मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति अब केवल जुमला बनकर रह गई है। विधानसभा के पटल पर रखे गए ताजा आंकड़े प्रदेश की प्रशासनिक ईमानदारी का वह काला चेहरा उजागर करते हैं, जो न केवल चुभने वाला है, बल्कि डरावना भी है। पढ़िए ‘स्टार समाचार’ की विशेष रिपोर्ट...।

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति अब केवल जुमला बनकर रह गई है।
अरविंद मिश्र
भोपाल। स्टार समाचार वेब
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति अब केवल जुमला बनकर रह गई है। विधानसभा के पटल पर रखे गए ताजा आंकड़े प्रदेश की प्रशासनिक ईमानदारी का वह काला चेहरा उजागर करते हैं, जो न केवल चुभने वाला है, बल्कि डरावना भी है। एक तरफ लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू की टीम नोटों की गड्डियों के साथ अफसरों को रंगे हाथ पकड़ रही हैं, तो दूसरी तरफ सजा की दर महज 1 प्रतिशत से भी नीचे सिमट गई है। आलम यह है कि रिश्वतखोरी अब किसी एक जेंडर तक सीमित नहीं रही। महिला अधिकारी भी इस ‘काली कमाई’ की रेस में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। न्याय की सुस्त रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक भ्रष्टाचारी को उसके अंजाम तक पहुंचाने में सिस्टम को औसतन 14 साल लग रहे हैं। हजारों मामले जांच और अभियोजन स्वीकृति की फाइलों के नीचे दबे पड़े हैं, जो साफ संकेत दे रहे हैं कि मध्य प्रदेश में ईमानदार व्यवस्था का संकल्प अब सिस्टम के ‘ब्लैक होल’ में समा चुका है। पढ़िए ‘स्टार समाचार’ की विशेष रिपोर्ट...।
करप्शन में टॉप संभाग-जिले
लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू के आंकड़ों में उज्जैन, जबलपुर, सागर, इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, और रीवा संभागों के जिलों में भ्रष्टाचार के सबसे अधिक मामले सामने आते हैं। वहीं छापों के लिए संवेदनशील जिलों में सतना, छतरपुर, दमोह, पन्ना, कटनी, नरसिंहपुर, बालाघाट, धार, नीमच, झाबुआ, बड़वानी, खंडवा, खरगोन, अलीराजपुर, सीधी, सिंगरोली, टीकमगढ़ जिले सबसे आगे हैं।
असली कहानी समय की
मध्यप्रदेश में फरवरी-2026 में विधानसभा सत्र के दौरान विधायक पंकज उपाध्याय और भंवर सिंह शेखावत के सवालों के लिखित जवाब में सरकारी कहा-वर्ष 2020 से 2025 के बीच ईओडब्ल्यू के 70 आपराधिक केसों में फैसला हुआ। इनमें 40 मामलों में सजा हुई। 30 में आरोपी बरी हो गए। यानी 57 प्रतिशत दोष सिद्धि दर रही। पहली नजर में यह आंकड़ा मजबूत लगता है, लेकिन यहां असली कहानी समय की है। इन 70 मामलों में औसतन फैसला आने में 13 साल और 7 महीने लगे।
तीन दशक में आया फैसला
मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार और घूसखोरी के कुछ केसों में तो न्याय आने में तीन दशक लग गए। 1990 का मामला 33 साल बाद निपटा। इसी तरह 1995 के एक मामले में फैसला 28 साल बाद आया। 1996 के मामले में 29 साल बाद और 1999 के मामले का 26 साल बाद फैसला आया।
2.8 फीसदी केसों में ही एफआईआर
शिकायतों के आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं। वर्ष 2020 से जनवरी 2026 तक ईओडब्ल्यू को कुल 19775 शिकायतें मिलीं। यानी हर साल औसतन तीन हजार से ज्यादा शिकायतें। सिर्फ जनवरी 2026 में 437 शिकायतें दर्ज हुईं। 20000 शिकायतों में से केवल 2624 यानी लगभग 14 प्रतिशत ही औपचारिक रूप से दर्ज की गईं, इनमें केवल 566 मामलों में ही अपराध पंजीबद्ध हुआ। यानी कुल शिकायतों के मात्र 2.8 प्रतिशत मामले में ही एफआईआर दर्ज की गई। 97 फीसदी शिकायतें एफआईआर तक नहीं पहुंचीं।
1063 दर्ज मामलों में से सिर्फ 7 में सजा
लोकायुक्त के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। वर्ष 2023 से 2026 तक लोकायुक्त को करीब 2000 शिकायतें मिलीं और 1063 आपराधिक केस दर्ज किए गए। 1592 जांच पूरी की गईं और इस समय करीब 1500 अधिकारी-कर्मचारी जांच के घेरे में हैं। लेकिन अब भी सैकड़ों मामले अभियोजन स्वीकृति का इंतजार कर रहे हैं। सिर्फ 39 मामलों में ही प्रारंभिक अभियोजन कार्रवाई ही शुरू हुई। 208 मामलों में चालान पेश हुए और दोषसिद्धि सिर्फ 7 मामलों में हुई। यानी 1063 दर्ज मामलों में 7 को सजा। लगभग 0.65 प्रतिशत दोषसिद्धि दर। सजा की दर लगभग 3 प्रतिशत है।
हर साल सामने आ रहे 200 घूसखोर
लोकायुक्त की कार्रवाई के अनुसार, महिला कर्मचारी मुख्य रूप से राजस्व (पटवारी), नगर निगम, और स्वास्थ्य विभागों में रिश्वत के मामलों में पकड़ी गई हैं। 2025 में, इंदौर लोकायुक्त ने भी बड़ी संख्या में भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई की, जिसमें पटवारी और क्लर्क शामिल थे। औसतन, मध्यप्रदेश में हर साल 200 से अधिक अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़े जाते हैं, जिनमें अब महिला कर्मचारियों की संलिप्तता के मामले भी सामने आ रहे हैं।
पहली पोस्टिंग में धरी गई सीएमओ मैडम

