विधानसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद दतिया भाजपा संगठन में सर्जरी की प्रक्रिया तेज हो गई है। जिला कार्यकारिणी भंग किए जाने के बाद अब नए जिलाध्यक्ष की कमान किसे सौंपी जाए, इसे लेकर भोपाल से लेकर दिल्ली तक मंथन जारी है। इस रेस में आशुतोष तिवारी और पूर्व विधायक व प्रदेश प्रवक्ता घनश्याम पिरोनिया के नाम सबसे आगे चल रहे हैं।

तिवारी या पिरोनिया! नरोत्तम विरोधी खेमे को मिलेगी तवज्जो
दोनों नेता अगले विधानसभा चुनाव में टिकट के मजबूत दावेदार
पार्टी का व्यक्तिगत कार्रवाई के बजाय सामूहिक पुनर्गठन पर जोर
भोपाल। स्टार समाचार वेब
विधानसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद दतिया भाजपा संगठन में सर्जरी की प्रक्रिया तेज हो गई है। जिला कार्यकारिणी भंग किए जाने के बाद अब नए जिलाध्यक्ष की कमान किसे सौंपी जाए, इसे लेकर भोपाल से लेकर दिल्ली तक मंथन जारी है। इस रेस में आशुतोष तिवारी और पूर्व विधायक व प्रदेश प्रवक्ता घनश्याम पिरोनिया के नाम सबसे आगे चल रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही नेता 2028 के विधानसभा चुनाव में टिकट के मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। ऐसे में नए जिलाध्यक्ष का चयन केवल संगठन विस्तार नहीं, बल्कि 2028 के भावी सियासी गणित को साधने की कवायद है।
नरोत्तम समर्थकों की विदाई
पार्टी के अंदरखाने चल रही चर्चाओं की मानें तो दतिया में अब पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव को कम करने और उनके विरोधी खेमे को संगठन में प्राथमिकता देने की रणनीति बनाई गई है। उपचुनाव में हार के तुरंत बाद कार्यकारिणी भंग करना इसी रणनीति का पहला कदम था। हालांकि किसी भी पदाधिकारी को निलंबित या निष्कासित नहीं किया गया है, जिससे साफ है कि पार्टी किसी व्यक्तिगत कार्रवाई के बजाय सामूहिक पुनर्गठन का संदेश देना चाहती है।
पद या 2028 का टिकट.... दोनों पर धर्मसंकट
आशुतोष तिवारी संगठन के करीबी, सक्रिय छवि, तथा ब्राह्मण और व्यापारी वर्ग पर अच्छी पकड़ है। यदि जिलाध्यक्ष बनते हैं तो निकाय चुनाव और संगठन मजबूत करने में समय बीतेगा। एक व्यक्ति-एक पद के नियम के तहत 2028 की दावेदारी कमजोर हो सकती है। वहीं घनश्याम पिरोनिया का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि वे पूर्व विधायक, प्रदेश प्रवक्ता, तथा भांडेर क्षेत्र से दलित वोट बैंक साधने में सक्षम हैं। लेकिन उनके समाने कई चुनौतियां भी हैं। भांडेर सीट से दोबारा टिकट के दावेदार हैं। जिलाध्यक्ष का पद लेने पर 2028 के चुनावी गणित और दावेदारी पर असर पड़ सकता है।
ब्राह्मण, दलित और कुशवाह समाज पर नजर
नरोत्तम मिश्रा के बाद ब्राह्मण और व्यापारी वर्ग को साधे रखने के लिए आशुतोष तिवारी उपयोगी साबित हो सकते हैं। वहीं, उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह की जीत के बाद खिसके दलित वोट बैंक को री-कैप्चर करने के लिए पिरोनिया पार्टी की पहली पसंद बन सकते हैं। निवर्तमान जिलाध्यक्ष रघुवीर कुशवाह को हटाए जाने के बाद 35 हजार कुशवाह मतदाताओं का रुख भांपना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। 2023 के विधानसभा चुनाव में कुशवाह समाज की नाराजगी ही नरोत्तम मिश्रा की हार की मुख्य वजह बनी थी।
नई नींव खड़ा करने की चुनौती
दतिया के साथ-साथ सेवढ़ा और भांडेर में भी संगठनात्मक ढांचा फिलहाल पूरी तरह भंग है। अगले वर्ष प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव से पहले भाजपा को शून्य से नया कैडर तैयार करना है।

विधानसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद दतिया भाजपा संगठन में सर्जरी की प्रक्रिया तेज हो गई है। जिला कार्यकारिणी भंग किए जाने के बाद अब नए जिलाध्यक्ष की कमान किसे सौंपी जाए, इसे लेकर भोपाल से लेकर दिल्ली तक मंथन जारी है। इस रेस में आशुतोष तिवारी और पूर्व विधायक व प्रदेश प्रवक्ता घनश्याम पिरोनिया के नाम सबसे आगे चल रहे हैं।
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