पॉलिसी बेचते समय मुस्कुराते चेहरों के साथ कैशलेस इलाज और झटपट दावों का प्रलोभन देने वाली बीमा कंपनियों की असलियत क्लेम के वक्त सामने आ रही हैं। नियम-शर्तों की बारीक लाइनों का जाल बुनकर आम जनता की गाढ़ी कमाई हड़पने और उनके दावों को खारिज करने की मनमानी का यह खेल अब बड़ी समस्या बन चुका है।

प्रदेश के ज्यादातर उपभोक्ता फोरम बिना अध्यक्ष के, प्रभार के भरोसे न्याय
नो-क्लेम का ठप्पा लगा बंद की जा रहीं फाइलें,भटक रहे पॉलिसी होल्डर
मध्यप्रदेश में पांच साल में 631.71 फीसदी बढ़ीं बीमा संबंधी शिकायतें
शिकायतों में महाराष्ट्र पहले, गुजरात दूर और मध्यप्रदेश तीसरे नंबर पर
अरविंद मिश्र। भोपाल
पॉलिसी बेचते समय मुस्कुराते चेहरों के साथ कैशलेस इलाज और झटपट दावों का प्रलोभन देने वाली बीमा कंपनियों की असलियत क्लेम के वक्त सामने आ रही हैं। नियम-शर्तों की बारीक लाइनों का जाल बुनकर आम जनता की गाढ़ी कमाई हड़पने और उनके दावों को खारिज करने की मनमानी का यह खेल अब बड़ी समस्या बन चुका है। आलम यह है कि पिछले पांच वर्षों में मध्य प्रदेश में बीमा संबंधी शिकायतों में 631.71 प्रतिशत का ऐतिहासिक उछाल आया है, जिसके कारण क्लेम रिजेक्शन के केसों में प्रदेश पूरे देश में तीसरे स्थान पर आ पहुंचा है। एक तरफ जहां बीमा कंपनियों की तानाशाही ने उपभोक्ताओं का जीना दूभर कर रखा है। वहीं दूसरी तरफ इंसाफ की गुहार लगाने पहुंचे पीड़ितों को उपभोक्ता फोरमों की सुस्त रफ्तार रुला रही है। विडंबना यह है कि मध्य प्रदेश जैसे 55 जिलों वाले बडेÞ राज्य के अधिकांश जिला उपभोक्ता फोरम बिना स्थायी अध्यक्षों के, महज अतिरिक्त प्रभार के सहारे चल रहे हैं। समय पर सुनवाई न होने और अध्यक्षों की कमी के चलते हजारों पीड़ित परिवार अपनी ही रकम पाने के लिए लोकपाल और अदालतों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। लोकसभा में पेश आंकड़ों ने न सिर्फ बीमा क्षेत्र के इस संगठित शोषण की पोल खोलकर रख दी है, बल्कि उपभोक्ता संरक्षण तंत्र की चरमराती व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पर पेश है ‘स्टार समाचार’ की विशेष रिपोर्ट...।
पांच साल में बढ़ा शिकायतों का ग्राफ
| 2021-22 | 369 |
| 2022-23 | 913 |
| 2023-24 | 2,405 |
| 2024-25 | 2,420 |
| 2025-26 | 2,700 |
क्लेम खारिज करने में शीर्ष पर महाराष्ट्र
बीमा क्लेम खारिज करने और ग्राहकों को रुलाने में देश का सबसे बड़ा औद्योगिक राज्य महाराष्ट्र शीर्ष पर है। यहां वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 7,333 क्लेम रिजेक्ट होने की शिकायतें दर्ज की गईं। गुजरात 4,181 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है। इस सूची में मध्य प्रदेश (2,700 मामले) तीसरे पायदान पर है। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 2,587, केरल में 2,561 और तमिलनाडु में 2,371 शिकायतें सामने आई हैं। उक्त आंकड़ों से साफ जाहिर है कि देशभर के उपभोक्ता बीमा कंपनियों की मनमानी से परेशान हैं।
कोर्ट में बढ़े ढाई गुना मामले
राष्ट्रीय स्तर पर बीमा विवादों को लेकर अदालत पहुंचने वाले मामलों की संख्या वर्ष 2021-22 में 19,025 थी, जो 2025-26 में बढ़कर 46,122 हो गई है। राहत की बात यह है कि इस साल रिकॉर्ड 25,418 से अधिक फैसले ग्राहकों के हक में आए हैं, जिससे कंपनियों के दावों की पोल खुल गई है।
राज्यवार दर्ज शिकायत
| महाराष्ट्र | 7,333 |
| गुजरात | 4,181 |
| मध्य प्रदेश | 2,700 |
| उत्तर प्रदेश | 2,587 |
| केरलम | 2,561 |
| तमिलनाडु | 2,371 |
रिकॉर्ड 1,745 केसों का निपटारा
