मध्य प्रदेश की राजनीति में कुछ चेहरे अपनी विरासत से पहचाने जाते हैं, तो कुछ अपनी कार्यशैली से। लेकिन जब बात अजय सिंह 'राहुल' की आती है, तो ये दोनों खूबियां एक जादुई संतुलन में नजर आती हैं। विशेष बातचीत...

साक्षात्कार : कांग्रेस के कदावर नेता चुरहट विधायक अजय सिंह से बातचीत
मध्य प्रदेश की राजनीति में कुछ चेहरे अपनी विरासत से पहचाने जाते हैं, तो कुछ अपनी कार्यशैली से। लेकिन जब बात अजय सिंह 'राहुल' की आती है, तो ये दोनों खूबियां एक जादुई संतुलन में नजर आती हैं। प्रदेश के सबसे कद्दावर और "स्टाइलिश' राजनेताओं में शुमार अजय सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। एक गौरवशाली राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद उन्होंने अपनी राह खुद बनाई और सूबे की सियासत में अपना एक विशिष्ट मुकाम हासिल किया। प्रदेश सरकार के कद्दावर मंत्री से लेकर विधानसभा में "नेता प्रतिपक्ष' की चुनौतीपूर्ण भूमिका तक, उन्होंने हर जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। वर्तमान में अपनी पारंपरिक सीट चुरहट का प्रतिनिधित्व कर रहे अजय सिंह 'राहुल' से स्टार समाचार ने विशेष बात की।
सवाल: अजय सिंह "राहुल'भैया क्यों कहा जाता है?
जवाब: हमारे दादा को राहुल नाम पसंद था। वे राहुल बुलाते थे, जो स्कूल में नाम लिखा था वो अजय सिंह था। धीरे-धीरे चलन में राहुल ज्यादा होने लगा। अब वो राहुल भैया ज्यादा अजय सिंह बहुत कम हो गया। नजदीकी लोग छोटे भैया कह देते हैं, जो पारिवारिक हैं, क्योंकि मैं दो भाइयों में छोटा हूं।
सवाल: राजनीति में प्रवेश कैसे हुआ?
जवाब: 1977 में मैं एमए कर चुका था जब चुनाव हुआ था। उस चुनाव में पिताजी नेता प्रतिपक्ष थे। तो पहली बार चुरहट विधानसभा के कुछ हिस्से का काम देखा था। उस हिसाब से मेरी राजनीतिक सक्रियता की शुरूआत चुरहट से हुई, इसे प्रवेश भी कहा जा सकता है। फिर 1980 में मैं पिताजी का इलेक्शन एजेंट बना था।
सवाल: जब आपने पहला चुनाव लड़ा तब पिताजी गवर्नर बन बन चुके थे तो किस तरीके से आपने पूरा मैनेजमेंट किया?
जवाब: पिताजी, 45,000 वोट से चुनाव जीते। छठवें दिन पंजाब के राज्यपाल बन गए। 50वें दिन हमारे चुनाव की डेट थी। उनके राज्यपाल बनने के चार-पांच दिन में ही बाय इलेक्शन की घोषणा हो गई। पिताजी 45,000 वोट से जीते थे मैं 20,000 जीता। 25,000 वोट एक महीने में चले गए थे।
सवाल: पहले के मुख्यमंत्री अपने क्षेत्र पर फोकस ना करके पूरा प्रदेश को महत्व देते थे, लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं है?
जवाब: मेरा मानना है कि इस सोच के पीछे आत्मविश्वास की कमी है। पहले के सीएम के लिए पहले प्रदेश था। एक सभा मुझे याद है, चुरहट बस स्टैंड पर राजमाता सिंधियाजी ने ली थी और आरोप लगाया था कि आपका मुख्यमंत्री कैसा है कि अपने गांव का हाई स्कूल नहीं बनवाया तो उसके दो दिन बाद पिताजी का भाषण वहीं पर हुआ था। उन्होंने कहा था मैं अपने गांव का हाई स्कूल नहीं बनवाता हूं। मैं मध्य प्रदेश का हाई स्कूल देखता हूं।
सवाल: आपको लगातार साजिशों का सामना करना पड़ा, ऐसा क्यों?