फरवरी-2026 में सीएमओ मैडम से बिल्कुल भी सब्र नहीं हुआ और पहली ही पोस्टिंग में 40 हजार लेते धरी गई हैं। प्रदेश में इस तरह का पहला मामला था। दरअसल, छतरपुर जिले के बक्सवाहा नगर परिषद में सीएमओ नेहा शर्मा और उपयंत्री शोभित मिश्रा को 40 हजार घूस लेते सागर ईओडब्ल्यू की टीम ने रंगे हाथों गिरफ्तार किया। पीएससी से चयनित नेहा शर्मा की यह पहली पोस्टिंग थी। सीएमओ नेहा शर्मा द्वारा आवासीय पट्टा और प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत करने के लिए रिश्वत मांगी थी।
मुरैना में 23 लाख का घोटाला
ईओडब्ल्यू ने मध्यप्रदेश के मुरैना स्थित बैंक आफ इंडिया की शाखा में 23 लाख के गबन के मामले में बड़ी कार्रवाई की है। जांच के बाद 8 बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज की गई है। 2013 से 2016 के बीच शाखा में पदस्थ रहे हेड कैशियर महेंद्र सिंह बाजौरिया सहित अन्य कर्मचारियों ने मिलकर ग्राहकों के खातों से अवैध रूप से रकम निकाली। आरोपियों में गौरीशंकर राम, ऋचि तिवारी, इंद्रनाथ विश्वास, विकास शर्मा, विकास त्रिवेदी, विजय कुमार मेहता और सौरभ मिश्रा के नाम शामिल हैं।
सिंगरौली डीईओ पर भ्रष्टाचार का केस

सिंगरौली शिक्षा विभाग में करोड़ों के घोटाले पर लोकायुक्त की बड़ी कार्रवाई की। डीईओ सूर्यभान सिंह, सहायक संचालक शिक्षा राजधर साकेत, जिला परियोजना समन्वयक रामलखन शुक्ल, सहायक परियोजना समन्वयक (वित्त) छविलाल सिंह सहित अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया है। स्वच्छता के नाम 97 लाख 67 हजार, वर्चुअल रियलिटी लैब की खरीदी में 4 करोड़ 68 लाख 16 हजार और स्कूलों में विद्युत व्यवस्था, मरम्मत सामग्री की खरीद पर 3 करोड़ 5 लाख कागजों में खर्च किए गए।
पीडब्ल्यूडी विभाग रडार पर
मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के केसों में लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) लोकायुक्त की रडार पर है। विभाग भ्रष्टाचार में टॉप विभागों की सूची में बरकरार है। विभाग के ईई, एसडीओ और उपयंत्री अक्सर ठेकेदारों से बिल पास करने के बदले में घूस लेते रंगे हाथों पकड़े जाते हैं। यही नहीं, निर्माण और सड़क परियोजनाओं में कमीशनखोरी हावी है। लोक निर्माण विभाग भी निर्माण ठेकों और टेंडर प्रक्रिया में घूसखोरी के कारण शीर्ष 10 में बना हुआ है।
हेल्थ सातवें पायदान पर
नेशनल क्राइम इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश के सबसे भ्रष्ट सरकारी विभागों में स्वास्थ्य विभाग सातवें स्थान पर रहा है। जबलपुर में 30 लाख के फर्जी बिल पास कराने का मामला सामने आया, जिसमें चाय-समोसे के नाम पर घोटाला किया गया। बालाघाट और देवास में एक ही डिग्री पर दो डॉक्टर 15 वर्षों से काम कर रहे थे। निरामयम योजना में अनियमितताओं और फर्जी क्लेम के कारण 126 अस्पतालों की मान्यता रद्द की गई, जिसमें सबसे ज्यादा अस्पताल भोपाल और इंदौर के थे। विभाग में कमीशनखोरी के चक्कर में हजारों की लागत के काम को लाखों में बताने की शिकायतें हैं आम हो गई हैं।
‘केबीसी’ वाली तहसीलदार अमिता सिंह तोमर गिरफ्तार

