भारतीय सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत सेवा देने वाली महिला अधिकारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने सेना में महिलाओं के खिलाफ होने वाले प्रणालीगत भेदभाव को स्वीकार करते हुए अपनी विशेष संवैधानिक शक्तियों (अनुच्छेद 142) का इस्तेमाल किया।
By: Arvind Mishra
Mar 24, 20262:49 PM
नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
भारतीय सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत सेवा देने वाली महिला अधिकारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने सेना में महिलाओं के खिलाफ होने वाले प्रणालीगत भेदभाव को स्वीकार करते हुए अपनी विशेष संवैधानिक शक्तियों (अनुच्छेद 142) का इस्तेमाल किया। कोर्ट ने उन महिलाओं के पक्ष में फैसला दिया जिन्हें स्थायी कमीशन से वंचित रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक जिन महिला अधिकारियों ने अपनी सेवा से हटाए जाने को लेकर अदालत में चुनौती दी थी, उन्हें 20 साल की सेवा के बराबर पेंशन पाने का हकदार माना जाएगा। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि सेना में महिलाओं के खिलाफ प्रणालीगत भेदभाव की वजह से उन्हें परमानेंट कमीशन नहीं मिल पाया।
पुरुषों के एकाधिकार नहीं हो सकता
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सेना में केवल पुरुषों का एकाधिकार नहीं हो सकता। जस्टिस ने साफ किया कि पुरुष अधिकारी यह उम्मीद नहीं कर सकते कि भविष्य के सभी खाली पद केवल उनके लिए ही होंगे। कोर्ट के अनुसार, अवसरों की कमी और गलत तरीके से अयोग्य ठहराए जाने के कारण महिला अधिकारियों की योग्यता और उनके करियर की प्रगति पर बुरा असर पड़ा है।
लापरवाही से दिया जाता था ग्रेड
फैसला सुनाते हुए CJI ने कहा कि महिला अधिकारियों की सालाना गोपनीय रिपोर्ट (ACR) को अक्सर लापरवाही से ग्रेड दिया जाता था, इस सोच के साथ कि वे करियर में आगे बढ़ने या परमानेंट कमीशन के लिए योग्य नहीं होंगी। इससे उनकी कुल योग्यता पर बुरा असर पड़ा। वायु सेना के मामले में, बेंच ने पाया कि 2019 में लागू किए गए सेवा की अवधि के मानदंड और न्यूनतम प्रदर्शन के मानदंड जल्दबाजी में लागू किए गए थे, जिससे अधिकारियों को उन्हें पूरा करने का उचित मौका नहीं मिला।
1 नवंबर 2025 से लागू होगी पेंशन
सभी SSC अधिकारियों को जिनमें 2021 में सेवामुक्त की गई अधिकारी भी शामिल हैं- 20 साल की योग्य सेवा पूरी की हुई माना जाएगा। इसमें कहा गया कि पेंशन इस 20 साल की मानी गई सेवा के आधार पर तय की जाएगी, और यह 1 नवंबर, 2025 से लागू होगी। हालांकि, कोर्ट ने ऑपरेशनल प्रभावशीलता का हवाला देते हुए दोबारा नौकरी पर रखने का आदेश देने से इनकार कर दिया, लेकिन कहा कि यह वित्तीय लाभ देने से मना करने का आधार नहीं हो सकता। आर्मी और नेवी से जुड़े मामलों पर सुनवाई करते हुए, कोर्ट ने उनके मूल्यांकन मॉडलों में भी इसी तरह की कमियां पाईं और कहा कि मूल्यांकन के मापदंडों का खुलासा न करने से इन अधिकारियों पर बुरा असर पड़ा। कोर्ट ने उन अधिकारियों के लिए विंग कमांडर के पद तक काल्पनिक टाइम-स्केल प्रमोशन की मांग को खारिज कर दिया जो अब सक्रिय सेवा में नहीं हैं।
सिर्फ पुरुषों का एकाधिकार नहीं
शीर्ष अदालत ने कहा कि अवसरों की कमी ने महिला अधिकारियों की योग्यता और करियर की प्रगति को प्रभावित कियाय़ उन्हें गलत तरीके से लंबी अवधि के करियर के लिए 'अनफिट' माना गया। कोर्ट ने साफ किया कि सेना में पुरुष अधिकारियों का एकाधिकार नहीं हो सकता है।