जब बीमा कंपनियां नो-क्लेम का ठप्पा लगाकर फाइलें बंद करती हैं, तब न्यायपालिका उपभोक्ताओं को राहत दे रही है। इस साल अकेले बीमा लोकपाल ने रिकॉर्ड 1,745 मामलों का निपटारा सीधे पीड़ित परिवारों के पक्ष में किया है। उपभोक्ता आयोगों ने स्पष्ट किया है कि केवल तकनीकी बहानों या देरी के आधार पर दावा खारिज करना सेवा में कमी माना जाएगा।
शहर से गांव तक एक ही दर्द
मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य, जीवन, फसल और वाहन बीमा कराने वाले लाखों उपभोक्ता आज बीमा कंपनियों की मनमानी और सेवा में कमी से परेशान हैं। मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक बीमा कंपनियों के जाल में फंसे उपभोक्ताओं का दर्द एक जैसा ही है। मध्यप्रदेश कृषि प्रधान राज्य है। फसल बीमा कराने वाले किसान को पेंचीदा नियमों के कारण कई बार पूरी फसल चौपट होने पर भी शून्य या नाम मात्र का मुआवजा मिलता है।
एक अध्यक्ष पर कई जिलों का बोझ, 46 आयोगों में से 27 में स्थायी नहीं
मध्यप्रदेश के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग खुद प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हैं। प्रदेशभर में 46 जिला उपभोक्ता आयोग हैं। इसमें से केवल 19 आयोगों में ही स्थायी अध्यक्षों की नियुक्ति है। वहीं, 27 जिला आयोग यानी लगभग 58.7 फीसदी बिना अध्यक्ष के चल रहे हैं। इन जिलों को पड़ोस के जिलों के अध्यक्षों से संबद्ध यानी अतिरिक्त प्रभार देकर काम चलाया जा रहा है। अध्यक्षों पर काम का दोहरा-तिहरा दबाव है। ग्वालियर के अध्यक्ष के पास भिंड, मुरैना, दतिया और श्योपुर का भी प्रभार है। रतलाम के अध्यक्ष धार, बड़वानी और झाबुआ का काम देख रहे हैं। रीवा, छिंदवाड़ा, जबलपुर, छतरपुर और गुना के अध्यक्षों पर भी 2 से 3 जिलों की जिम्मेदारी डाली गई है।
19 आयोग में स्थायी अध्यक्ष
भोपाल-1, भोपाल-2, इंदौर-2, जबलपुर-1, जबलपुर-2, ग्वालियर, उज्जैन, सागर, रतलाम, गुना, छतरपुर, होशंगाबाद, रीवा, खंडवा, सतना, छिंदवाड़ा, दमोह, विदिशा, मंदसौर।
27 आयोग अन्य जिलों से संबद्ध
इंदौर-1, कटनी, शिवपुरी, धार, भिंड, मुरैना, हरदा, सीहोर, बुरहानपुर, बड़वानी, मंडलेश्वर, मंडला, डिंडोरी, नरसिंहपुर, सिवनी, बालाघाट, देवास, झाबुआ, नीमच, सीधी, शहडोल, राजगढ़, दतिया, श्योपुर, टीकमगढ़, पन्ना, बैतूल।
रीवा-सतना के भरोसे पड़ोसी जिले, विंध्य में उपभोक्त आयोग बदहाल
विंध्य अंचल में उपभोक्ताओं को न्याय दिलाने वाला ढांचा पूरी तरह बेपटरी हो चुका है। रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली, मऊगंज और मैहर में से सिर्फ रीवा और सतना में ही स्थायी अध्यक्ष तैनात हैं। बाकी जिलों की निर्भरता पड़ोसी जिला आयोगों पर टिकी है। सतना अध्यक्ष पर मैहर और कटनी का भी प्रभार है। वहीं रीवा के अध्यक्ष पर 2-3 अतिरिक्त जिलों का बोझ है, जिससे उन्हें सुनवाई के लिए अलग-अलग जिलों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। आयोगों में खाली पड़े पदों और इस भागदौड़ के चलते मामलों की सुनवाई अटक रही है। विंध्य के उपभोक्ताओं को अगली तारीख के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है, जिससे न्याय की आस लगाए आम लोग परेशानी झेलने को मजबूर हैं।
तीन चर्चित फैसले: गुना: बीमा दावे का सबसे बड़ा मुआवजा
सितंबर 2026 में मध्य प्रदेश के गुना जिला उपभोक्ता फोरम ने ऐतिहासिक फैसला सुुनाया। एक बीमा कंपनी ने क्लेम को झूठा बताकर खारिज कर दिया था। फोरम ने इसे सेवा में गंभीर कमी माना और कंपनी को उपभोक्ता के पक्ष में 1.90 करोड़ रुपए के भुगतान का आदेश जारी किया। यह हाल के वर्षों में जिला स्तर पर दिए गए सबसे बड़े मुआवजा आदेशों में से एक है।
पश्चिम बंगाल: पीड़ित जीता, आयोग ने दिलाए 3.5 लाख