जवाब: पता नहीं कुछ गृह खराब होंगे, कुछ तो बात है।
सवाल: 1993 के चुनाव में कांग्रेस की वापसी की उम्मीद थी?
जवाब: 1992 में पटवा सरकार गिरने के बाद कांग्रेस खेमे में भारी मायूसी थी। दिग्गज नेताओं की बैठक में सबको लग रहा था कि पटवाजी फिर वापसी करेंगे। उस बैठक में कम उम्र होने के बावजूद मैंने एक सुझाव दिया-'भाजपा के बड़े दिग्गजों को उन्हीं की सीटों पर घेरने के लिए मजबूत प्रत्याशी उतारे जाएं।' जब सवाल उठा कि पटवाजी के खिलाफ कौन लड़ेगा? तो मैंने जोश में कह दिया, 'अगर कोई नहीं लड़ेगा, तो मैं लड़ूँगा।' मेरा नाम दिल्ली गया, तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा रावजी ने मुझे बुलाकर पूछा- "क्यों लड़ना चाहते हो?' मेरा जवाब साफ था, 'घर बैठने से अच्छा है लड़ना, हार-जीत जो भी हो, उन्हें उनके क्षेत्र से बाहर नहीं निकलने दूँगा'।" भोजपुर सुंदरलाल पटवा की सुरक्षित सीट मानी जाती थी। उनका ट्रेंड था कि वे केवल तीन जगहों पर सभा करते और चुनाव जीत जाते थे। लेकिन मेरे चुनाव मैदान में उतरने के बाद उन्हें और उनके पूरे परिवार यहाँ तक कि अमेरिका से आए उनके भाई को पसीना आ गया। मैंने उन्हें एक-एक गाँव नापने पर मजबूर कर दिया। नतीजा यह हुआ कि पटवाजी भोजपुर में ऐसे फंसे कि वे बाहर प्रचार करने नहीं जा पाए। अगर वे मालवा या आसपास के क्षेत्रों में दो दिन भी दौरा कर लेते, तो कांग्रेस के कई विधायक चुनाव हार जाते। मैं चुनाव हार गया, लेकिन मेरी इस घेराबंदी की वजह से बगल की सीट से राजकुमार पटेल जीते और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी।
सवाल: आज भी कांग्रेस को यही रणनीति अपनाने की जरूरत है?
जवाब: मेरा मानना है कि जो सीटें हम लगातार हार रहे हैं, वहां चुनाव से 15 दिन पहले नहीं, बल्कि 3 साल पहले प्रत्याशी तय कर देना चाहिए। किसी ऊजार्वान युवा को जिम्मेदारी दें कि 'तुम्हें यहीं लड़ना और मरना है।' आज की तारीख में कांग्रेस यह नहीं कर सकती। आज 230 में से कम से कम 100 सीटों पर नाम अभी से तय हो जाने चाहिए, तभी हम मजबूती से वापसी कर पाएंगे।"
सवाल: आप पटवाजी के खिलाफ चुनाव लड़े उसका आपको क्या इनाम मिला?
जवाब: पार्टी ने हमें इनाम तो छोड़ दीजिए, पूछा तक नहीं। दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने थे। मुझ से पूछा तक नहीं कि तुम क्या करना चाहते हो? तुम कौन सा पद लेना चाहते हो? इतने चेयरमैन बने, मुझे भी बना सकते थे?
सवाल: आप ग्रामीण विकास मंत्री, पर्यटन और संस्कृति मंत्री रहे। आपकी क्या उपलब्धियां रहीं?
