मध्य प्रदेश भाजपा में संगठन महामंत्री का पद केवल एक राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक संतुलन, सख्त अनुशासन और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने वाली मुख्य धुरी माना जाता है। नौ महीनों से इस शीर्ष पद का खाली होना पार्टी के भीतर एक बड़ी ‘कमी’ को बयां कर रहा है।

नेतृत्व विहीन संगठन: महीनों से खाली पद और कमजोर पड़ता अनुशासन
बयानबाजी: संगठन महामंत्री के अभाव में सतह पर आते नेताओं के मतभेद
नए चेहरे की तलाश: दौड़ में शामिल संघ के दिग्गज नामों पर चल रहा मंथन
प्रयोगशाला: मप्र संगठन के ऐतिहासिक प्रयोग और उनकी राष्ट्रव्यापी सफलता
अहम दायित्व: सत्ता, संगठन और संघ के बीच समन्वय की सबसे मजबूत कड़ी
अरविंद मिश्र। भोपाल
मध्य प्रदेश भाजपा में संगठन महामंत्री का पद केवल एक राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक संतुलन, सख्त अनुशासन और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने वाली मुख्य धुरी माना जाता है। नौ महीनों से इस शीर्ष पद का खाली होना पार्टी के भीतर एक बड़ी ‘कमी’ को बयां कर रहा है। कुशाभाऊ ठाकरे की बनाई जिस मजबूत नींव के दम पर मध्यप्रदेश भाजपा को हमेशा अपनी अनुशासित कार्यशैली और संगठनात्मक प्रयोगशाला के रूप में पहचान मिली, आज वही संगठन शीर्ष नियंत्रण के अभाव में अंदरूनी गुटबाजी, नेताओं के बेकाबू बयानों और ढीली होती कसावट से जूझता नजर आ रहा है। नए प्रदेश नेतृत्व के दौर में जहां सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल की सबसे ज्यादा जरूरत है। वहीं पूर्णकालिक संगठन महामंत्री का न होना पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। यही नहीं, सत्ता और संगठन के बीच ‘सेतु’ पर नियुक्ति नहीं होने से प्रदेश अध्यक्ष का कार्यभार तो बढ़ा ही है, साथ ही नेताओं की जुबान पर लगाम लगाना भी मुश्किल हो रहा है। दरअसल, जनवरी-2026 के अंत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बड़ा निर्णय लेते हुए तत्कालीन संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा का दायित्व परिवर्तन कर दिया था। उन्हें संघ में वापस बुलाकर सह क्षेत्रीय बौद्धिक प्रमुख की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तब से यह पद खाली पड़ा है। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट....।
एक जुट करने में जुटे जामवाल
क्षेत्रीय संगठन मंत्री अजय जामवाल लगातार प्रवास कर संगठन को एकजुट रखने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन पूर्णकालिक प्रदेश संगठन महामंत्री की कमी साफ नजर आ रही है। पार्टी पहले ही संभागीय संगठन मंत्री की व्यवस्था को समाप्त कर चुकी है। एक दौर वह भी था जब प्रदेश में संगठन मंत्री के साथ-साथ सह-संगठन मंत्रियों की तैनाती रहती थी, जिससे पार्टी नेताओं पर सख्त नियंत्रण बना रहता था। यही नहीं, मध्य प्रदेश भाजपा में वर्तमान में कोई आधिकारिक मीडिया प्रभारी भी नहीं है।
चुनौतियों से जूझ रही भाजपा
संगठन के सीधे नियंत्रण के अभाव में अंदरूनी कलह सतह पर आ रही है। वरिष्ठ विधायक अजय विश्नोई लगातार अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, जबकि पूर्व मंत्री व विधायक जयंत मलैया भी मुखर नजर आ रहे हैं। वहीं, विधायक रामेश्वर शर्मा के विवादित बयानों से भी पार्टी असहज स्थिति में है। मंत्री विजय शाह, पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह, गोपाल भार्गव, आलोट विधायक चिंतामणि मालवीय, नरेंद्र सिंह कुशवाहा जैसे नेता सुर्खियां बटोर रहे हैं।
आधा दर्जन नामों पर मंथन
हाल ही में राजस्थान भाजपा में अजय कुमार को संगठन महामंत्री नियुक्त किए जाने के बाद मध्य प्रदेश को लेकर भी सरगर्मी तेज हो गई है। मध्यप्रदेश में इस जिम्मेदारी के लिए संघ के आधा दर्जन अनुभवी प्रचारकों के नामों पर मंथन चल रहा है। दावा किया जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व जल्द ही नए संगठन महामंत्री के नाम की आधिकारिक घोषणा करेगा।
