कभी बागी और बंदूकों के लिए कुख्यात चंबल का बीहड़ आज एक नए और अधिक खूंखार 'रेत माफिया' की गिरफ्त में है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य की कोख उजाड़कर फल-फूल रहा यह अवैध धंधा अब महज चोरी नहीं, बल्कि एक संगठित खूनी खेल बन चुका है।

चंबल: आधुनिक डकैतों के साये में 'रक्तरंजित' होता रेत का काला कारोबार
दावा: सबसे अधिक देनदारियों के मामले में एमपी देश में 9वें स्थान पर
भोपाल। अरविंद मिश्र
कभी बागी और बंदूकों के लिए कुख्यात चंबल का बीहड़ आज एक नए और अधिक खूंखार 'रेत माफिया' की गिरफ्त में है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य की कोख उजाड़कर फल-फूल रहा यह अवैध धंधा अब महज चोरी नहीं, बल्कि एक संगठित खूनी खेल बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी—'रेत माफिया चंबल के आधुनिक डकैत हैं'—इस कड़वे सच पर मुहर लगाती है कि ये गिरोह अब कानून की सीमाओं से परे जा चुके हैं। पारिस्थितिकी का विनाश और पुलिस पर बेखौफ हमले बताते हैं कि चंबल की लहरें अब पानी से नहीं, बल्कि लालच और हिंसा के बारूद से उफन रही हैं। सरकार! रुक जाए रेत डकैती तो प्रदेश की उधारी उतर जाएगी।
चंबल अंचल में नजर डाले तो पता चलता है कि अवैध रेत खनन से सरकारी खजाने को 30,000 करोड़ रुपए से अधिक का सालाना राजस्व नुकसान होता है। यही नहीं, प्रति दिन 4 से 5 करोड़ रुपए का रेत का अवैध कारोबार होता है। हर दिन 5 से 6 हजार ट्रॉली रेत निकालकर की जाती है। वहीं नर्मदापुरम और भोपाल संभाग के सीहोर, हरदा, और रायसेन जिलों में नर्मदा नदी के बीचों-बीच अस्थाई पुल और रैंप बनाकर पोकलेन मशीनों से करोड़ों रुपए की रेत का अवैध उत्खनन किया जा रहा है। इसी तरह जबलपुर संभाग में रेत माफिया नदी की तलहटी से रेत निकालने के लिए जुगाड़ की पनडुब्बियों का उपयोग कर सरकार को करोड़ों के राजस्व की नुकसान पहुंचा रहे हैं। अवैध रेत खनन के चलते डिंडोरी में नर्मदा की सहायक नदियों का अस्तित्व खतरे में आ गया है। रीवा और शहडोल संभाग के सीधी, शहडोल, उमरिया में भी बड़े पैमाने पर अवैध खनन और परिवहन जारी है। यहां भी करोड़ का प्रति दिन करोबार हो रहा है।
24 माह में 55 हजार करोड़ की चपत
प्रदेश में रेत माफिया चंबल-नर्मदा सहित प्रदेशभर की नदियों को खोखला कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार पिछले 24 माह में माफिया ने नदियों से अवैध रेत निकालकर सरकार को 55 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की चपत लगाई है। खनिज के अवैध परिवहन की रोकथाम के लिए अब तक पूरे प्रदेश में 500 से ज्यादा एफआईआर दर्ज हुई। मप्र की नदियों से सालाना वैध तरीके से 2.25 लाख करोड़ की रेत निकाली जाती है। जबकि अवैध तरीके से 50 हजार करोड़ की।
पूर्व मंत्री ने कहा था- दर्ज होगा हत्या का केस
तत्कालीन कृषि मंत्री कमल पटेल ऐलान किया था कि नर्मदा हमारी आस्था का केंद्र है। नदी से अवैध रेत निकली, तो जिलों के कलेक्टर, एसपी, खनिज अधिकारी, क्षेत्र के तहसीलदार और थानेदार सीधेतौर पर जिम्मेदार होंगे। यदि कार्रवाई नहीं हुई, तो राज्य सरकार उन पर कार्रवाई करेगी। मंत्री ने साफ कहा था कि नर्मदा में पोकलेन और पनडुब्बी मशीनों से रेत निकालने वालों पर तो धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत कार्रवाई कराई जाएगी। सरकार ने नर्मदा नदी को जीवित इकाई घोषित किया है।
माफिया ने तोडे़ लूट के रिकॉर्ड
