सतना के धवारी क्रिकेट स्टेडियम पर 8.39 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद मैदान की गुणवत्ता और स्थानीय खिलाड़ियों की पहुंच पर सवाल उठ रहे हैं। क्रिकेट विरासत वाले शहर में खेल सुविधाओं की उपयोगिता पर बहस तेज है।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
जिस सतना में कभी मनोज प्रभाकर, चेतन शर्मा, विनोद कांबली, संजय मांजरेकर, राजेश चौहान, आकाश चोपड़ा, ऋषिकेश कानिटकर, नितीश कुलकर्णी और जेपी यादव जैसे नामचीन क्रिकेटर अपने खेल का जौहर दिखा चुके हैं, जिस मैदान पर अंतरराष्ट्रीय अंपायर नितिन मेनन ने अंपायरिंग की शुरूआत की, उसी सतना में स्थानीय क्रिकेटरों को अपने स्टेडियम में अभ्यास का अवसर नहीं मिल पा रहा। विडंबना यह है कि क्रिकेट प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए करीब नौ करोड़ रुपये खर्च कर स्टेडियम बनाया गया, लेकिन शिकायतें हैं कि उसका मैदान अब क्रिकेट खेलने लायक नहीं बचा।
सवाल है कि जिस शहर ने क्रिकेट के बड़े नामों की मेजबानी की, वहां के खिलाड़ियों को अपनी ही खेल सुविधा से दूर क्यों रहना पड़ रहा है? करीब 8.39 करोड़ रुपये की लागत से तैयार धवारी क्रिकेट स्टेडियम का लोकार्पण मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 27 दिसंबर 2025 को किया था। उम्मीद थी कि आधुनिक स्टेडियम सतना की क्रिकेट परंपरा को नई ऊंचाई देगा और खिलाड़ियों को नियमित अभ्यास के लिए बेहतर मैदान मिलेगा। लेकिन निर्माण के बाद भी मैदान की स्थिति, स्थानीय खिलाड़ियों की पहुंच और संचालन व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में स्टेडियम की लागत और लोकार्पण से आगे बढ़कर यह देखना जरूरी है कि इसका लाभ वास्तव में सतना के क्रिकेटरों को कितना मिल रहा है।
2007 में क्रिकेट संघ को सौंपा मैदान शुरू हुआ स्वर्णिम दौर
धवारी के पुराने क्रिकेट मैदान का इतिहास सतना की खेल पहचान से जुड़ा है। वर्ष 2007 में तत्कालीन कलेक्टर मनीष रस्तोगी ने स्थानीय क्रिकेट गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मैदान जिला क्रिकेट संघ को सौंपा था। क्रिकेट से जुड़े लोगों के मुताबिक, इसके बाद सतना में क्रिकेट गतिविधियों ने गति पकड़ी और यह दौर शहर के क्रिकेट का स्वर्णिम काल साबित हुआ। इसी मैदान पर प्री-रणजी टीम के चयन की प्रक्रिया आयोजित हुई, जिसमें देवेंद्र बुंदेला, मेहुल सिंह और जेपी यादव जैसे खिलाड़ियों के रणजी चयन की प्रक्रिया अंजाम दी गई थी। उसी दौरान अंतरराष्ट्रीय अंपायर नितिन मेनन ने भी सतना में अंपायरिंग की शुरूआत की और आगे चलकर राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। राष्ट्रीय स्तर के क्रिकेटरों की मौजूदगी और चयन गतिविधियों ने सतना को क्रिकेट के नक्शे पर अलग पहचान दी। जेपी यादव के ऐतिहासिक दोहरे शतक की चर्चा भी इसी क्रिकेट विरासत का हिस्सा है। इससे स्पष्ट है कि मैदान केवल खेल के लिए उपलब्ध जमीन नहीं, बल्कि प्रतिभाओं को तराशने और उन्हें बड़े मंच तक पहुंचाने का माध्यम होता है। जब मैदान पर नियमित गतिविधियां होती हैं, तो खिलाड़ियों को अभ्यास, प्रतिस्पर्धा और चयन के अवसर मिलते हैं। ऐसे में सवाल है कि जिस मैदान ने कभी सतना के क्रिकेट को नई पहचान दी, उसके पुनर्विकास के बाद वही अवसर फिर क्यों नहीं बन पा रहे?
नौ करोड़ खर्च, लेकिन मैदान की बुनियादी जरूरतें अधूरी?