जवाब: देश में "प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना' की शुरूआत हुई। मप्र में शुरूआती दौर में यह काम पीडब्ल्यूडी को दिया जा रहा था, लेकिन हमने मजबूती से पक्ष रखा कि यह पंचायतों का पैसा है, इसलिए इसे पंचायत विभाग को ही मिलना चाहिए। यह जिम्मेदारी हमारे विभाग के पास आई। आज दो दशक बाद भी, यदि आप ग्रामीण क्षेत्रों में जाएंगे, तो लोग मानेंगे कि उस शुरूआती दौर में बनी सड़कें आज भी सबसे अधिक मजबूत हैं। यह सफलता किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक बेहतरीन टीम की थी। मैंने चुन-चुनकर सक्षम अधिकारियों को अपने साथ जोड़ा था। हमारी इस टीम ने महज 3 साल के भीतर प्रदेश की हर विधानसभा में सड़कों का जो बुनियादी ढांचा तैयार किया, वह मेरे कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
सवाल: दिल्ली में भाजपा की केन्द्र सरकार में आपका महत्व आपके पिताजी की वजह से था?
जवाब: अक्सर लोग सोचते हैं कि दिल्ली में मेरे काम पिताजी की वजह से होते थे, लेकिन असलियत इससे बिल्कुल अलग थी। दिल्ली के गलियारों में मेरी अपनी पहचान और पुराने संबंध थे। मैं छात्र राजनीति के समय से ही संजय गांधी और जगमोहन जी के साथ रहा। इतना ही नहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली और विजय गोयल दिल्ली के श्रीराम कॉलेज आॅफ कॉमर्स में मेरे सहपाठी थे। इन पुरानी दोस्ती और संपर्कों की वजह से अटल जी और वेंकैया नायडू जी जैसे दिग्गजों से मेरा सीधा संवाद था। मुझे अपने विभाग के काम कराने के लिए किसी सिफारिश की जरूरत नहीं पड़ती थी। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जब 'प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना' के लिए हर राज्य को औसतन 300 करोड़ रुपये मिले थे, लेकिन मैं मध्यप्रदेश के लिए 800 करोड़ रुपये का फंड लेकर आया था, जो एक रिकॉर्ड था। उस दौर में मेरे और भाजपा नेताओं के बीच नजदीकी की इतनी चर्चा थी कि अफवाह उड़ गई कि मैं भाजपा में जा रहा हूँ। तब खुद केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने वल्लभ भवन में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्पष्ट किया था कि-"अजय सिंह मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं, लेकिन वे भाजपा में नहीं आ रहे।' यह मेरे व्यक्तिगत रसूख और काम करने के तरीके का ही परिणाम था।
सवाल: आपकी भाजपा के केन्द्रीय नेताओं से किस बात पर शर्त लगी थी?
जवाब: साल 2003 के विस चुनाव से ठीक पहले दिल्ली में मेरी मुलाकात अरुण जेटली और वेंकैया नायडू से हुई। जेटलीजी मप्र के चुनाव प्रभारी थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- "अजय, तुम्हारी सरकार जा रही है।' मुझे अपने काम पर भरोसा था, मैंने पलटकर कहा- "सवाल ही नहीं उठता, हम जीतेंगे।' वहीं एक "दोस्ताना शर्त' लग गई। वेंकैया जी ने कहा कि जो भी जीते या हारे, दिल्ली में मेरे घर पर "डोसा पार्टी' होगी। चुनाव हुए, हम हार गए। मैं कुछ महीनों तक दिल्ली नहीं गया। जब मैं दिल्ली गया, तो शाम 4 बजे वेंकैया जी के घर डोसा पार्टी पर पहुँचा। मुझे इल्म नहीं था कि उसी दोपहर लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई है और वेंकैया जी उस समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। जब मैं उनके घर में घुसा, तो गेट पर कैमरों और पत्रकारों का जमावड़ा था। मुझे लगा शायद अध्यक्ष का घर है इसलिए भीड़ होगी। हम अंदर बैठकर बात कर ही रहे थे कि तभी हलचल हुई और पता चला कि लालकृष्ण आडवाणी खुद वेंकैया को लेने आए हैं। वे लोग निकले और घर में सन्नाटा छा गया। मैं जब बाहर निकलने लगा, तो वहां मौजूद प्रदेश के एक पत्रकार ने मुझे पहचान लिया। उस दौर में लक्ष्मण सिंह समेत कई बड़े नेता भाजपा में जा रहे थे। बस फिर क्या था! टीवी चैनलों पर "ब्रेकिंग न्यूज' की पट्टी चल गई कि अगला नंबर अजय सिंह का है और वे भाजपा में शामिल होने वाले हैं। उस एक मुलाकात ने पूरे प्रदेश की सियासत में भूचाल ला दिया। बाद में मुझे प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सफाई देनी पड़ी थी। आज देखता हूँ तो हंसी आती है- जो लोग उस वक्त शोर मचा रहे थे कि मैं भाजपा में जा रहा हूँ, आज उनमें से अधिकांश खुद पाला बदलकर उधर चले गए हैं। मैं कांग्रेस में था आज भी वहीं अडिग खड़ा हूँ।
सवाल: जब आपने इतना अच्छा काम किया तो 2003 में कांग्रेस की हार की क्या वजह थी?