रेत के अवैध उत्खनन से सरकार को हर साल अरबों रुपए का चूना लग रहा है। ग्वालियर-चंबल संभाग में डबरा के पास स्थित सिंध नदी के चांदपुर घाट और रायपुर घाट पर रेत माफिया द्वारा नाव डालकर रेत का अवैध उत्खनन किया जा रहा है। अवैध खनन साल दर साल बढ़ता जा रहा है। अवैध खनन को लेकर जितने मामले प्रदेश की अदालतों में हैं, उतने अन्य किसी राज्य में नहीं हैं। मप्र में अवैध खनन माफिया ने लूट के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
कोल मंत्रालय की रिपोर्ट ने चौंकाया
कोल मंत्रालय की रिपोर्ट में भी मध्यप्रदेश में हो रहे अवैध खनन पर चिंता जाहिर की गई है। मप्र में 11 साल में 80 लाख 26 हजार 863 क्यूबिक मीटर गौण खनिज और 356 हजार 778 क्यूबिक मीटर प्रमुख खनिज का अवैध खनन हुआ है। रेत के अवैध खनन के लिए कुख्यात ग्वालियर-चंबल अंचल हो या फिर मालवांचल या विंध्य या महाकोशल, हर क्षेत्र में वैध खनन की आड़ में अवैध खनन हो रहा है। आज प्रदेश का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां अवैध खनन नहीं हो रहा हो।
खदान बंद, खनन जारी
दतिया जिले में भंडेर ब्लॉक की रेत खदानें कागजों में बंद है, लेकिन करीब 20 करोड़ रुपए से अधिक का अवैध खनन जारी है। श्योपुर जिले में राजस्थान की सीमा से सटे पार्वती नदी के किनारे अवैध उत्खनन हो रहा है। चंबल नदी का किनारा घड़िय़ाल सेंचुरी के लिए आरक्षित है, लेकिन रेत माफिया का कारोबार जारी है।
28 जिलों में माफिया राज
प्रदेश में 28 जिलों में तो खनन माफिया का एकछत्र राज है। कई जिलों में अवैध उत्खनन के मामले में खनन माफिया पर लगाए गए अर्थदंड के अरबों रुपए वसूल नहीं हो पा रहे हैं। अकेले मंडला और सीहोर जिले में ही 1300 करोड़ रुपए का अर्थदंड खनन माफिया से वसूलने में प्रशासन नाकाम साबित हुआ है। प्रदेश के तकरीबन सभी जिलों में 50 से 100 प्रकरण लंबित हैं। छतरपुर, रीवा, ग्वालियर में हजारों प्रकरण लंबित हैं, जबकि जबलपुर, बालाघाट, डिंडोरी, पन्ना, टीकमगढ़, सीहोर, रायसेन और देवास जिले में 100 से 200 के बीच प्रकरण लंबित हैं।
एनजीटी के नियमों की अनदेखी
मप्र में नर्मदा, चंबल, बेतवा, केन और बेनगंगा आदि बड़ी नदियों के साथ ही अन्य नदियों में जितनी रेत खदानें हैं, वह सभी अवैध हैं। इन खदानों के संचालन में न तो एनजीटी के नियमों का पालन हो रहा है और न ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मापदंडों का पालन हो रहा है। नियमों को दरकिनार नदियों का कलेजा चीरकर माफिया सालाना 50 हजार करोड़ का अवैध धंधा कर रहा है। नर्मदा, चंबल, बेतवा, केन, बेनगंगा आदि नदियों के हालात खनन के कारण गंभीर हैं।
माफिया भर रहे तिजोरी
मप्र में रेत के खनन से नदियों और उसकी जलवायु पर भारी खतरा मंडरा रहा है। शायद ही ऐसी कोई छोटी-बड़ी नदी हो, जिस पर रेत का उत्खनन न हो रहा हो। नर्मदा का उदगम अमरकंटक से होता है, लेकिन पर्वतमाला से उतर कर चंद किलोमीटर बाद ही खनन माफिया नर्मदा का चीरहरण करता नजर आता है। माफिया रेत का उत्खनन कर अपनी तिजोरियां भरते हैं। अनूपपुर, डिंडोरी, मंडला, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, सीहोर, हरदा, खंडवा, बड़वानी, धार और झाबुआ सहित ऐसा कोई जिला नहीं है जहां पर रेत का उत्खनन न हो रहा हो।
नदियां अवैधर उत्खनन की शिकार
महाकोशल में बेनगंगा, पेंच और कनान रेत उत्खनन के सबसे बड़े केंद्र हैं। चंबल मप्र की दूसरी बड़ी नदी है और यह इंदौर के महू से निकलकर धार, रतलाम, मंदसौर, शिवपुरी, भिंड और मुरैना होते हुए इटावा में जाकर यमुना से मिलती है। इन सभी जिलों में उत्खनन का कारोबार बदस्तूर जारी है। इनके अलावा बैतूल में ताप्ती, अनूपपुर, सीधी और सिंगरौली में सोन नदी, रायसेन, विदिशा, गुना, ओरछा की बेतवा, होशंगाबाद की तवा, देवास की काली सिंध और सीहोर की पार्वती नदी ये सभी नदियां बड़ी मात्रा में उत्खनन की शिकार हैं
