सतना में नवरात्रि से पहले 350 से अधिक दुर्गा प्रतिमाएं तैयार हो रही हैं। बारिश, महंगाई और बढ़ती मांग के बीच बंगाल व स्थानीय कारीगर दिन-रात मेहनत कर प्रतिमाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
शहर में रात गहराने लगी है, लेकिन दुर्गा प्रतिमा बनाने वाली कार्यशालाओं में कारीगरों के हाथ अब भी थमे नहीं हैं। कहीं मिट्टी से मां के चेहरे के भाव उभारे जा रहे हैं तो कहीं आंखों की रेखाओं को अंतिम आकार दिया जा रहा है। किसी कार्यशाला में मुकुट और आभूषण सजाए जा रहे हैं तो कहीं रंगों की आखिरी परत चढ़ रही है। नवरात्रि के आगमन से पहले मां की प्रतिमाओं को पंडालों तक पहुंचाने की समय-सीमा नजदीक है, इसलिए मूर्तिकार दिन-रात मेहनत में जुटे हैं।
बंगाल की मिट्टी से बनते हैं मां के चेहरे के भाव
सतना में बंगाल से कलाकारों के आने की परंपरा करीब तीन दशक पुरानी है। कारीगर महीनों पहले पहुंचकर प्रतिमाओं का निर्माण शुरू कर देते हैं। सबसे पहले बांस और लकड़ी से ढांचा तैयार होता है। इसके बाद मिट्टी की परतें चढ़ाकर शरीर का आकार दिया जाता है। चेहरे की बारीक संरचना के लिए विशेष मिट्टी बंगाल से लाई जाती है, जबकि प्रतिमा के अन्य हिस्सों में स्थानीय मिट्टी का उपयोग किया जाता है। रंग, वस्त्र, मुकुट और आभूषणों के बाद प्रतिमा को अंतिम स्वरूप मिलता है।
साढ़े तीन सौ से ज्यादा प्रतिमाओं पर काम
11 अक्टूबर से शुरू होने वाले नवरात्रि पर्व को लेकर सतना शहर और आसपास के क्षेत्रों में इस बार 350 से अधिक छोटी-बड़ी दुर्गा प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं। खूंथी, राजेंद्र नगर, मुख्तियारगंज, रामना टोला, गौशाला चौक, कृष्ण नगर, पन्ना नाका सहित कई जगह अस्थायी कार्यशालाएं बनाई गई हैं। बंगाल से आए कारीगरों के साथ स्थानीय शिल्पकार भी प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं।
बारिश ने बढ़ाया इंतजार, हीटर से सुखाई मिट्टी
इस बार लगातार बारिश ने कारीगरों की मुश्किल बढ़ा दी। मिट्टी में नमी अधिक होने से प्रतिमाओं को सूखने में सामान्य से ज्यादा समय लगा। कई कार्यशालाओं में कारीगरों को हीटर तक का सहारा लेना पड़ा। समय कम होने के कारण काम रोकना संभव नहीं था, इसलिए अतिरिक्त समय देकर प्रतिमाओं को तैयार किया जा रहा है।
महंगाई ने बढ़ाई प्रतिमा की लागत
प्रतिमा निर्माण में इस्तेमाल होने वाली लकड़ी, बांस, रस्सी, सुतली, रंग और सजावटी सामग्री के दाम बढ़ने का असर इस कारोबार पर भी पड़ा है। कलाकारों के मुताबिक जिस लकड़ी की कीमत पहले करीब 10 रुपए घनफीट थी, वह अब 40 रुपए तक पहुंच गई है। बांस के दाम भी 60 से 80 रुपए तक बताए जा रहे हैं। इसके अलावा कार्यशाला का किराया और श्रमिकों की लागत अलग है। अब समितियां साधारण मुकुट की जगह नक्काशीदार डिजाइन और बारीक फिनिशिंग वाली प्रतिमाएं पसंद कर रही हैं।
13 फीट की काली माता 16 फीट की महिषासुर मर्दिनी
प्रतिमाओं की ऊंचाई को लेकर समितियों की पसंद अलग-अलग है। सामान्य आकार की प्रतिमाओं के साथ इस बार बड़े स्वरूप की भी मांग है। कार्यशालाओं में 13 फीट की काली माता और 16 फीट की महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमाएं भी तैयार की जा रही हैं।
क्या कहते हैं कलाकार
चेहरे के भाव पर ज्यादा बारीकी
जून से टीम के साथ काम कर रहे हैं। इस बार करीब 30 गणेश और 50 दुर्गा प्रतिमाएं तैयार की हैं। तकनीक बदलने के साथ अब चेहरे के भाव और फिनिशिंग पर पहले से ज्यादा बारीकी से काम करना पड़ता है।
डोलन पाल, कलकत्ता
महंगाई ने बढ़ाई लागत
एक अन्य कलाकार ने बताया कि इस बार 50 से अधिक गणेश और करीब 60 दुर्गा प्रतिमाएं तैयार की हैं। बारिश के कारण मिट्टी सुखाने में परेशानी हुई। वहीं लकड़ी, बांस और दूसरी सामग्री महंगी होने से प्रतिमा निर्माण की लागत भी बढ़ गई है।
विनीत गुप्ता, सतना
अब अंतिम स्पर्श का दौर
नवरात्रि नजदीक आते ही कार्यशालाओं में काम और तेज हो गया है। चेहरे की भाव-भंगिमा, आंखों की बारीकी, रंगों की चमक और आभूषणों की सजावट, हर हिस्से को बार-बार जांचा जा रहा है। कुछ दिनों बाद यही प्रतिमाएं पंडालों की शोभा बढ़ाएंगी, लेकिन उनकी भव्यता के पीछे महीनों से रात-दिन मेहनत कर रहे कारीगरों के हाथों की कहानी छिपी होगी।


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