दौड़ में संघ के दिग्गज चेहरे
मध्यप्रदेश भाजपा के नए संगठन महामंत्री की रेस में दिनकर राव सबनीस का नाम सबसे प्रमुखता से उभरा है। हाल ही में अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के राष्ट्रीय दायित्व से मुक्त हुए सबनीस मध्यप्रदेश के राजनीतिक और संगठनात्मक समीकरणों की गहरी समझ रखते हैं। इसके अलावा दीनदयाल शोध संस्थान के अभय महाजन के नाम की भी प्रमुखता से चर्चा है। दावेदारों की इस फेहरिस्त में संघ के अन्य वरिष्ठ चेहरों में विद्या भारती के अखिलेश मिश्रा, मालवा प्रांत प्रचारक राजमोहन, मध्य भारत के प्रांत प्रचारक विमल गुप्ता और निखलेश माहेश्वरी के नाम शामिल हैं। माना जा रहा है कि संघ और भाजपा नेतृत्व इनमें से ही किसी अनुभवी चेहरे पर दांव लगा सकता है।
भाजपा के सामने दोहरी चुनौती
मध्यप्रदेश में भाजपा के सामने आने वाले समय में दो बड़ी और सियासी परीक्षाएं हैं। राज्य में जून-जुलाई 2027 में सबसे पहले नगरीय निकाय चुनाव होने हैं, जिन्हें आगामी सियासी रुझान का सेमीफाइनल माना जा रहा है। इसके ठीक बाद नवंबर-दिसंबर 2028 तक प्रदेश में विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी है। ऐसे में बिना संभागीय संगठन मंत्रियों के निचले स्तर तक कसावट बनाए रखना और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल साधना पार्टी नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा।
2020: जब भाजपा ने रचा था इतिहास
मध्यप्रदेश भाजपा के इतिहास में राज्य स्तर पर एक साथ दो संगठन मंत्रियों का प्रावधान कभी नहीं रहा। यह पद हमेशा एक ही व्यक्ति के पास रहता है। हालांकि, मुख्य संगठन महामंत्री के कार्यों में सहयोग के लिए सह-संगठन महामंत्री की नियुक्ति की व्यवस्था रही है। पार्टी ने अगस्त 2020 में नया प्रयोग करते हुए सुहास भगत के मुख्य संगठन महामंत्री रहते हुए हितानंद शर्मा को प्रदेश सह-संगठन महामंत्री नियुक्त किया था। यह व्यवस्था मार्च 2022 तक चली, जिसके बाद सुहास भगत की संघ में वापसी होने पर हितानंद शर्मा को पूर्ण रूप से संगठन महामंत्री की कमान सौंपी गई।
2021: संभागीय संगठन मंत्रियों की व्यवस्था समाप्त
वर्ष 2021 से पहले मध्य प्रदेश में प्रदेश संगठन महामंत्री के अलावा छह संभागीय संगठन मंत्री भी कार्यरत थे। संघ के प्रचारक रहे ये नेता अलग-अलग संभागों का प्रभार संभालते थे। सितंबर 2021 में भाजपा ने इस व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करते हुए सभी छह संभागीय संगठन मंत्रियों को प्रदेश कार्यसमिति में स्थानांतरित कर दिया। इस बड़े बदलाव के बाद से प्रदेश संगठन की कमान पूरी तरह मुख्य संगठन महामंत्री (हितानंद शर्मा) और राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री (शिवप्रकाश) के हाथों में केंद्रित हो गई।
नए नेतृत्व का दौर: कसावट की कवायद
मध्य प्रदेश भाजपा में हेमंत खंडेलवाल को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद संगठन एक नए दौर से गुजर रहा है। नया नेतृत्व अभी पूरे सूबे में अपनी पकड़ को मजबूती से स्थापित नहीं कर पाया है। संगठन स्तर पर ढील के बीच पार्टी ने हाल ही में बड़े संगठनात्मक फेरबदल किए हैं। इसके तहत 62 जिलों के जिला प्रभारियों की घोषणा, नई प्रदेश कार्यसमिति का गठन और विभिन्न मोर्चों के प्रभारियों की नियुक्तियां की गई हैं। इन कदमों को संगठन पर फिर से मजबूत पकड़ बनाने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है।
मध्यप्रदेश: भाजपा संगठन की प्रयोगशाला
मध्य प्रदेश को भाजपा की संगठनात्मक प्रयोगशाला भी माना जाता है। यहां संगठन को मजबूत करने के लिए किए गए नए प्रयोग यदि सफल रहते हैं, तो उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाता है। पूर्व संगठन महामंत्री अरविंद मेनन ने शक्ति केंद्र का सफल फॉर्मूला तैयार किया था। उनके बाद सुहास भगत ने जिलाध्यक्षों की उम्र 45 वर्ष और मंडल अध्यक्षों की उम्र 35 वर्ष से कम तय करने का नवाचार किया। वहीं हितानंद शर्मा ने कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुलझाने के लिए मंत्रियों की दीनदयाल परिसर में नियमित ड्यूटी लगाने की व्यवस्था शुरू की। इन सभी प्रयोगों की सफलता के बाद इन्हें देशभर में अपनाया गया।