शहडोल में बेलगाम खनन माफिया
मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य शहडोल जिले में रेत का ठेका नहीं होने से खनन माफिया बेलगाम हो गए हैं। खनिज विभाग की ओर से 1 अप्रैल 2025 से 15 मार्च 2026 तक चलाए गए विशेष अभियान के दौरान अवैध रेत खनन के 222 प्रकरण दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में कार्रवाई करते हुए विभाग ने अब तक 70 लाख 27 हजार 162 रुपए का अर्थदंड वसूल कर सरकार को राजस्व दिलाया है। इस अवधि में अवैध उत्खनन के 19 केस दर्ज किए गए, जिनमें 6 लाख 85 हजार 300 रुपए का अर्थदंड लगाया गया। वहीं अवैध परिवहन के 192 प्रकरण सामने आए, जिनसे 6 लाख 57 हजार 722 रुपए की वसूली की गई। इसके अलावा अवैध भंडारण के 6 मामलों में 2 लाख 84 हजार 140 रुपए का अर्थदंड लगाया गया।
बढ़ती हिंसा का लंबा इतिहास
चंबल में रेत माफियाओं की हिंसा कोई नई बात नहीं है। पिछले एक दशक से अधिक समय में इस इलाके में पुलिस, वन विभाग और आम नागरिकों पर हमलों की लंबी श्रृंखला सामने आती रही है। 08 मार्च 2012 को आईपीएस नरेंद्र कुमार की हत्या से लेकर 2014, 2015, 2016, 2017 और उसके बाद के वर्षों तक लगातार फायरिंग, पथराव, कुचलने और हमलों की घटनाएं सामने आई हैं। सड़क हादसों के रूप में सामने आए कई मामलों में रेत से भरे ट्रैक्टर-ट्रॉली और डंपरों ने लोगों की जान ली या उन्हें गंभीर रूप से घायल किया। 2018, 2019, 2020, 2021, 2022, 2023, 2024, 25-26 तक ये सिलसिला जारी है।
खौफ उगलते आंकड़े
जलीय जीवों पर मंडराता संकट
चंबल नदी में अवैध रेत खनन का असर केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पर्यावरण और जैव विविधता पर भी पड़ रहा है। राष्ट्रीय चंबल डॉल्फिन घड़ियाल सेंचुरी, जो 1980 के दशक में स्थापित की गई थी, आज माफियाओं के कब्जे में बताई जा रही है। 435 किलोमीटर क्षेत्र में फैली इस सेंचुरी का उद्देश्य विलुप्त होती प्रजातियों का संरक्षण था, लेकिन अवैध खनन के चलते जलीय जीवों के अंडे बड़ी संख्या में नष्ट हो रहे हैं। घड़ियाल और अन्य जीव चंबल नदी के किनारे रेत में अंडे देते हैं, ऐसे में लगातार खनन उनकी प्रजातियों के अस्तित्व पर खतरा पैदा कर रहा है।
कानूनी हस्तक्षेप के बावजूद नियंत्रण नहीं
अवैध खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी तक हस्तक्षेप कर चुके हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात काबू में नहीं दिखते। चंबल नदी में खनन के खिलाफ दायर जनहित याचिका को ग्वालियर हाईकोर्ट ने एनजीटी को ट्रांसफर करने का आदेश दिया है। याचिका में बताया गया कि अनियंत्रित रूप से चल रहे रेत से भरे वाहनों के कारण अब तक 75 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाया है। यह मुद्दा उठाया गया है कि खनन पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए। राज्य सरकार ने भी माना है कि इस मामले से जुड़ा एक प्रकरण पहले से एनजीटी में लंबित है।
प्रदेश का कर्ज भी 5 लाख करोड़ पार
मध्यप्रदेश सरकार ने वित्त वर्ष-2026-27 का बजट 18 फरवरी को पेश किया। इस बार प्रदेश का बजट 4,65,491 करोड़ रुपए है। यह पिछले साल के बजट 4.21 लाख करोड़ रुपए से करीब 15 फीसदी ज्यादा है। लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि प्रदेश का कर्ज भी 5 लाख करोड़ पार हो गया है। सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि अगले वित्त वर्ष में अकेले बाजार से करीब 78 हजार करोड़ कर्ज लेने का अनुमान है।
