मध्य प्रदेश अपनी स्थापना के सत्तर वर्ष पूर्ण कर रहा है। एक ऐसी यात्रा जिसके प्रत्येक अध्याय में समय का मौन इतिहास छिपा है। देवउठनी एकादशी के इस पवित्र दिवस पर जब राज्य अपनी आयु का यह महत्वपूर्ण पर्व मना रहा है, तब यह प्रश्न अनायास ही उठ खड़ा होता है कि क्या हमने अपनी विराट विरासत को उसी श्रद्धा और विश्वास से देखा, जैसा वह देखे जाने की पात्र है? यह प्रश्न केवल संस्कृति का नहीं, आत्मबोध का है।

मध्य प्रदेश स्थापना दिवस पर विशेष
सुशील शर्मा
मध्य प्रदेश अपनी स्थापना के सत्तर वर्ष पूर्ण कर रहा है। एक ऐसी यात्रा जिसके प्रत्येक अध्याय में समय का मौन इतिहास छिपा है। देवउठनी एकादशी के इस पवित्र दिवस पर जब राज्य अपनी आयु का यह महत्वपूर्ण पर्व मना रहा है, तब यह प्रश्न अनायास ही उठ खड़ा होता है कि क्या हमने अपनी विराट विरासत को उसी श्रद्धा और विश्वास से देखा, जैसा वह देखे जाने की पात्र है? यह प्रश्न केवल संस्कृति का नहीं, आत्मबोध का है।
मध्य प्रदेश की भूमि सदियों से सभ्यता की शिला रही है। यहाँ की नदियाँ केवल जल की धारा नहीं, इतिहास की स्मृति हैं; यहाँ के पर्वत केवल प्रकृति का विस्तार नहीं, तप और त्याग के साक्षी हैं। भीमबेटका की गुफाएँ मानव सभ्यता की प्रथम आभा को संजोए हैं; खजुराहो के मंदिर देवत्व के शिल्प में उकेरे गए गीत हैं; भोजपुर का अधूरा मंदिर अपूर्णता में पूर्णता का बोध कराता है; और साँची का स्तूप मानवता के शांत स्वप्न का प्रतीक है। यही वे स्थूल चिन्ह हैं जिनसे मध्य प्रदेश की पहचान विश्व के पटल पर बनी।
किन्तु इस भूमि की आत्मा केवल इन पत्थरों में नहीं, उन पुरुषार्थों में है जिन्होंने इतिहास को दिशा दी। अवंतिका के सम्राट विक्रमादित्य ऐसे ही युगनायक हैं। नीति, पराक्रम और प्रजावत्सलता के अप्रतिम प्रतिमान। किन्तु दुर्भाग्य यह कि वे इतिहास के पन्नों में तो पूज्य रहे, पर जनस्मृति में विस्मृत। हमारे विद्यालयों मैं कभी पाठ्यक्रम में विक्रमादित्य को स्थान ही नहीं मिला और उनका नाम वेताल और सिंहासन बत्तीसी के किस्सों तक सीमित रहा, जिसे किवदंती ही माना गया। विक्रमादित्य की शासनदृष्टि, नीति और संस्कृति की विराटता पर मौन पसरा रहा। यही विस्मरण उस आत्मविश्वास के ह्रास का प्रतीक था जो किसी भी सभ्यता को जड़ों से जोड़ता है।
विक्रमादित्य ही क्यों, मध्य प्रदेश में ऐसी असंख्य धरोहरें हैं जिनके वैभव का ज्ञान देश तो क्या, प्रदेश के जनमानस तक को नहीं। मंदसौर का कैलाश मंदिर, उमरिया का विष्णु मंदिर, बुरहानपुर की स्थापत्य संपदा, सतपुड़ा के शैव तीर्थ, सब उस विराट विरासत के अंश हैं जिन्हें हमने धीरे-धीरे किंवदंती मान लिया। यह विस्मरण केवल ऐतिहासिक नहीं, मानसिक भी है। जब कोई समाज अपने गौरव से विमुख होता है तो उसका विकास भी दिशाहीन हो जाता है।
