जिसके चलते कई विधायक अब संगठन की गतिविधियों से दूरी बनाते दिख रहे हैं।
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