जवाब: 2003 में कांग्रेस की हार की तीन प्रमुख वजहें थीं। पहली और दूसरी- बिजली और सड़क की बदहाली। जनता के भीतर इसे लेकर गहरा आक्रोश था। लेकिन सबसे घातक थी तीसरी वजह- हमारे कुछ वरिष्ठ नेताओं का अहंकार। वे खुलेआम कहते थे कि हमें जनता की जरूरत नहीं, हम "मैनेजमेंट' से चुनाव जीत लेंगे। इस सोच ने हमें 36 सीटों पर लाकर खड़ा कर दिया।
सवाल: 2008 का चुनाव कांग्रेस क्यों हार गई?
जवाब: वापसी के लिए 2008 का समय सबसे अनुकूल था, लेकिन कुछ नेताओं ने अपनी महत्वाकांक्षा में टिकटों का सौदा कर दिया। मप्र में जो पहली लिस्ट 110 नामों की आई थी, वह निष्पक्ष थी और उसमें से 55 लोग जीते। लेकिन बाद की 120 सीटों पर अपनों को उपकृत करने और विरोधियों को काटने का खेल हुआ, जिसमें से मात्र सात प्रत्याशी जीत सके।
सवाल: 2018 वाली सफलता 2023 में क्यों नहीं दोहराई जा सकी?
जवाब: 2023 के चुनाव परिणाम मेरे लिए आज भी एक न सुलझने वाली पहेली हैं। चुनाव से पहले का माहौल पूरी तरह कांग्रेस के पक्ष में दिख रहा था। न केवल पूरा मीडिया जगत यह कह रहा था कि कांग्रेस की सरकार बन रही है, बल्कि सड़क पर चलता आम आदमी भी बदलाव की बात कर रहा था। जनता के बीच कांग्रेस को लेकर जो उत्साह था, वह नतीजों में तब्दील क्यों नहीं हुआ, यह समझ से परे है।
सवाल: "विंध्य की राजनीति हमेशा से "ब्राह्मण बनाम ठाकुर' के जातीय समीकरणों में उलझी रही है। विकास और मुद्दों के इस दौर में भी क्या आपको लगता है कि इस जातिगत वर्चस्व की जंग का अंत होगा?
जवाब: यह कहना पूरी तरह गलत है कि विंध्य की राजनीति सिर्फ ठाकुर-ब्राह्मण के समीकरणों में उलझी हुई है। विंध्य को इस मामले में बेवजह बदनाम किया गया है। सच तो यह है कि जातीय प्रतिस्पर्धा केवल कुछ खास पॉकेट्स में हो सकती है, जो ग्वालियर-चंबल समेत प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी है, लेकिन केवल विंध्य का नाम उछाला जाता है। अगर वहां जातीय कटुता इतनी ही गहरी होती, तो मैं कभी चुरहट से विधायक नहीं बन पाता। भोपाल में बैठकर लोग सोचते हैं कि चुरहट ठाकुर बाहुल्य क्षेत्र है, लेकिन हकीकत यह है कि वहां महज 12,000 ठाकुर मतदाता हैं, जबकि ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या 52,000 से अधिक है। मैं तो हमेशा से ही ब्राह्मण समाज और अन्य वर्गों के आशीर्वाद से चुनाव जीतता आया हूँ।
सवाल: अगर चुरहट में जातीय समीकरण आपके पक्ष में रहते हैं और आपका वहां इतना मजबूत आधार है, तो फिर 2018 में आप चुनाव क्यों हार गए जब पूरे प्रदेश में कांग्रेस की लहर थी?