ऐसे समय में, जब आधुनिकता के नाम पर अतीत की उपेक्षा लगभग प्रवृत्ति बन चुकी थी, इतिहास ने करवट ली। वर्ष 2023 में महाकाल के भक्त डॉ. मोहन यादव ने सत्ता संभाली, तो यह केवल शासन का परिवर्तन नहीं था, दृष्टि का परिवर्तन था। उन्होंने यह स्थापित किया कि विरासत केवल पुरातत्व नहीं, वर्तमान की आत्मा है। उनका मानना है कि किसी राज्य का वास्तविक विकास तभी संभव है जब वह अपनी जड़ों में विश्वास करना सीख जाए।
डॉ. मोहन यादव की सरकार ने “विरासत से विकास” का जो भाव जनमानस में जगाया, वह केवल नीतिगत अभियान नहीं, आत्मगौरव का नवसंस्कार है। उन्होंने विक्रमादित्य को इतिहास की अलमारी से निकालकर जनचेतना का जीवंत प्रतीक बना दिया। यह उनका ही संकल्प है जिसने उज्जैन की गलियों से लेकर साँची की पहाड़ियों तक यह संदेश पहुँचाया कि हम केवल विकास की दौड़ में नहीं, इतिहास की निरंतरता में भी सहभागी हैं।
विरासत पर विश्वास का यह जज़्बा आज मध्य प्रदेश को नई आत्मा प्रदान कर रहा है। यह सरकार नदियों में स्मृति, पर्वतों में प्रेरणा और स्मारकों में चेतना खोज रही है। यह स्वीकार कर रही है कि प्रगति का मार्ग अतीत से होकर ही भविष्य तक पहुँचता है। यह पुनर्जागरण की वह घड़ी है जब राज्य अपने अतीत के प्रति केवल भावुक नहीं, दायित्ववान भी हुआ है।
डॉ. मोहन यादव की दृष्टि में यह पुनर्जागरण राजनीति से अधिक सांस्कृतिक साधना है। जहाँ शासन नीति का विस्तार है और नीति, आस्था का संवाहक। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि जो समाज अपनी विरासत पर विश्वास करता है, वही विकास के शिखर को छू सकता है। यह विश्वास अब जनमानस में प्रस्फुटित हो रहा है; मंदिरों की घंटियों में, शिलालेखों की पंक्तियों में, और युवाओं की चेतना में।
मध्य प्रदेश की सत्तरवीं वर्षगांठ इस आत्मविश्वास की घोषणा है कि यह राज्य केवल अतीत का साक्षी नहीं, भविष्य का निर्माता भी है। यहाँ की धरा फिर से अपनी जड़ों को पहचान रही है, और शासन ने उस पहचान को नवजागरण का रूप दे दिया है। यह सरकार केवल योजनाएँ नहीं बना रही, वह आत्मा में विश्वास जगा रही है।
विरासत पर विश्वास का वही संकल्प, जो किसी राज्य को प्रांत से प्रदेश, और प्रदेश को गौरव में रूपांतरित कर देता है।
अंत में...
कालजयी महानायक विक्रमादित्य के विराट स्वरूप को समझना हो तो मध्य प्रदेश सरकार के तीन दिवसीय राज्य उत्सव में ‘विक्रमादित्य महानाट्य’ देखा जा सकता है और निश्चय ही यह अनुभूति किसी गौरवगान से कम नहीं होगी। तब यह एहसास सहज ही हृदय में उतर आएगा कि हम उस धरा के वासी हैं, जहाँ विक्रमादित्य का शौर्य कण-कण में बसता है, और जहाँ विरासत पर विश्वास ही जीवन का उत्सव बन गया है।

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