पश्चिम बंगाल में एचडीएफसी जनरल इंश्योरेंस कंपनी द्वारा कार दुर्घटना क्लेम को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि चालक के पास अमान्य-फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस था और उसके पास दो लाइसेंस थे। लेकिन पश्चिम बंगाल राज्य उपभोक्ता आयोग ने 8 जुलाई-2026 को बीमा कंपनी की दलीलों को खारिज कर दिया। साथ ही पीड़ित को ब्याज सहित 3.5 लाख और 1 लाख मानसिक उत्पीड़न के मुआवजे के रूप में देने का आदेश दिया।
छत्तीसगढ़: वाहनों में ई-20 पर बड़ा फैसला
जुलाई 2026 में छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता आयोग का फैसाला मिसाल बन गया। गाड़ियों में 20 फीसदी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई-20) के इस्तेमाल से इंजन खराब होने और कंपनियों द्वारा बिक्री के समय इसकी स्पष्ट जानकारी न देने पर सख्त कार्रवाई की गई। फोरम ने इसे अनुचित व्यापार व्यवहार करार देते हुए कंपनी और डीलर को आदेश दिया कि वे ग्राहक को खराब वाहन के बदले नया ई-20 कंपैटिबल वाहन दें या पूरा रिफंड जारी करें।
टॉप-5 रुलाने वाली बीमा कंपनियां
उपभोक्ताओं की शिकायतों (प्रति 10,000 क्लेम पर शिकायत दर) और आईआरडीएआई के सालाना डेटा (2025-26) के आधार पर पांच कंपनियों के क्लेम प्रोसेस में ग्राहकों को अधिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा है।
स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस: कंपनी के खिलाफ क्लेम सेटलमेंट में देरी या भुगतान को लेकर सबसे ज्यादा शिकायतें दर्ज की गई हैं।
इफको-टोकियो जनरल इंश्योरेंस: 63.88 शिकायतें प्रति 10,000 क्लेम में और उद्योग में काफी अधिक रही है।
केयर हेल्थ इंश्योरेंस: इस कंपनी के खिलाफ भी शिकायतों की संख्या काफी ऊंची यानी टॉप-3 में बनी हुई है।
निवा बूपा हेल्थ इंश्योरेंस: क्लेम रोकने या कम करने के मामले में इसके खिलाफ भी शिकायतें दर्ज हैं।
टाटा एआईए लाइफ इंश्योरेंस: गुना जिला उपभोक्ता फोरम ने इस कंपनी पर क्लेम रिजेक्ट करने पर ऐतिहासिक जुर्माना लगाया।
मुख्य सावधानियां
सही पॉलिसी और जरूरत का चयन। नियम और शर्तें पढ़ना, खुद भरें। बीमारियों और पिछली जानकारी का पूरा खुलासा। क्लेम सेटलमेंट रेशियो 95 फीसदी से अधिक होना चाहिए। पॉलिसी का प्रीमियम और सम एश्योर्ड, नेटवर्क अस्पताल, गैरेज की सूची, फ्री-लुकिंग पीरियड। सबसे खास बात बीमा पॉलिसी केवल एजेंट के कहने पर फैसला न लें।
बीमा एक्सपर्ट: केएल द्विवेदी
सरकारी बीमा: पहली प्राथमिकता पैसों की 100 फीसदी सुरक्षा है। पारंपरिक सुरक्षा प्लान चाहते हैं और थोड़े धीमे क्लेम प्रोसेस से कोई समस्या नहीं है। सरकार की गारंटी होने से पैसा सुरक्षित रहता है। क्लेम और सर्विस में थोड़ा अधिक समय लग सकता है।
प्राइवेट बीमा: तुरंत आनलाइन सर्विस चाहिए, कैशलेस क्लेम के लिए बड़ा नेटवर्क अस्पताल या गैरेज चाहिए। आईआरडीएआई के नियमों के अधीन, लेकिन सरकारी गारंटी नहीं। डिजिटल और पेपरलेस प्रक्रिया होने के कारण तेज सर्विस। प्रीमियम कम या ज्यादा हो सकता है।
सभी प्रमाणों को सुरक्षित रखना अनिवार्य
उपभोक्ता मामलों में सफलता का मूल आधार ठोस दस्तावेज और साक्ष्य होते हैं। न्यायालय में केवल मौखिक तर्कों का कोई औचित्य नहीं होता। इसलिए, किसी भी वस्तु या सेवा से जुड़े सभी लिखित प्रमाणों को सुरक्षित रखना अनिवार्य है। यदि किसी संस्थान की लापरवाही से मानसिक, शारीरिक या आर्थिक क्षति हुई है, तो उपभोक्ता को उचित क्षतिपूर्ति और विधिक व्यय का दावा करने का पूर्ण कानूनी अधिकार है।
-अनूप मिश्रा, वरिष्ठ अधिवक्ता, हाईकोर्ट, जबलपुर


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