जवाब: 2018 में मेरी हार किसी सियासी लहर की वजह से नहीं, बल्कि मेरी अपनी गलती और अति-आत्मविश्वास के कारण हुई। उस समय कमलनाथ जी ने मुझसे कहा था कि वे प्रदेश की राजनीति से पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं, इसलिए मुझे पूरे समय उनके साथ रहना होगा। नामांकन भरने के बाद मैंने अपने क्षेत्र के करीब 7 हजार कार्यकतार्ओं से पूछा कि "आप मुझे विधायक बनाना चाहते हैं या प्रदेश में सरकार?' सबने एक स्वर में कहा कि आप सरकार बनवाइए, यहां आपको कौन हराएगा? कार्यकतार्ओं के इसी भरोसे पर मैं पूरे चुनाव क्षेत्र से गायब रहा और सीधे वोटिंग से एक दिन पहले पहुँचा। मेरा परिवार भी राजनीति में सक्रिय नहीं है कि मेरी अनुपस्थिति को संभाल पाता। अगर मैं चुनाव के आखिरी 5 दिन भी अपने क्षेत्र को दे देता, तो वह 4-5 हजार वोटों का अंतर कभी नहीं आता। मैं चुनाव हार गया, लेकिन प्रदेश में सरकार बनाने का लक्ष्य पूरा हुआ।
सवाल: आपका राजनीतिक अनुभव क्या कहता है? चुनाव जीता कैसे जाता है?
जवाब: मेरा अनुभव कहता है कि चुनाव केवल सड़क, स्कूल या बांध बनवा देने से नहीं जीते जाते। विकास जरूरी है, लेकिन मतदाता यह देखता है कि आप उसके सुख-दु:ख में कितने साझीदार हैं। चुनाव एक "मल्टी-फैक्टर' खेल है, जिसमें व्यक्तिगत संबंध और सहानुभूति सबसे ऊपर होती है। जनता को यह भरोसा होना चाहिए कि मुश्किल घड़ी में "भैया' साथ खड़े होंगे। मैं राजनीति में किसी को तंग करने की विचारधारा पर यकीन नहीं रखता। अपने राजनीतिक सफर में मैंने 23-24 चुनाव लड़े और लड़वाए हैं- जिनमें 9 विधानसभा, 2 लोकसभा और कई उपचुनावों का अनुभव शामिल है। हर क्षेत्र का अपना अलग मिजाज होता है, लेकिन एक बात हर जगह समान है, जनता का जुड़ाव नेता की संवेदनशीलता से होता है, केवल सीमेंट-कंक्रीट के विकास से नहीं। मैं जल्द ही चुनावी अनुभवों पर किताब भी ला रहा हूँ। मैं किसी को तंग नहीं करता।
सवाल: तंग का मतलब क्या है?
जवाब: राजनीति में डराने, धमकाने या बिजली कटवाने जैसी नकारात्मक हरकतें लंबे समय तक नहीं चलतीं। 2018 में जब मैं चुनाव हारा, तो क्षेत्र की जनता ने 5 साल तक उस नकारात्मकता को झेला और महसूस किया। नतीजा यह हुआ कि 2023 में जनता ने खुद कमान संभाल ली। उन्होंने मुझसे कहा- "भैया, आप कुछ मत करो, हम खुद आपको जिताएंगे।' जनता के इसी अहसास और समर्थन ने मुझे करीब 30,000 वोटों के बड़े अंतर से जीत दिलाई।
सवाल: आज की पीढ़ी के मतदाता की अपेक्षाओं में क्या अंतर है?
