बुंदेलखंड के एक छोटे से गांव से लेकर दिल्ली और फिर मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत मध्यप्रदेश विधानसभा में 10 वर्ष तक प्रमुख सचिव रहे अवधेश प्रताप सिंह की जीवन यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है।

मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष अवधेश प्रताप सिंह बातचीत
भोपाल. स्टार समाचार वेब
बुंदेलखंड के एक छोटे से गांव से लेकर दिल्ली और फिर मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत मध्यप्रदेश विधानसभा में 10 वर्ष तक प्रमुख सचिव रहे अवधेश प्रताप सिंह की जीवन यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है। वर्तमान में भी मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष के पद पर हैं। स्टार समाचार से विशेष बातचीत के अंश-
सवाल: अपने जीवन के शुरुआती संघर्ष और इस सफर के बारे में विस्तार से बताइए?
जवाब: मेरा जन्म बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले के एक छोटे से गांव में हुआ, जहां संसाधनों की कमी और सामंती सोच का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता था। परिवार सामान्य था, लेकिन विचार असाधारण थे। मेरे दादाजी स्वतंत्रता सेनानी रहे और पिताजी समाजवादी सोच के थे। उन्होंने गांव में जनजागरण अभियान चलाया, लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया और समानता का संदेश दिया। इन प्रयासों के कारण उन्हें कई बार विरोध और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। हमारी फसल तक जला दी गई, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। इन्हीं संघर्षों ने मुझे बचपन से यह सिखाया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आपके भीतर आत्मविश्वास और संघर्ष की भावना है तो आप आगे बढ़ सकते हैं। मेरी पढ़ाई भी आसान नहीं थी। आठवीं के बाद आगे पढ़ाई का कोई साधन नहीं था। तभी एक छात्रवृत्ति योजना के बारे में पता चला। मैंने गर्मियों की छुट्टियों में खेलना छोड़कर पढ़ाई की और उस परीक्षा में चयनित हो गया। इससे मुझे अच्छे स्कूल में पढ़ने, हॉस्टल में रहने और वजीफा मिलने का अवसर मिला। यही मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
सवाल: आपके जीवन का टर्निंग पॉइंट क्या था?
जवाब :एक दिन गांव की चौपाल पर चर्चा के दौरान मेरे पिताजी ने कहा कि यहां तो सबकी जगह तय है, अगर कुछ करना है तो राष्ट्रीय स्तर पर करो, भले ही शुरुआत कुली बनने से ही क्यों न करनी पड़े। यह प्रसंग मेरे जीवन का एक निर्णायक मोड़ था। यह बात सुनने में साधारण लग सकती है, लेकिन मेरे मन-मस्तिष्क पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। इसका अर्थ यह नहीं था कि वास्तव में कुली बनना है, बल्कि यह था कि किसी भी काम को छोटा न समझो और बड़े लक्ष्य के लिए छोटे से छोटा काम करने को भी तैयार रहो। यही सोच मुझे गांव की सीमाओं से बाहर निकलकर दिल्ली तक ले गई। मैंने तय कर लिया कि मुझे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनानी है। यही सोच आगे चलकर मेरे निर्णयों की दिशा तय करती रही,चाहे वह पढ़ाई हो, प्रतियोगी परीक्षाएं हों या फिर प्रशासनिक सेवाओं में काम करना।
सवाल: छात्र जीवन पढ़ाई करते हुए छात्र राजनीति में कैसे आ गए?
जवाब: वास्तव में मेरी रुचि शुरुआत में छात्र राजनीति में नहीं थी। मैं पूरी तरह पढ़ाई पर केंद्रित था। लेकिन विश्वविद्यालय में मेरे साथियों और शिक्षकों ने मुझे चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने मुझमें नेतृत्व क्षमता देखी और कहा कि मुझे आगे आना चाहिए। जब मैंने चुनाव लड़ने का निर्णय लिया, तो यह मेरे लिए एक नई चुनौती थी। उस समय छात्र संघ के चुनाव काफी प्रतिस्पर्धी और कभी-कभी तनावपूर्ण भी होते थे। कई तरह के राजनीतिक दबाव भी आते थे और संसाधनों और समर्थन के प्रस्ताव भी दिए गए। लेकिन मैंने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। इस अनुभव ने मुझे आत्मविश्वास दिया, निर्णय लेने की क्षमता विकसित की और यह सिखाया कि नेतृत्व केवल पद प्राप्त करना नहीं, बल्कि लोगों का विश्वास जीतना होता है। यह अनुभव मेरे आगे के प्रशासनिक जीवन में बहुत उपयोगी साबित हुआ। मेरे शपथ समारोह में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह भी आए थे।
सवाल : आपने अपना नाम क्यों बदला था?
