मध्यप्रदेश में कैंसर अब क्षेत्रीय पैटर्न के रूप में उभर रहा है। भोपाल का ओरल कैंसर पैटर्न मिजोरम-मेघालय, ग्वालियर का गॉल ब्लैडर कैंसर गंगा बेल्ट और मालवा का पंजाब के कैंसर बेल्ट जैसा दिखता है। विंध्य-बुंदेलखंड में सर्वाइकल कैंसर के केस ज्यादा हैं।

लाख जागरुकता के बाद भी लोग तेजी से इसके चपेट में आ रहे हैं।
भोपाल। स्टार समाचार वेब
आज चार फरवरी यानी विश्व कैंसर दिवस है। लाख जागरुकता के बाद भी लोग तेजी से इसके चपेट में आ रहे हैं। इससे आए दिन मौत का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। मध्यप्रदेश में कैंसर अब क्षेत्रीय पैटर्न के रूप में उभर रहा है। भोपाल का ओरल कैंसर पैटर्न मिजोरम-मेघालय, ग्वालियर का गॉल ब्लैडर कैंसर गंगा बेल्ट और मालवा का पंजाब के कैंसर बेल्ट जैसा दिखता है। विंध्य-बुंदेलखंड में सर्वाइकल कैंसर के केस ज्यादा हैं। इसलिए इस बार वर्ल्ड कैंसर डे की थीम यूनाइटेड फॉर यूनिक रखी गई है। यानी हर व्यक्ति को आसपास ही उसकी आवश्यकता के अनुरूप इलाज मिल सके। एम्स में विशेष सेंटर(कैप) शुरू किया गया है। यहां हर मरीज को उसकी प्रोफाइल के आधार पर इलाज मिलेगा, साथ ही रिसर्च होगी। इंदौर में महिलाओं में स्तन कैंसर यहां कुल कैंसर केस का 30 फीसदी है। शहरों में गतिहीन जीवनशैली से पुरुषों में आंत, महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर बढ़ रहा है। ब्रेस्ट कैंसर से औसत उम्र भी कम (35-45) हो रही है। वहीं मालवा में पंजाब की तरह कैंसर केमिकल इंड्यूस्ड माना जा रहा है। यहां पेट और किडनी कैंसर के मामले पिछले 5 साल में 25 फीसदी तक बढ़े हैं। अत्यधिक कीटनाशक और रसायनों का मिट्टी व जल स्रोत में मिलना इसकी वजह है।

भोपाल एम्स के शोध ने चौंकाया
मध्य प्रदेश में भी कैंसर खामोश महामारी की तरह पैर पसार रहा है। इसकी चपेट में अब युवा पीढ़ी तेजी से आ रही है। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) और नेशनल सेंटर फॉर डिसीस इन्फार्मेटिक्स एंड रिसर्च (एनसीडीआइआर) की ताजा रिपोर्ट प्रोफाइल आफ कैंसर के साथ-साथ एम्स भोपाल के सर्जिकल आंकोलाजी विभाग के शोध ने प्रदेश में कैंसर की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एम्स में भर्ती रोगी
भोपाल 24,778
ललितपुर 1,687
रायसेन 2,716
बैतूल 1,592
विदिशा 1,830
होशंगाबाद 1,562
सागर 1,799
सतना 1,529
छतरपुर 1,732
रीवा 1,461
तीसरे और चौथे स्टेज में हो रही पहचान
मध्य प्रदेश में वर्तमान में 50.5 प्रतिशत बीमारियों का बोझ अब गैर-संचारी रोगों का है, जिसमें कैंसर की हिस्सेदारी सबसे घातक साबित हो रही है। वहीं, एम्स भोपाल के सर्जिकल आंकोलाजी विभाग द्वारा हाल ही में किए गए एक शोध ने चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। इसके अनुसार, अस्पताल पहुंचने वाली लगभग 60 प्रतिशत महिलाओं में कैंसर की पहचान तीसरे और चौथे स्टेज में हो रही है। शोधकर्ताओं ने पिछले छह महीनों में 167 रोगियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि महज 32 प्रतिशत मामलों में ही दूसरी स्टेज तक बीमारी पकड़ी जा सकी।
सामाजिक संकोच सबसे बड़ी बाधा
परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. विनय कुमार (विभागाध्यक्ष, सर्जिकल आंकोलाजी, एम्स भोपाल) के अनुसार जागरूकता का अभाव और सामाजिक संकोच सबसे बड़ी बाधा है। महिलाएं शुरुआती गांठों को गंभीरता से नहीं लेतीं। कैंसर का नाम सुनते ही बदनामी का भय और दर्द न होने के कारण डॉक्टर के पास न जाना, मृत्यु दर को बढ़ा रहा है। यदि पहली स्टेज पर पहचान हो जाए, तो जीवन रक्षा की दर 90 प्रतिशत से अधिक हो सकती है। इस अध्ययन में डॉ. अभिषेक धर द्विवेदी, डॉ. प्राची कर्णे, धर्मेंद्र मेहरा और अनुरुद्ध मिश्रा ने भूमिका निभाई है।
युवाओं में गुटखा बना स्टाइल स्टेटमेंट
गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) स्थित कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर डॉ. अतुल श्रीवास्तव ने बताया कि भोपाल सहित पूरे प्रदेश में ओरल (मुंह), ब्रेस्ट और बड़ी आंतों का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है। युवाओं में स्मोकिंग की तुलना में तंबाकू चबाने की प्रवृत्ति अधिक है। युवा उन स्टार सेलिब्रिटीज को फालो कर रहे हैं जो तंबाकू उत्पादों का विज्ञापन करते हैं। वे इसे स्टाइल स्टेटमेंट समझ रहे हैं। देर रात तक जागने, फिजिकल एक्टिविटी कम होने और खेल मैदान सिमटने से नई पीढ़ी इस बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई है।
वर्ष 2025 तक की डरावनी तस्वीर
आईसीएमआर की रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में प्रदेश में पुरुषों में कैंसर के 38,171 मामले थे, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 43,097 हो गए हैं। वहीं महिलाओं में यह आंकड़ा 39,717 से बढ़कर 45,200 तक पहुंच गया है।
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