नए स्टेडियम से अपेक्षा थी कि पुरानी क्रिकेट परंपरा आधुनिक सुविधाओं के साथ आगे बढ़ेगी। लेकिन क्रिकेट से जुड़े लोगों का आरोप है कि निर्माण में मैदान की गुणवत्ता और खिलाड़ियों की बुनियादी जरूरतों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिली। शिकायत है कि पिच और आउटफील्ड की स्थिति क्रिकेट के अनुकूल नहीं है, जबकि परिसर में सुविधायुक्त कमरे तैयार किए गए। जिला क्रिकेट संघ ने भी निर्माण और सुविधाओं को लेकर आपत्ति जताई थी। क्रिकेट स्टेडियम की असली पहचान उसकी पिच, आउटफील्ड, अभ्यास नेट, प्रशिक्षण व्यवस्था और नियमित खेल गतिविधियों से होती है। यदि मैदान ही खेलने योग्य नहीं है, तो भवन और कमरों की सुविधाएं खिलाड़ियों के किस काम आएंगी? निर्माण पर खर्च की समीक्षा के साथ मैदान की मौजूदा स्थिति का तकनीकी आकलन भी जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन सुधारों की जरूरत है और उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी किसकी है।
20 साल के ठेके की चर्चा, खिलाड़ियों की पहुंच का क्या?
स्टेडियम को करीब 20 साल के लिए ठेके पर देने और निर्माण लागत की भरपाई के लिए लगभग 40 लाख रुपये सालाना जुटाने की व्यवस्था बनाने की कवायदें टेंडर है। इस प्रस्ताव की आधिकारिक शर्तें और वित्तीय आधार सार्वजनिक होना चाहिए। यदि संचालन करने वाली संस्था को हर साल इतनी बड़ी रकम जुटानी होगी, तो जिला क्रिकेट संघ या स्थानीय खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने वाली संस्था इस खर्च को कैसे वहन करेगी? मुद्दा केवल किराये का नहीं, बल्कि स्टेडियम के मूल उद्देश्य का है। सार्वजनिक धन से तैयार खेल परिसर की प्राथमिकता स्थानीय खिलाड़ियों को अभ्यास का अवसर देना होनी चाहिए। संचालन और रखरखाव के लिए आय का मॉडल बनाया जा सकता है, लेकिन उसके साथ स्थानीय क्रिकेटरों के लिए नियमित अभ्यास, उचित दर और निश्चित समय की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
रीवा में मैदानों से निकली प्रतिभाएं, सतना को भी चाहिए अवसर
पड़ोसी रीवा से ईश्वर पांडे और कुलदीप सेन जैसे क्रिकेटर सामने आए, जिन्होंने विंध्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। सतना की क्रिकेट विरासत भी कम समृद्ध नहीं रही है। यहां बड़े क्रिकेटरों का खेल देखने और प्री-रणजी चयन जैसी गतिविधियों का इतिहास रहा है। इसके बावजूद आज स्थानीय खिलाड़ियों को नियमित अभ्यास के लिए उपयुक्त मैदान नहीं मिलना खेल व्यवस्था के सामने बड़ा सवाल है। क्रिकेट अब केवल शौक नहीं, करियर का अवसर भी है। घरेलू और आयु वर्ग की प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन खिलाड़ियों के आगे बढ़ने के रास्ते खोलता है। इसके लिए नियमित अभ्यास, प्रशिक्षक और प्रतिस्पर्धी माहौल जरूरी है। मैदान के अभाव में प्रतिभाशाली युवाओं की तैयारी प्रभावित होती है और उनके सामने उपलब्ध अवसर सीमित हो सकते हैं।
खेल विकास की प्राथमिकताओं पर सवाल
सतना में प्रतिभा और खेल का माहौल दोनों रहे हैं। वर्ष 2007 में जिला क्रिकेट संघ को मैदान सौंपे जाने के बाद प्री-रणजी चयन जैसी गतिविधियों ने स्थानीय खिलाड़ियों को बड़े मंच तक पहुंचने की उम्मीद दी थी। आज उसी शहर में करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी यदि खिलाड़ियों को अभ्यास के लिए मैदान नहीं मिल रहा, तो यह केवल सुविधा की कमी नहीं, बल्कि खेल विकास की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल है। धवारी स्टेडियम की उपयोगिता उसकी लागत निकालने से नहीं, बल्कि मैदान पर अभ्यास करते स्थानीय खिलाड़ियों और वहां से आगे बढ़ने वाली प्रतिभाओं से तय होगी। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि सतना की क्रिकेट विरासत केवल पुराने किस्सों में सिमटकर न रह जाए, बल्कि नई पीढ़ी को भी आगे बढ़ने का अवसर मिले।

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मध्य प्रदेश सरकार ने 5 IAS अधिकारियों के तबादले किए हैं। सागर कलेक्टर प्रतिमा पाल को पर्यटन विकास निगम का MD बनाया गया, वहीं देवास और सिवनी में नए कलेक्टर नियुक्त किए गए।
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सतना के धवारी क्रिकेट स्टेडियम पर 8.39 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद मैदान की गुणवत्ता और स्थानीय खिलाड़ियों की पहुंच पर सवाल उठ रहे हैं। क्रिकेट विरासत वाले शहर में खेल सुविधाओं की उपयोगिता पर बहस तेज है।

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