मध्य प्रदेश में 1998-2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य। सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान छूट देने से किया इनकार। पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

मध्य प्रदेश के करीब डेढ़ लाख शिक्षकों के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में 1998 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों को पात्रता परीक्षा (TET) से छूट देने वाली पुनर्विचार याचिकाओं पर अहम सुनवाई हुई। कोर्ट ने अपने कड़े रुख में स्पष्ट किया कि शिक्षक बनने के लिए निर्धारित अनिवार्य योग्यता से अब कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान जस्टिस की पीठ ने कहा कि पात्रता परीक्षा के नियमों में जो भी ढील दी जानी थी, वह पहले ही दी जा चुकी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2017 में जब नियम लागू हुए थे, उसके बाद 5 साल की रियायत (Grace Period) दी गई थी, जो अब समाप्त हो चुकी है। कोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) के मानकों का पालन करना अनिवार्य है और बिना पात्रता परीक्षा पास किए किसी भी शिक्षक की नियुक्ति या सेवा जारी रखना संभव नहीं होगा।
यह पूरा मामला 1 सितंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के उस पुराने आदेश से जुड़ा है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि 1998 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षक—जो मेरिट के आधार पर भर्ती हुए थे—उनके लिए भी TET अनिवार्य है। मध्य प्रदेश सरकार और विभिन्न शिक्षक संगठनों ने पुनर्विचार याचिका दायर कर मांग की थी कि इन पुराने शिक्षकों को उनके अनुभव के आधार पर परीक्षा से छूट दी जाए। पूर्व में कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि जो शिक्षक इस परीक्षा को पास करने में विफल रहेंगे, उनकी सेवा समाप्त (Termination) की जा सकती है।
जनजातीय कल्याण शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष डीके सिंगौर ने सुनवाई के बाद बताया कि वकीलों द्वारा मजबूत दलीलें पेश किए जाने के बावजूद अदालत का रुख सकारात्मक नहीं दिखा। हालांकि, 70 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई देर शाम तक चलती रही और अंतिम औपचारिक फैसला आना अभी बाकी है।
शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) एक अनिवार्य योग्यता है जिसे NCTE ने 2010 में लागू किया था। यह सुनिश्चित करता है कि कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों में न्यूनतम शैक्षणिक स्तर और कौशल मौजूद है। मध्य प्रदेश में वर्तमान में स्थिति यह है कि अगर कोर्ट राहत नहीं देता है, तो हजारों अनुभवी शिक्षकों को फिर से छात्र बनकर परीक्षा देनी होगी।

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