जवाब: समय के साथ मतदाताओं की अपेक्षाएं पूरी तरह बदली है। 80 के दशक में लोग सड़क, पुल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं की बात करते थे। आज मतदाता की अपेक्षाएं व्यक्तिगत हो गई हैं। अब लोग अपने परिवार के भविष्य-जैसे बच्चों की अच्छी शिक्षा, बेहतर इलाज और युवाओं के लिए रोजगार की सीधी मदद चाहते हैं। मैं प्रचार से दूर रहकर व्यक्तिगत स्तर पर इन जरूरतों को पूरा करने पर ध्यान देता हूँ। आज भी भोपाल के अस्पतालों में हर रोज औसतन 20 बेड मेरे क्षेत्र के मरीजों के लिए आरक्षित रहते हैं। चाहे इलाज हो, स्कूल-कॉलेज में एडमिशन हो या प्राइवेट सेक्टर में नौकरी दिलवाना-राजनीति अब केवल भाषण देने तक सीमित नहीं रही, यह लोगों के निजी मुश्किलों को हल करने का जरिया बन गई है।
सवाल: राजनीति में "रेवड़ी संस्कृति' का बोलबाला बढ़ गया है?
जवाब: आज रेवड़ी संस्कृति के नाम पर जो हो रहा है, वह अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करने जैसा है। लोकतंत्र में जनहित का अर्थ यह कतई नहीं है कि आप सरकारी खजाने को दांव पर लगाकर वोट खरीदें। यह सीधे तौर पर वोट की "खरीद-फरोख्त' है। अगर टीएन शेषन जैसा दौर होता, तो चुनाव आयोग कभी भी इसकी अनुमति नहीं देता। यह स्पष्ट रूप से वोट खरीदने का प्रयास है, जो भविष्य में हमारी पूरी इकॉनमी को गर्त में ले जाएगा।
सवाल: आप बिल्कुल बेबाकी से बात करते हैं, इसका नुकसान नहीं होगा?
जवाब: होगा, लेकिन सही चीज कहने में क्या दिक्कत है? भाई मैं कोई अपने पेट के लिए तो राजनीति में नहीं हूं। मुझे जो सही लगता है कह देता हूं। किसी को अच्छा लगे न लगे।
सवाल: एक बात जो बार-बार विपक्ष उठाता है, आपको लगता है ईवीएम में कुछ है?
जवाब: मैं मानता हूं ईवीएम से खेला होता है।
सवाल: यदि 2028 का चुनाव में आप कांग्रेस को कहां पर देख रहे हैं?
जवाब: पहले मैक्रो देखिए। परसेंटेज ऑफ वोट कांग्रेस और बीजेपी में बहुत कम अंतर है। 40 में दोनों का है। तीन-चार फीसदी आगे पीछे हो जाता है। उसको ब्रेक डाउन करिए कि कहां पर आप प्लस है, कहां पर माइनस है। फोकस करिए जहां आपको कुछ फायदा होने वाला है और लेस कंसंट्रेट करिए, जहां पर आप न उम्मीद हैं वहां पूरी दम लगाइए कम से कम लड़ाई ठीक-ठाक हो। इस तरह से आप अपने रिसोर्सेज स्प्रेड आउट करेंगे। अगला चुनाव बूथ पर होगा। यदि आपके बूथ लेवल में वर्कर सही है, कमेटियां अच्छी हैं, मजबूत हैं, इन ट्यून विद द कैंडिडेट हैं तो उसका असर पड़ेगा।
सवाल: जैसा आप बता रहे हैं कि एक अच्छी माइक्रो लेवल की प्लानिंग करनी पड़ेगी। 2028 की एक इलेक्शन टीम कांग्रेस की हो तो आप किन-किन लोगों को उसमें शामिल देखना चाहेंगे?
