सरभंगा में बाघ शिकार मामले ने वन विभाग की गश्ती व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वनप्रहरी वाहन हटाने, निगरानी कमजोर होने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर जांच की मांग तेज हुई।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
सरभंगा के जंगल में बाघ के शिकार ने वन विभाग की गश्ती व्यवस्था पर ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब जांच पूरी होने तक टालना आसान नहीं होगा। दांत और नाखून बरामद होने तथा आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद विभाग भले ही अपनी कार्रवाई को उपलब्धि बता रहा हो लेकिन अब जांच की दिशा उन फैसलों की ओर भी मुड़ रही है, जो शिकार से कई महीने पहले लिए गए थे। वन विभाग के सूत्रों के मुताबिक जिस सरभंगा क्षेत्र में बाघों की सबसे अधिक गतिविधियां दर्ज होती रही हैं वहां गश्त के लिए तैनात ‘वनप्रहरी’ वाहन को करीब चार महीने पहले मुख्यालय में खड़ा कर दिया गया था। विभाग की ओर से अनौपचारिक रूप से इसकी वजह ईंधन बचत बताई जा रही है। हालांकि यही फैसला अब सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।
बाघ बढ़े, गश्त घट गई
सरभंगा, करारिया और अमुआ का जंगल पिछले कुछ वर्षों में बाघों का मजबूत आवास बनकर उभरा है। वन विभाग की अपनी निगरानी में भी यहां लगातार बाघों की मूवमेंट दर्ज होती रही है। यही वजह थी कि इस क्षेत्र में विशेष गश्त के लिए वनप्रहरी वाहन की व्यवस्था की गई थी। सूत्र बताते हैं कि यह वाहन रोजाना जंगल के अंदर अलग-अलग बीटों तक पहुंचता था। चौकीदार इसके चालक होते थे और उनके साथ स्थानीय श्रमिक भी रहते थे जो जंगल के हर रास्ते और वन्यजीवों की गतिविधियों से परिचित थे। यही टीम कई बार संदिग्ध लोगों की मौजूदगी और अवैध गतिविधियों की सूचना समय रहते विभाग तक पहुंचाती थी।
जांच केवल चौकीदार तक क्यों?
वन विभाग ने शिकार के आरोप में चौकीदार और अन्य लोगों को गिरफ्तार किया है। लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि निगरानी व्यवस्था कमजोर करने वाले फैसलों की समीक्षा की जा रही है या नहीं। सबसे महत्वपूर्ण सवाल हैं वनप्रहरी हटाने का आदेश किसने दिया? क्या इसके लिए कोई लिखित आदेश जारी हुआ था? यदि आदेश था तो उसका आधार क्या था? क्या उच्च अधिकारियों को इसकी जानकारी थी? वाहन हटाने के बाद वैकल्पिक गश्ती व्यवस्था क्या बनाई गई? यदि इन सवालों की जांच नहीं होती, तो पूरी पड़ताल केवल शिकारियों तक सीमित रह जाएगी।
चार महीने पहले आखिर क्या बदल गया?
करीब चार महीने पहले अचानक इस वाहन को जंगल से हटाकर मुख्यालय में खड़ा कर दिया गया। इसके बाद नियमित गश्त लगभग बंद हो गई या पहले की तुलना में काफी सीमित रह गई। अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों किया गया? क्या जंगल में बाघों की संख्या कम हो गई थी? क्या सरभंगा अब संवेदनशील क्षेत्र नहीं रहा? या फिर कोई ऐसा प्रशासनिक कारण था जिसे सुरक्षा से ज्यादा प्राथमिकता दी गई? इन सवालों का अब तक कोई आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है।
डीजल बचाने की कीमत क्या थी?
विभागीय सूत्रों का दावा है कि वाहन को रोकने के पीछे ईंधन बचत का तर्क दिया गया। लेकिन वन्यजीव संरक्षण के जानकारों का मानना है कि संरक्षित वन्यजीवों वाले क्षेत्र में गश्त कम करना सबसे आखिरी विकल्प होना चाहिए। अब यह भी चर्चा है कि जिस डीजल का उपयोग वनप्रहरी के लिए होना था उसका उपयोग कहीं और तो नहीं किया जा रहा था। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन यदि जांच इस दिशा में बढ़ती है तो मामला केवल लापरवाही का नहीं बल्कि संसाधनों के उपयोग का भी बन सकता है।
अफसरों की जवाबदेही पर भी नजर
वन विभाग के भीतर यह चर्चा भी है कि कुछ जिम्मेदार अधिकारी क्षेत्र में नियमित निगरानी नहीं कर रहे थे। यदि यह तथ्य जांच में सही साबित होता है तो मामला केवल एक वन्यजीव अपराध का नहीं रहेगा, बल्कि संरक्षण व्यवस्था की प्रशासनिक विफलता का भी होगा। शेड्यूल वन की सूची में शामिल बाघ की मौत पर चौकीदार और उसके मददगार को पकड़ कर वन विभाग अपनी चुस्ती के प्रमाण देने के भरसक प्रयास कर रहा है लेकिन उन जिम्मेदारों की अब तक टोह तक नहीं ली। जिसके चलते उनका थ्री डेज वीकेंड उसी गति से चल रहा है। जानकारी अनुसार पांच दिन के कार्य में 3 दिन का अवकाश मनाने वाले अनुभाग अधिकारी इस जिम्मेदारी को ओढ़ने से पहले अपना जंगल छोड़ अन्यत्र जाने के जुगाड़ में लग गए हैं।

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