जवाब: मेरा मूल नाम “राजा सिंह” था। उस समय गांवों में नाम भी सामाजिक स्थिति और सामंती मानसिकता को दर्शाते थे। मेरे पिताजी समाज में समानता का संदेश देना चाहते थे और सामंती सोच के खिलाफ एक प्रतीकात्मक कदम उठाना चाहते थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने मेरा नाम बदलकर “अवधेश प्रताप सिंह” रखा। पहले “राजा अवधेश प्रताप सिंह” रखा गया, लेकिन बाद में इसे संक्षिप्त कर दिया गया। यह केवल नाम परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक विचारधारा का प्रतीक था कि यह संदेश कि समाज में सभी बराबर हैं और कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान खुद बना सकता है। इस बदलाव ने मेरे भीतर भी एक आत्मविश्वास पैदा किया कि व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से बनती है, न कि उसके नाम या पृष्ठभूमि से।
सवाल: आपके कार्यकाल में कौन से नवाचार हुए और कौन सी योजनाएं अधूरी रह गईं?
जवाब: हमने कई सुधारात्मक प्रयास किए, लेकिन “पेपरलेस असेंबली” का सपना पूरी तरह साकार नहीं हो सका। यदि यह लागू हो जाता, तो कार्यप्रणाली अधिक आधुनिक, पारदर्शी और प्रभावी हो सकती थी। इसी तरह विधानसभा की कार्यवाही के लाइव प्रसारण का विचार भी था, लेकिन इसके लिए सभी दलों की सहमति आवश्यक होती है, जो उस समय नहीं बन पाई।
सवाल: दिल्ली जाने के बाद दिल्ली स्कूल आफ इकानामिक्स से इकानामिक्स की पढ़ाई छोड़ कर एलएलबी का विचार कैसे आया?
जवाब: दिल्ली पहुँचने का अनुभव मेरे जीवन का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ, जहाँ बिना किसी स्पष्ट मार्गदर्शन के मैंने परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लिए। संसाधनों की कमी के कारण एलएलबी में प्रवेश लेना, मुख्य रूप से हॉस्टल सुविधा पाने का एक जरिया था, लेकिन यही शिक्षा आगे चलकर मेरे प्रशासनिक और संसदीय कार्यों का मजबूत आधार बनी। इसी दौरान प्रोफेसर मलिक साहब का अमूल्य मार्गदर्शन मिला; उनके प्रोत्साहन पर ही मैंने अपनी प्राथमिक पसंद न होने के बावजूद पार्लियामेंट सर्विस का फॉर्म भरा। उनका विश्वास सही साबित हुआ और मेरा चयन हो गया, जिसने मुझे राष्ट्रीय स्तर पर सेवा करने का एक प्रतिष्ठित अवसर प्रदान किया।
सवाल: वर्तमान में मानव अधिकार आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में आपकी प्राथमिकताएं और चुनौतियां क्या हैं?
जवाब- मानव अधिकार आयोग का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन न हो। हमने देखा है कि आयोग की अधिकांश सिफारिशों को स्वीकार किया जाता है, लेकिन जानकारी समय पर नहीं मिल पाने की समस्या बनी रहती है। इसे सुधारने के लिए हमने जिलों में जनसुनवाई शुरू की है। आजकल शिकायतों का स्वरूप भी बदल रहा है। पारिवारिक विवाद, पेंशन, भुगतान जैसी समस्याएं अधिक सामने आ रही हैं। वहीं कस्टोडियल डेथ जैसे मामलों को हम अत्यंत गंभीरता से लेते हैं। मेरा मानना है कि मानव अधिकारों का संरक्षण केवल आयोग का नहीं, बल्कि शासन और समाज का संयुक्त दायित्व है।
सवाल: आयोग के पास आने वाली शिकायतों का स्वरूप कैसा है?
जवाब: शिकायतें काफी संख्या में आती हैं। इनमें पारिवारिक विवाद, पेंशन, भुगतान और कस्टोडियल डेथ जैसी गंभीर शिकायतें शामिल होती हैं।
सवाल: अंत में, ग्रामीण युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?
जवाब: मैं यही कहना चाहूंगा कि किसी भी व्यक्ति की पृष्ठभूमि उसकी सीमा नहीं होती। यदि आपके पास स्पष्ट लक्ष्य, दृढ़ संकल्प और मेहनत करने की इच्छा है, तो आप किसी भी ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं। मेरे जीवन में “कुली वाला प्रसंग” और “नाम परिवर्तन” जैसे छोटे-छोटे लेकिन गहरे संदेश देने वाले अनुभव ही मेरी सोच को दिशा देते रहे। ग्रामीण युवाओं में अपार क्षमता है—जरूरत है आत्मविश्वास, सही दिशा और निरंतर प्रयास की।
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