जवाब: हर संभाग में एक-दो लोग हैं। जो अपना असर रखते हैं। भूरिया जी हुए, अरुण यादव जी हुए, जीतू पटवारी जी हुए। जो हर संभाग के एक कोहेसिव टीम बनके अपने-अपने एरिया में काम करें, तो उसका फायदा होगा। यह सोचना किसी वन पर्सन के भरोसे पूरा प्रदेश जीत लेंगे तो गलत होगा।
सवाल: जैसी आपकी अरुण यादव के बीच इक्वेशन दिखती है, क्या उमंग सिंघार और जीतू पटवारी के बीच है?
जवाब: मुझसे उम्र में बहुत कम है। मैं ज्यादा उनके नजदीक नहीं हूं। तो मुझे नहीं मालूम कि इनकी ट्यूनिंग है कि नहीं है। आप लोगों के माध्यम से पता चलता है किसकी ट्यूनिंग है, नहीं है। वैसे ट्यूनिंग रहनी चाहिए
सवाल: 2028 के चुनाव में कमलनाथ दिग्विजय सिंह की कितनी मौजूदगी फायदा देगी? क्या उनका रोल होगा?
जवाब: पार्टी तय करेगी, देखिए हर आदमी कुछ ना कुछ अपना योगदान दे सकता है। कमलनाथ जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है पर वे अपना योगदान दे सकते हैं। दिग्विजय सिंह तो पूरे प्रांत में अनेक बार घूम चुके हैं तो उनका अनुभव अपनी जगह पर है।
सवाल: कई युवा नेताओं को राजनीति का ककहरा सिखाया। वो नेता बने फिर छोड़ के दूसरे खेमे में क्यों चले गए?
जवाब: ऐसा नहीं है इक्का-दुक्का गए होंगे। दो-तीन नाम हैं जो महत्वाकांक्षी हैं। अपनी लकीर ज्यादा लंबी करना चाहते हैं वे चले गए हैं। लेकिन इससे मुझे क्या फर्क पड़ा?
सवाल : आप अलग से प्रदेश का दौरा कर रहे हैं?
जवाब: मैं व्यक्तिगत तौर से पूरे प्रदेश का दौड़ा कर रहा हूं। पार्टी ने मुझे नहीं कहा। मैं अपने हिसाब से ग्वालियर चंबल, बुंदेलखंड, शहडोल संभाग जा चुका हूं। अगले हफ्ते महाकौशल जाऊंगा। जून के अंत तक कोशिश है पूरे प्रांत में जितने जिले बचे हैं वे पूरे कर लूं। जो बुजुर्ग हैं, जो पुराने हैं, जो घर बैठे हैं, उनसे संपर्क कर रहा हूं। कोई आम सभा नहीं कर रहा हूं।
सवाल: पार्टी की तरफ से कोई आपत्ति?
जवाब: अभी तक तो कोई आॅब्जेक्शन आया नहीं। मैं रैली तो कर नहीं रहा हूं। मैं तो सिर्फ जिलों में जाकर जो प्रमुख लोग हैं चाहे जिस खेमे के हों उनसे संपर्क कर रहा हूं। उनके चाहे घर जाके चाय पीता हूं।
सवाल: मोहन यादव सरकार पर आप क्या कहेंगे ?
जवाब: मोहन यादव इतना अच्छा काम कर रहें है उनको 2028 तक रहना चाहिए।
सवाल: आपकी महत्वाकांक्षा क्या है?
जवाब: केवल एक महत्वाकांक्षा 2028 में प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनाना चाहिए। यह मेरा संकल्प भी है।
सवाल: आपको गाड़ी चलाने का बहुत शौक है?
जवाब: नहीं मैं रोज गाड़ी नहीं चलाता हूं। वैसे हमारे बुजुर्ग कहते थे कि जब तक घोड़सवारी करोगे तब तक ठीक-ठाक रहोगे। अब घोड़ा तो नहीं है, गाड़ी है।
सवाल: क्या राजनीति में से कुछ समय फ्री निकल पाते हैं?
जवाब: हां, मैं संडे को बिल्कुल फ्री रहता हूं। सुकून से परिवार के साथ जो भी परिवार के सदस्य हैं यहां रह उनके साथ चाय गपशप और मुझे जंगल घूमने का बड़ा शौक है। तो जब भी मौका मिलता है तो चला जाता हूं। किताब पढ़ने का भी शौक है।
सवाल: क्या फिल्म देखने का शौक है?