बिना संगठन मंत्री के चल रहे कई राज्य
भाजपा में इन दिनों देश के कई राज्यों में संगठन महामंत्री (संगठन मंत्री) के पद खाली पड़े हैं। प्रमुख राज्यों में नियुक्तियां न होने से सांगठनिक कसावट प्रभावित हो रही है। पश्चिम बंगाल जैसे अहम राज्य में संगठन महामंत्री का पद लंबे समय से खाली पड़ा है, तो वहीं महाराष्ट्र में पिछले तीन वर्षों से कोई संगठन मंत्री नहीं है। इसी तरह, उत्तराखंड के संगठन महामंत्री अजय कुमार को राजस्थान की जिम्मेदारी देकर भेजा गया, जिसके बाद से उत्तराखंड में भी यह महत्वपूर्ण पद खाली हो गया है। कई अन्य राज्यों में भी संगठन मंत्रियों की गैर-मौजूदगी से सत्ता और संगठन के बीच समन्वय की चुनौतियां सामने आ रही हैं।
संगठन महामंत्री: कार्य और जिम्मेदारियां
संगठनात्मक मजबूती: बूथ से लेकर राज्य स्तर तक कैडर को एकजुट करना, नए कार्यकतार्ओं को जोड़ना और पार्टी के आधार को विस्तार देना।
सत्ता-संगठन में तालमेल: सरकार-संगठन के बीच समन्वय स्थापित करना ताकि प्रशासनिक फैसलों और जन-आकांक्षाओं में संतुलन बना रहे।
संघ और पार्टी की कड़ी: वैचारिक परिवार संघ-भाजपा के बीच संवाद, नीतिगत निदेर्शों और प्राथमिकताओं का आदान-प्रदान सुनिश्चित करना।
अनुशासन और कमान: पार्टी के भीतर अनुशासन बनाए रखना और संगठनात्मक नियुक्तियों और रणनीतियों में केंद्रीय भूमिका निभाना।
चुनाव और प्रबंधन: टिकट वितरण, स्टार प्रचारकों की रैलियों, आक्रामक प्रचार अभियान-बूथ स्तर के सूक्ष्म प्रबंधन की पूरी कमान संभालना।
अब तक भाजपा के संगठन मंत्री
वर्ष नाम
1980 कुशाभाऊ ठाकरे
1990 कृष्णमुरारी मोगे
1990-2000 मेघराज जैन
2002-06 कप्तान सिंह सोलंकी
2006-12 माखनसिंह चौहान
2012-16 अरविंद मेनन
2016-21 सुहास भगत
2021-26 हितानंद शर्मा
मध्य प्रदेश भाजपा: मीडिया प्रभारी पद खाली
-संवाद और डैमेज कंट्रोल भी हो रहा प्रभावित
-अब नितिन नवीन की टीम आशीष अग्रवाल
मध्य प्रदेश भाजपा में प्रदेश मीडिया प्रभारी का पद खाली होने से पार्टी का मीडिया प्रबंधन और संवाद ढांचा प्रभावित हो रहा है। इसके चलते दैनिक फैसलों और संगठनात्मक बयानों के समन्वय में देरी हो रही है, साथ ही अहम मुद्दों पर आधिकारिक पक्ष रखने की गति भी सुस्त पड़ी है। हालांकि पार्टी में प्रवक्ताओं और मीडिया पैनलिस्टों की कोई कमी नहीं है, लेकिन स्थिति यह है कि किसे कब, कहां और क्या बोलना है, यह निर्देश देने वाला फिलहाल कोई नहीं है। विरोधियों के तीखे हमलों के बीच पार्टी का रुख स्पष्ट और त्वरित रूप से सामने नहीं आ पा रहा। इसके अलावा नेताओं के विवादित बयानों और अंदरूनी खिंचतान को संभालने के लिए आवश्यक डैमेज कंट्रोल व मॉनिटरिंग व्यवस्था भी कमजोर दिख रही है। इसका असर पार्टी अभियानों और सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रचार पर पड़ रहा है। गौरतलब है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा घोषित राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल को राष्ट्रीय सह-मीडिया संयोजक की नई जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसके बाद से ही यह पद रिक्त पड़ा है।
अब तक के प्रदेश मीडिया प्रभारी



मध्य प्रदेश भाजपा में संगठन महामंत्री का पद केवल एक राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक संतुलन, सख्त अनुशासन और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने वाली मुख्य धुरी माना जाता है। नौ महीनों से इस शीर्ष पद का खाली होना पार्टी के भीतर एक बड़ी ‘कमी’ को बयां कर रहा है।
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स्टार समाचार, स्टार स्ट्रेट, सुशील शर्मा, साप्ताहिक कॉलम
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