देश के कुल कर्ज में 5 फीसदी हिस्सा मप्र का
रिजर्व बैंक आफ इंडिया के मुताबिक, देश के कुल राज्यों की देनदारी में मा का हिस्सा 5 फीसदी से अधिक है। मध्यप्रदेश को देनदारियां 2007 में 52,731.1 करोड़ रुपए थी, 2026 में 5,31,012.8 करोड़ रुपए हो गई है। यानी 19 साल में 10 गुना। आरबीआई के अनुसार, सबसे अधिक देनदारियों के मामले में मप्र देश में 9वें स्थान पर है।
मार्च 2026 तक सभी राज्यों की देनदारी
| राज्य | देनदारी (करोड़) |
| तमिलनाडु | 10,42,858.2 |
| उत्तर प्रदेश | 8,83,977.1 |
| कर्नाटक | 8,14,277 |
| महाराष्ट | 9,37,159.6 |
| प. बंगाल | 7,90,237 |
| राजस्थान | 7,14,993.0 |
| आंध्र प्रदेश | 6,45,461.1 |
| गुजरात | 5,34,339.1 |
| मध्यप्रदेश | 5,31,012.8 |
कर्ज कहां से लिया
सरकार ने बाजार और वित्तीय संस्थानों से कुल 85,076 करोड़ रुपए कर्ज लिया। इसमें से 76,210 करोड़ रुपए बाजार से बॉन्ड के जरिए लिए गए।
चुकाया कितना
इस साल सरकार ने 58,616 करोड़ रुपए सिर्फ पुराने कर्ज की किस्त और ब्याज में दे दिए। इसमें 29,980 करोड़ मूल रकम (किस्त) थी और 28,636 करोड़ रुपए ब्याज था।
जो बजट बढ़ाया
करीब 43 हजार करोड़ का अतिरिक्त इंतजाम करना होगा। यह राशि राज्य के रेवेन्यू सोर्स से हो बढ़ाई जा सकती है, लेकिन इसकी गुंजाइश कम ही है। आगामी तीन सालों के बजट में हर साल 15 से 17 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी होगी
वित्तीय वर्ष 25-26 में लिए कर्ज एक नजर में
| तारीख | वर्ष | राशि करोड़ में |
| 7 मई | 2025 | 5000 |
| 4 जून | 2025 | 4500 |
| 8 जुलाई | 2025 | 4800 |
| 30 जुलाई | 2025 | 4300 |
| 5 अगस्त | 2025 | 4000 |
| 26 अगस्त | 2025 | 4800 |
| 9 सितंबर | 2025 | 4000 |
| 23 सितंबर | 2025 | 3000 |
| 30 सितंबर | 2025 | 3000 |
| 28 अक्टूबर | 2025 | 5200 |
| 11 नवंबर | 2025 | 4000 |
| 02 दिसंबर | 2025 | 3000 |
| 30 दिसंबर | 2025 | 3500 |
| 07 जनवरी | 2026 | 4000 |
| 03 फरवरी | 2026 | 5300 |
| 10 फरवरी | 2026 | 5000 |
| 17 फरवरी | 2026 | 5600 |
| 03 मार्च | 2026 | 6300 |
| 10 मार्च | 2026 | 5600 |
| 17 मार्च | 2026 | 4100 |
| 27 मार्च | 2026 | 2500 |
सात वर्ष में ऐसे बढ़ता गया कर्ज
| वर्ष | कर्ज (लाख करोड़ में) |
| 2019- 20 | 2,01,989.28 |
| 2020- 21 | 2,53,335.60 |
| 2021-- 22 | 2,95,532.91 |
| 2022- 23 | 3,31,651.07 |
| 2023-24 | 3,75,578.52 |
| 2024-25 | 4,36,978.52 |
| 2025-26 | 5,28,478.52 |
सरकार से ज्यादा कमा रहे रेत माफिया
बड़े पैमाने पर अवैध खनन हो रहा
अगर पुल गिरा तो जिम्मेदारी कौन लेगा
कभी बागी और बंदूकों के लिए कुख्यात चंबल का बीहड़ आज एक नए और अधिक खूंखार 'रेत माफिया' की गिरफ्त में है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य की कोख उजाड़कर फल-फूल रहा यह अवैध धंधा अब महज चोरी नहीं, बल्कि एक संगठित खूनी खेल बन चुका है।
साक्षात्कार ... राजनीति अक्सर उन रास्तों से होकर गुजरती है जिसकी कल्पना व्यक्ति ने स्वयं नहीं की होती। कुछ ऐसा ही सफर पृथ्वीपुर विधायक नितेंद्र सिंह राठौर का रहा।
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बुंदेलखंड के एक छोटे से गांव से लेकर दिल्ली और फिर मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत मध्यप्रदेश विधानसभा में 10 वर्ष तक प्रमुख सचिव रहे अवधेश प्रताप सिंह की जीवन यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है।
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