जवाब: हां, पुरानी फिल्में अच्छी लगती हैं। अंग्रेजी फिल्में देखता हूं।
सवाल: क्या फिल्मे नैरेटिव सेट करती हैं? धुरंधर आई, केरला फाइल्स आई, फिर कश्मीर फाइल्स आई। आपका क्या ऑब्जर्व है?
जवाब: ये तो सब पॉलीटिक्ली स्पोंसर्ड मूवीज हैं। इसमें क्या है? सेटअप क्या है? अब यदि एक कोई पार्टी इस तरह की मूवी बनवा रही है तो फिर अब आप सोचिए क्या हो रहा है। मैं तो ऐसी फिल्में देखता ही नहीं।
राहुल भैया की नजर
राहुल गांधी: नेक इंसान है।
प्रियंका गांधी: राजनीतिक सूझबूझ वाली नेता हैं।
नरेंद्र मोदी : बहुत कलाकार हैं।
कमलनाथ : उद्योग लगाने के लिए उनसे बेहतर आदमी कोई नहीं। दिग्विजय सिंह : सोशल इंजीनियरिंग के महारथी।
उमा भारती : तेज तर्राट और कब बदल जाए कहा नहीं जा सकता।
डॉ. मोहन यादव : जमीनी पकड़ वाले जमीनी आदमी हैं।
मध्य प्रदेश की राजनीति में कुछ चेहरे अपनी विरासत से पहचाने जाते हैं, तो कुछ अपनी कार्यशैली से। लेकिन जब बात अजय सिंह 'राहुल' की आती है, तो ये दोनों खूबियां एक जादुई संतुलन में नजर आती हैं। विशेष बातचीत...
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति अब केवल जुमला बनकर रह गई है। विधानसभा के पटल पर रखे गए ताजा आंकड़े प्रदेश की प्रशासनिक ईमानदारी का वह काला चेहरा उजागर करते हैं, जो न केवल चुभने वाला है, बल्कि डरावना भी है। पढ़िए ‘स्टार समाचार’ की विशेष रिपोर्ट...।
कभी बागी और बंदूकों के लिए कुख्यात चंबल का बीहड़ आज एक नए और अधिक खूंखार 'रेत माफिया' की गिरफ्त में है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य की कोख उजाड़कर फल-फूल रहा यह अवैध धंधा अब महज चोरी नहीं, बल्कि एक संगठित खूनी खेल बन चुका है।
साक्षात्कार ... राजनीति अक्सर उन रास्तों से होकर गुजरती है जिसकी कल्पना व्यक्ति ने स्वयं नहीं की होती। कुछ ऐसा ही सफर पृथ्वीपुर विधायक नितेंद्र सिंह राठौर का रहा।
हर रविवार सियासी, नौकरीशाह की अंदर की खबरों का कॉलम
प्रशानिक, राजनीतिक अंदर खबर की खबर उजागर करने वाला कॉलम
बुंदेलखंड के एक छोटे से गांव से लेकर दिल्ली और फिर मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत मध्यप्रदेश विधानसभा में 10 वर्ष तक प्रमुख सचिव रहे अवधेश प्रताप सिंह की जीवन यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है।
मध्यप्रदेश में 2023 में 230 निर्वाचित विधायकों में से 90 के खिलाफ आपराधिक केस चल रहे हैं। इसमें 34 विधायक गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं, जो 230 सदस्यीय सदन का लगभग 39 प्रतिशत है
मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण-पत्र का विवाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में गरमाया हुआ है, जिसमें कई वर्तमान-पूर्व सांसद, विधायक और आईएएस-आईपीएस अफसर कानूनी शिकंजे में फंसे नजर आ रहे हैं।
काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) विश्वभूषण मिश्र ने एक ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो अब मध्यप्रदेश के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर और 2028 के सिंहस्थ महाकुंभ के लिए भी मार्गदर्शक बनने जा रहा है।

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