लोकप्रिय टीवी क्विज शो कौन बनेगा करोड़पति (केबीसी) में 50 लाख जीतने के बाद चर्चा में रहीं श्योपुर जिले के विजयपुर में पदस्थ तहसीलदार अमिता सिंह तोमर को बाढ़ पीड़ितों की राहत राशि में 2.5 करोड़ रुपए से अधिक के घोटाले में गिरफ्तार किया गया है। यही नहीं, मध्यप्रदेश के इतिहास में पहली बार एक ही जिले श्योपुर के 18 पटवारी भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किए जाएंगे। करोड़ों के घोटाले में 18 पटवारियों पर केस चलाने की मंजूरी सरकार ने दे दी है। यह सभी पटवारी भ्रष्टाचार में तहसीलदार अमिता सिंह के सहयोगी रहे हैं।
भ्रष्टाचार में मप्र छठवें स्थान पर
इंडिया करप्शन स्टडी की रिपोर्ट में मप्र को देश का छठवां सबसे भ्रष्ट राज्य बताया गया है। कुछ रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश देश के सबसे भ्रष्ट राज्यों में टॉप 3 या 6 में आता है। वहीं प्रदेश के 51 फीसदी लोगों का मानना है कि सूबे में भ्रष्टाचार दूर करने के लिए सरकार के प्रयास नाकाफी हैं, जबकि 27 फीसदी मानते हैं कि भ्रष्टाचार पहले से काफी कम हुआ है। वहीं 21 प्रतिशत मानते हैं कि भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं आई है।
हालिया प्रमुख मामले
अप्रैल-2026: महू जनपद पंचायत की उपयंत्री सावित्री मुवेल को 15 हजार रिश्वत लेते लोकायुक्त ने पकड़ा।
अप्रैल 2026: राजगढ़ जिले की सीएमएचओ शोभा पटेल को 20,000 रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया।
अप्रैल 2026: शहडोल जिले की एक महिला सब-इंजीनियर सुधा वर्मा को 10,000 रुपए की रिश्वत लेते पकड़ा गया।
मार्च 2026: राजधानी भोपाल में पीडब्ल्यूडी विभाग की महिला कर्मचारी को 6,000 रुपए की रिश्वत लेते पकड़ा गया।
फरवरी 2026: आगर मालवा जिले में एक महिला स्टेशन हाउस आॅफिसर मुन्नी परिहार को 29,000 की रिश्वत लेते पकड़ा गया।
मई 2025: भोपाल में एक महिला पटवारी सुप्रिया जैन को 10,000 रुपए लेते पकड़ा गया।
मई 2023: भोपाल में महिला सहायक इंजीनियर हेमा मीणा के परिसर में छापे के बाद 7 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति मिली।
शीर्ष सबसे भ्रष्ट विभाग
करप्शन के लिए चर्चित जिले
एमपी के चर्चित करप्शन के केस
लोकायुक्त का रुख जीरो टॉलरेंस का है...

लोकायुक्त का रुख जीरो टॉलरेंस का है, जिसमें भ्रष्ट लोक सेवकों के खिलाफ न केवल कार्रवाई की जा रही है, बल्कि सबूतों को मजबूत बनाकर उन्हें सजा दिलाने पर जोर दिया जा रहा है। लोकायुक्त की कार्रवाई में सजा का प्रतिशत कम नहीं है, बल्कि बहुत अच्छा है। हमारे पास जिस किसी की शिकायत आती है, उसे गंभीरता से लिया जाता है। शिकायत प्रमाणित होने के बाद ही एक्शन लिया जाता है।
योगेश देशमुख, महानिदेशक, लोकायुक्त, भोपाल

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति अब केवल जुमला बनकर रह गई है। विधानसभा के पटल पर रखे गए ताजा आंकड़े प्रदेश की प्रशासनिक ईमानदारी का वह काला चेहरा उजागर करते हैं, जो न केवल चुभने वाला है, बल्कि डरावना भी है। पढ़िए ‘स्टार समाचार’ की विशेष रिपोर्ट...।
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