साक्षात्कार ... राजनीति अक्सर उन रास्तों से होकर गुजरती है जिसकी कल्पना व्यक्ति ने स्वयं नहीं की होती। कुछ ऐसा ही सफर पृथ्वीपुर विधायक नितेंद्र सिंह राठौर का रहा।

नितेंद्र सिंह राठौर
साक्षात्कार: संघर्ष की आंच में तपकर उभरे विधायक नितेंद्र सिंह राठौर से बातचीत
भांपाल। स्टार समाचार वेब
राजनीति अक्सर उन रास्तों से होकर गुजरती है जिसकी कल्पना व्यक्ति ने स्वयं नहीं की होती। कुछ ऐसा ही सफर पृथ्वीपुर विधायक नितेंद्र सिंह राठौर का रहा। एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से होने के बावजूद वे सक्रिय राजनीति से दूर व्यावसायिक क्षेत्र में सक्रिय थे, किंतु 'ईश्वरी आघात' और विषम पारिवारिक परिस्थितियों ने उन्हें अचानक चुनावी मैदान में ला खड़ा किया। उपचुनाव की हार से विचलित हुए बिना उन्होंने जमीन पर संघर्ष जारी रखा और 2023 के चुनाव में जीत दर्ज कर अपनी पारिवारिक विरासत को ससम्मान पुनर्स्थापित किया। आज वे मध्य प्रदेश विधानसभा के मुखर युवा चेहरों में से एक हैं। अपनी राजनीतिक यात्रा और क्षेत्र के विकास की सोच पर उन्होंने 'स्टार समाचार' से विशेष चर्चा की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश...
जवाब- राजनीतिक परिवार से होने के नाते सेवा का भाव तो था, लेकिन इस तरह अचानक सक्रिय राजनीति में आऊंगा, यह कभी नहीं सोचा था। हमारे परिवार में दादाजी के समय से ही यह अनुशासन है कि एक समय में एक ही सदस्य सक्रिय रहेगा और बाकी सब सहयोग करेंगे। दादाजी और पिताजी के बाद मैं इस जिम्मेदारी को निभाने वाली तीसरी पीढ़ी हूँ। पिताजी शारीरिक रूप से बहुत स्वस्थ थे, इसलिए उनके असमय निधन की कल्पना किसी ने नहीं की थी। उनके जाने के बाद उपजी परिस्थितियों में कमलनाथ जी और दिग्विजय सिंह जी जैसे वरिष्ठ नेताओं के निर्देश पर मैंने उपचुनाव लड़ा। उस चुनाव के नतीजे हमारे पक्ष में क्यों नहीं रहे, उसके कारण सभी को स्पष्ट हैं।
जवाब- यह अनुशासन हमारे यहां दादाजी के समय से चला आ रहा है। पिताजी के जाने के बाद भी हमारा परिवार पूरी तरह संगठित है। हमने यह सिद्धांत बनाया है कि परिवार से एक समय में एक ही व्यक्ति सक्रिय राजनीति (नेतृत्व) में रहेगा, जबकि अन्य सदस्य पर्दे के पीछे रहकर सहयोग करेंगे। आज मैं सक्रिय राजनीति में हूं, तो परिवार के बाकी सदस्य मेरा संबल हैं। अक्सर यह होता है कि मेरी अनुपस्थिति में मेरे बड़े चाचा या भाई क्षेत्र की जनता के बीच उपलब्ध रहते हैं। आज के दौर में ऐसा सामंजस्य मुश्किल जरूर है, लेकिन हमारे परिवार ने इसे पूरी निष्ठा से निभाया है।
जवाब: शिक्षा पूरी करने के बाद मैं पूरी तरह व्यवसाय से जुड़ा था, लेकिन राजनीतिक पृष्ठभूमि के कारण सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी रहती थी। मैंने बचपन से ही पिताजी (स्वर्गीय बृजेंद्र सिंह राठौर) की कार्यशैली को करीब से देखा, जहाँ कार्यालय में हर वर्ग के व्यक्ति को समान सम्मान मिलता था। जनता के प्रति उनका समर्पण और अटूट पारिवारिक जुड़ाव ही मेरी प्रेरणा बना। पिताजी का निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भारी बहुमत से जीतना, उनके प्रति जन-विश्वास का सबसे बड़ा प्रमाण था, जिसे देखकर ही मैं बड़ा हुआ हूँ।
जवाब- मैं क्षेत्र और चुनावी राजनीति को बचपन से देख रहा हूँ, लेकिन अनुभव समय के साथ ही आता है। शुरुआत में भाषण देना चुनौतीपूर्ण था, पर अब काफी कुछ सीख लिया है। पिताजी की एक बात आज भी मेरा मंत्र है— 'जो दिल में है, वही बोलो'। हालांकि कई लोग सलाह देते हैं कि राजनीति में दिमाग से बोलना चाहिए, लेकिन मैं आज भी दिल की बात कहने में विश्वास रखता हूँ। कभी-कभी इससे चूक भी होती है, पर मैं उसे सुधारने का प्रयास करता हूँ।
जवाब- पिताजी की विरासत और जनता से उनके जुड़ाव के अनगिनत किस्से हैं। एक बार मैं निवाड़ी के एक गांव में गया, तो वहां एक बुजुर्ग महिला शुरू में मुझे कोई बाहरी नेता समझकर काफी सख्त लहजे में मिलीं। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं बृजेंद्र सिंह जी का बेटा हूं, उनका भाव तुरंत बदल गया। उन्होंने ममता के साथ मुझे गले लगा लिया और पिताजी के पुराने संस्मरण सुनाने लगीं। आज भी जब मैं गांवों में जाता हूं, तो बुजुर्गों की आंखों में पिताजी के प्रति वही सम्मान और प्रेम देखकर भावुक हो जाता हूं।
जवाब- "वह चुनाव मेरे लिए बड़ी व्यक्तिगत और राजनीतिक चुनौती था। पिताजी के निधन के बाद उपजी सहानुभूति के कारण हमें जीत का पूरा भरोसा था, लेकिन सत्तापक्ष ने अनैतिक तरीके से चुनाव लड़ा। तत्कालीन मुख्यमंत्री की दर्जनों सभाएं हुईं, प्रशासन का दुरुपयोग कर हमारे कार्यकर्ताओं को डराया गया और धनबल का खुला प्रयोग हुआ। दुर्भाग्यवश नतीजे पक्ष में नहीं रहे, लेकिन मेरा आज भी मानना है कि यदि चुनाव निष्पक्ष होता तो परिणाम कुछ और होते।"
जवाब- "हार से हताशा स्वाभाविक थी, पूरा परिवार निराश था। हमें लगा कि जनता हमारे साथ थी, लेकिन प्रशासनिक मशीनरी के दुरुपयोग ने चुनाव का रुख बदल दिया। उस कठिन समय में मुझे पिताजी का शुरुआती संघर्ष याद आया; वे भी 1990 में अपना पहला चुनाव हारे थे, लेकिन 1993 में शानदार वापसी की। उनकी उसी जिजीविषा को मैंने अपना आदर्श बनाया और संघर्ष जारी रखा, जिसका परिणाम 2023 में जनता के अपार आशीर्वाद के रूप में सामने आया।"
जवाब- सत्ता पक्ष सहयोग नहीं करता और प्रशासन भी डरा हुआ रहता है। फिर भी मैंने ढाई वर्षों में पूरी कोशिश की कि विकास कार्य हों। कई सड़कें स्वीकृत कराईं। लेकिन आज भ्रष्टाचार चरम पर है, यह एक बड़ी चिंता है। पिताजी कहते थे कि अपनी लकीर बड़ी करो, दूसरे की छोटी मत करो। मैं उसी पर चलता हूं।
जवाब- बुंदेलखंड की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी और पलायन है। मैं सबसे पहले आह्वान करता हूं कि बच्चों को शिक्षित करें। जो शिक्षित हैं उन्हें भी रोजगार नहीं मिल पाता। खेती मौसम पर आधारित है, फसल बर्बाद होने पर लोग दिल्ली-मुंबई पलायन करते हैं। मेरा प्रयास है कि बुंदेलखंड की ऐतिहासिक धरोहरों और चंदेलकालीन तालाबों को पर्यटन से जोड़कर रोजगार पैदा किया जाए। सरकार दिखावा और इवेंट ज्यादा करती है, पर जमीन पर काम की जरूरत है।
जवाब- यह सच है कि उस समय एक बड़ा पैकेज दिया गया था, लेकिन भारी भ्रष्टाचार के कारण उसका लाभ आम लोगों तक नहीं पहुंच सका। जिस नेक नियत से पैसा रिलीज किया गया था, उस स्तर पर काम नहीं हो पाया। इसके बाद सरकारें बदल गईं और जो निरंतरता होनी चाहिए थी, वह पूरी तरह खत्म हो गई। अंततः इसका सबसे बड़ा नुकसान बुंदेलखंड की जनता को ही उठाना पड़ा।
जवाब- पैसा सही उद्देश्य से दिया गया था, लेकिन स्थानीय स्तर पर क्रियान्वयन और निगरानी में खामियां रहीं। शासन बदलने के बाद तो माहौल ही बदल गया और योजनाएं ठप हो गईं। आज की स्थिति में भी सबसे बड़ी जरूरत भ्रष्टाचार पर कड़ा नियंत्रण करने की है, ताकि जनता का पैसा सीधे विकास में लगे।
जवाब: अगर ईमानदारी से काम होगा तो इसका लाभ बुंदेलखंड को जरूर मिलेगा। लेकिन अगर यह भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई, तो नुकसान सिर्फ जनता का होगा। सरकारें विज्ञापन ज्यादा करती हैं, पर सच्चाई जमीन पर अलग होती है।
जवाब- पॉलिटिक्स में समय कम मिलता है, पर जब मिलता है तो फैमिली के साथ बाहर जाता हूं, दोस्तों के साथ आइडिया शेयर करता हूं या टेलीविजन देखता हूं। मैंने होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया है, तो अपने व्यवसाय के प्रमोशन के लिए ओरछा और राम राजा की नगरी को 'हेरिटेज डेस्टिनेशन' के रूप में प्रमोट करता हूं।
जवाब- "होटल मैनेजमेंट से राजनीति तक का मेरा सफर 'अतिथि देवो भव:' से 'जनता देवो भव:' के संकल्प तक पहुँचा है। मुझे खाना बनाने से ज्यादा बनवाने का शौक है। खेलों में मेरी रुचि क्रिकेट, बैडमिंटन और टेबल टेनिस में है। जब भी समय मिलता है, बायोग्राफी पढ़ना और धार्मिक विषयों पर शोध करना मुझे नई ऊर्जा देता है।"
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